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महाभारत 2019: गुजरात में भाजपा की चिंता 13 सांसदों का कमजोर रिपोर्ट कार्ड और दलित-पाटीदार मुद्दे, जबकि कांग्रेस असंतुष्टों और गुटबाजी से परेशान

Dainik Bhaskar

Jul 06, 2018, 01:39 AM IST

2014 की मोदी लहर में तो भाजपा ने गुजरात की सभी 26 सीटें जीत ली थीं।

gujarat political scenario under bhaskar mahabharat 2019
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अहमदाबाद. भाजपा 24-25 जून को चिंतन शिविर में 2019 का रोडमैप तैयार कर चुकी है। सीटों का मूल्यांकन और एक्शन प्लान तय हो गया है। दूसरी तरफ विधानसभा चुनावों में स्थिति सुधरने से कांग्रेस उत्साहित है। लेकिन कांग्रेस के असंतुष्टों पर भाजपा की नजर है। हाल ही में कांग्रेस नेता कुंवरजी बावलिया भाजपा में शामिल हुए हैं। उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है।

बावलिया को भाजपा में लाने की काेली वोटर्स में पकड़ मजबूत करना : दरअसल, बावलिया को भाजपा में लाने का मकसद कोली वोटों के प्रभुत्व वाली 4 संसदीय सीटों- सुरेन्द्रनगर, भावनगर, जूनागढ़, राजकोट व दक्षिण गुजरात की दो सीटों पर पकड़ मजबूत करना है। इस पर विधानसभा में विपक्ष के नेता परेश धानाणी कहते हैं कि भाजपा ने हार देख ली है और 26 में से 10 सीट भी जीतने की स्थिति में नहीं है। इसलिए कांग्रेस के प्रतिनिधियों को भाजपा में शामिल किया जा रहा है। हमने लोकसभा क्षेत्रों के प्रभारियों, कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई है। कार्यकर्ताओं की इच्छा के मुताबिक उम्मीदवार चयन प्रक्रिया के बारे में चर्चा की जाएगी।

भाजपा को साख और सीट्स बचाने की कड़ी चुनौती मिलने की वजह निकाय चुनाव में लगा झटका : इधर, भाजपा के प्रदेश प्रमुख जीतू वाघाणी कहते हैं कि 14 लोगों की टीम बनाई है। लोकसभा, विधानसभा सीट प्रभारियों की बैठक नियमित हो रही है। लोग कहते हैं कि भाजपा को साख और सीटें बचाने के लिए कड़ी चुनौती से जूझना पड़ेगा। इसकी वजह भी है। 2014 के बाद जिला पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में उसे करारा झटका लगा था। फिर 2015 में कांग्रेस ने वर्ष 2000 के बाद पहली बार 20 से अधिक जिला पंचायतों पर भारी बहुमत पाया। 33 में से 23 जिला पंचायतें जीत लीं। इसका फायदा उसे विधानसभा चुनाव में भी मिला। एक मुद्दा व्यापारियों की नाराजगी का भी है। गुजरात ट्रेडर्स फेडरेशन के प्रमुख जयेन्द्र तन्ना ने कहा कि नोटबंदी, जीएसटी जैसे निर्णयों से व्यापारी और खासकर छोटे व्यापारी खुद को उपेक्षित मान रहे हैं। जीएसटी की परेशानियों का भी कोई हल नहीं आया है। रिटेल ट्रेड पॉलिसी लाने की मांग पर भी कोई फैसला नहीं हुआ है।

  • भाजपा और कांग्रेस के लिए ये मुद्दे बनेंगे चुनौतियां

भाजपा : 13 नए चेहरे तलाशने की चुनौती: भाजपा की बात करें, तो हाल ही में अमित शाह की मौजूदगी में गुजरात भाजपा का चिंतन शिविर हुआ। इसमें मुख्यत: दो मुद्दों पर बात हुई। पार्टी के आंतरिक सर्वे में 26 में से 13 सांसदों का रिपोर्ट कार्ड बहुत कमजोर आया। इनमें परेश रावल समेत अहमदाबाद के दो सांसद, भरूच सांसद मनसुख वसावा और सूरत सांसद दर्शनाबेन जरदोश शामिल हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और गांधीनगर से सांसद लालकृष्ण आडवाणी के दोबारा चुनाव लड़ने या गांधीनगर से टिकट मिलने की संभावनाएं कम ही हैं। इसका मतलब है कि भाजपा को इस बार 13 से 14 नए चेहरों की तलाश करनी होगी।

सामाजिक-राजनीतिक समीकरण में भाजपा के लिए उभर रही चुनौती : मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात बहुत जटिल हैं। पाटीदार आंदोलन अभी भले ही शक्तिहीन दिख रहा हों, लेकिन चुनाव में इसके प्रभाव को खारिज नहीं किया जा सकता। 182 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा-कांग्रेस दोनों के करीब 54 पाटीदार विधायक चुने जाते थे। अब इनकी संख्या घटकर 40 हो गई है। पाटीदारों के अलावा दलित, ओबीसी और आदिवासियों में बढ़ रहा विरोध भी भाजपा के लिए चिंता का सबब है। कोली और ठाकोर समाज के युवकों पर जातिगत आधार पर हमले और हिंसक घटनाओं की गूंज पूरे राज्य में सुनी जा रही है। राज्य में दलित जनसंख्या 7.5% और आदिवासी 15% हैं, जबकि ओबीसी 50% से अधिक हैं। बीजेपी के खिलाफ पाटीदार, दलित, किसान और व्यापारी सड़क पर नाराजगी जता चुके हैं। ऐसे में इस जातिगत संतुलन के त्रिकोण में भाजपा एक साधे, दो टूटने जैसे हालात से जूझ रही हैं।

कांग्रेस: नेतृत्व नया लेकिन गुटबाजी जस की तस: कांग्रेस ने 25 साल में सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए विधानसभा चुनाव में 78 सीटें जीतीं। पार्टी युवा और नए नेतृत्व में काम कर रही है। ऐसे में प्रदेश के नए नेतृत्व के लिए लोकसभा चुनाव अग्निपरीक्षा के समान है। क्योंकि नेतृत्व भले ही बदल गया हो, पर वर्षों पुरानी गुटबंदी और खींचतान जस के तस हैं। दूसरी ओर कुंवरजी बावलिया के पार्टी छोड़ने के बाद मेहसाणा के पूर्व सांसद जीवाभाई पटेल ने भी तवज्जो न मिलने से व्यथित होने की बात कही है। सौराष्ट्र में कोली समाज निर्णायक वोट बैंक है। सुरेन्द्रनगर, भावनगर, जूनागढ़ एवं राजकोट सीट पर कोली समाज के वोट ही हार-जीत तय करते हैं। कांग्रेस को भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए नाराज नेताओं को साधना होगा और उनमें संतुलन बिठाना होगा।

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