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महात्मा गांधी जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, नेहरू ने मना कर दिया था: दलाई लामा

1959 में तिब्बत से भागकर भारत आ गए थे दलाई लामा

Danik Bhaskar | Aug 09, 2018, 11:15 AM IST
मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्त मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्त

- दलाई ने कहा कि अगर गांधीजी की इच्छा पूरी हो जाती तो भारत का विभाजन ही नहीं होता

- 'तिब्बती कभी भी चीनियों को अपना दुश्मन नहीं मानते बल्कि उनका सम्मान करते हैं'

पणजी. आध्यात्मिक नेता दलाई लामा (83) ने जवाहर लाल नेहरू को आत्मकेंद्रित व्यक्ति करार दिया। दलाई ने बुधवार को गोवा में एक कार्यक्रम में कहा, "महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने इसके लिए इनकार कर दिया। अगर गांधीजी की यह इच्छा पूरी हो जाती तो भारत का विभाजन ही नहीं होता। पंडित नेहरू काफी अनुभवी और बुद्धिमान थे लेकिन उनसे कुछ गलतियां भी हुईं।'' दलाई ने ये भी कहा कि सामंती की बजाय लोकतांत्रिक व्यवस्था ज्यादा बेहतर होती है। सामंती व्यवस्था में फैसला लेने का हक केवल कुछ लोगों के हाथ में होता है जो ज्यादा खतरनाक है।
दलाई ने कहा- "चीन की तिब्बत में दखलंदाजी की समस्या 1956 से चली आ रही थी। जब मुझे लगा कि अब हालात सामान्य नहीं रह पाएंगे तो 17 मार्च 1959 की रात मैं तिब्बत से अपने समर्थकों के साथ भाग आया। मेरे दिमाग में यही था कि अगली सुबह देख भी पाऊंगा या नहीं। अब तो परिस्थितियां और भी बिगड़ गई हैं। चीनी अफसरों का रवैया काफी अग्रेसिव होता जा रहा है।''

चीनी मिलिट्री बेस के पास ही निकलकर आए : यह पूछे जाने पर कि उनके जिंदगी का सबसे बड़ा डर क्या था, दलाई लामा ने बताया, "तिब्बत छोड़कर भारत आते समय वे चीनी मिलिट्री बेस के पास से गुजरे थे। जब वे नदी पार कर रहे थे तो चीनी सैनिक उन्हें देख सकते थे। उस दौरान हम लोग पूरी तरह शांत थे लेकिन घोड़ों की टापों की आवाज को तो नहीं रोका जा सकता था। उस वक्त हम डर गए थे। दूसरे दिन सवेरा होते ही हम पहाड़ से उतर रहे थे। हमें रोकने के लिए दो तरफ से चीनी सैनिक आ रहे थे। ये काफी खतरनाक था।''

आजादी खोई, देश भी छोड़ना पड़ा : दलाई ने बताया, "16 साल की उम्र में मैंने आजादी खोई। 24 साल की उम्र में मैंने अपना देश खो दिया। 17 साल तक हमने कई उतार-चढ़ाव देखे लेकिन मकसद के लिए अडिग रहे। चीन की ताकत उसकी सेना है। हम कह सकते हैं कि वहां बंदूक का शासन है। हमारी ताकत सच में निहित है। बंदूक की नोंक के बल से कुछ फैसले तो किए जा सकते हैं लेकिन लंबे वक्त में सच ज्यादा ताकतवर साबित होता है। तिब्बती कभी भी चीनियों को अपना दुश्मन नहीं मानते बल्कि उनका सम्मान करते हैं और उन्हें भाई-बहन ही मानते हैं।''