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बिना सेना और जंग के भारत ने 2000 साल पहले बनाया था 'ग्रेटर इंडिया रूट

बिना सेना और जंग के भारत ने 2000 साल पहले बनाया था ग्रेटर इंडिया रूट।

DainikBhaskar.com | Last Modified - May 31, 2018, 12:43 PM IST

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    2000 साल पुराना भारत का ग्रेटर इंडिया रूट।

    नई दिल्ली/जकार्ता. पीएम मोदी पांच दिन के इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर दौरे पर हैं। तीनों देशों में इंडोनेशिया का दौरा चीन को काउंटर करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चीन भारत को जमीनी और समुद्री दोनों रास्तों से घेर रहा है। जमीनी रास्ते से घेरने के लिए उसने 'वन बेल्ट-वन रोड' प्रोजेक्ट शुरू किया है। जिसमें चीन से लेकर अफ्रीका तक के 65 देश शामिल हैं। इन्हें जोड़ने रेल और सड़क मार्ग बनाया जा रहा है। जबकि दूसरा समुद्री रास्ता है, जो इंडोनेशिया से होकर जाता है। दोनों को 'न्यू सिल्क रूट' कहा जाता है।

    चीन चूंकि इस प्रोजेक्ट पर अरबों रुपए लगा रहा है तो जिन देशों से होकर ये रूट बना रहा है, वहां की सुरक्षा के नाम पर अपनी सेना की दखलंदाजी भी बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना की ताकत और पैसे से कमजोर देशों पर दबाव बना रहा है। उन पर दहशत कायम कर रहा है। लेकिन आपको बता दें कि चीन आज 'वन बेल्ट वन रोड' प्रोजेक्ट के नाम पर जिस तरह देशों पर प्रभाव जमाने का काम कर रहा है। वह काम भारत 2000 साल पहले ही बिन सेना, जंग और हथियारों के कर चुका है।

    भारत ने सिर्फ अपनी संस्कृति की दम पर पूरे साउथ-ईस्ट एशिया के देशों में अपना प्रसार कर एक 'ग्रेटर इंडिया' बना लिया था। भारत का इन देशों पर सांस्कृतिक रूप से इतना जबर्दस्त प्रभाव था जिसका अस्तित्व सदियां गुजर जाने के बाद आज भी कायम है।

    क्या है ग्रेटर इंडिया रूट?

    - दो सदियां पहले साउथ-ईस्ट एशिया के कई देशों में हिंदू संस्कृति का प्रचार हुआ था। वहां के निवासी हिन्दू संस्कृति में रंग गए थे। इस पूरे क्षेत्र को ग्रेटर इंडिया (वृहत भारत) कहा जाता है।

    - प्राचीन भारत में चालुक्य और पल्लव वंश के राजाओं ने हिंदू और बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए दक्षिण एशियाई देशों का रुख किया। दरअसल, उस वक्त के भारतीय राजा धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ दूसरे देशों में व्यापार को सुगम बनाने का रास्ता खोज रहे थे। ऐसे में ग्रेटर इंडिया यानी वृहत भारत का रास्ता निकाला।

    - ग्रेटर इंडिया में भारत समेत ऐसे देश थे, जिनपर भारतीय संस्कृति का प्रभाव था। इसमें बर्मा (म्यांमार), थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, चंपा (दक्षिणी वियतनाम), मलेशिया, ब्रुनेई और इंडोनेशिया शामिल थे। इन सभी देशों में आज भी हिंदू संस्कृति की छाप साफ देखी जाती है।(मैप में देखें)
    - भारतीय राजाओं का उद्देश्य दक्षिण एशियाई देशों में सिर्फ हिंदू धर्म की संस्कृति का प्रचार करना था, किसी को जीतना या डराना नहीं।


    व्यापार और धर्म का रास्ता था ग्रेटर इंडिया
    - उस समय भारत के व्यापारी नए मौकों की तलाश में दुनियाभर में यात्राएं करते थे। वह सोने की खोज में इंडोनेशिया और कंबोडिया की यात्रा पर जाते थे। इतिहास में उनके जावा, सुमात्रा और मलाया द्वीपों की यात्रा के प्रमाण मिलते हैं। इसलिए प्राचीनकाल में इसे 'सुवर्ण द्वीप' कहा जाता था। सुवर्ण का मतलब होता है सोना यानी सोने का द्वीप।


    किस तरह अलग है चीन के सिल्क रूट?
    - करीब दो हजार साल पहले चीन ने भी व्यापार बढ़ाने और बाकी दुनिया से जुड़ने के लिए व्यापारिक रास्ते तैयार किए थे। इसमें सेंट्रल एशिया और अरब से जोड़ने वाले ट्रेड रूट बनाए थे। तब चीन इस रास्ते के सहारे दुनिया में सबसे ज्यादा सिल्क एक्सपोर्ट करता था। इसलिए इसे 'सिल्क रूट' कहा जाता था।
    - चीन के हन राजवंश के दौर में सिल्क का बिजनेस बढ़ा। चीनी व्यापारी सिल्क को चीन से निकालकर मध्य एशिया तक ले जाते थे। यहां से भारतीय व्यापारी सिल्क लेकर और उसके साथ मसालों को लादकर रोम शहर में जाकर बेचते थे। इसके बदले में वह सोना लाते थे। जब सिल्क रूट लुटेरों की वजह से खतरनाक हो गया तो व्यापार समंदर के रास्ते होने लगा था।

    - ठीक उसी दौर में भारत ने धर्म के प्रचार के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया देशों तक ग्रेटर इंडिया रूट विकसित किया था। यही वजह है कि हजार सालों में इस इलाके में भुगोल और इतिहास बदलने के बाद भी संस्कृति छाप बरकरार है।


    क्या भारत फिर से डेवलप कर सकता है ग्रेटर इंडिया?
    - भारत के ग्रेटर इंडिया रूट को फिर से डेवलप करने की कोई संभावना नहीं है। फिर भी भारत चीन के खिलाफ साउथ-ईस्ट एशिया के देशों के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है। चीन के साथ कई आसियान देशों से तनातनी चल रही है। इसमें सबसे बड़ा मुद्दा दक्षिण चीन सागर का है। इस सागर पर कई देश अपना अधिकार जताते हैं।
    - वहीं, इसी साल भारत ने आसियान देशों के प्रमुखों को गणतंत्र दिवस की परेड पर मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था।
    - आसियान यानी 'एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशिया नेशन्स', दक्षिण एशिया के देशों के ग्रुप 'सार्क' की तरह है। इसमें इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस, म्यामांर, कंबोडिया, लाओस आैर ब्रुनेई शामिल हैं।
    - ऐसे में सवाल उठता है कि गणतंत्र दिवस पर आसियान देशों को एक साथ बुलाना और मोदी का इंडोनेशिया दौरा, क्या चीन के खिलाफ एकजुट होने का संकेत देता है।

    आगे देखें, वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का मैप

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    वर्तमान में चीन का वन बेल्ट वन रोड।

    वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट?

    - करीब 2000 साल पहले चीन ने सिल्क रूट तैयार किया था। जिसके तहत चीन को सेंट्रल एशिया और अरब से जोड़ने वाले ट्रेड रूट बनाए गए थे। उस वक्त चीन सबसे ज्यादा सिल्क एक्सपोर्ट करता था। इसलिए रूट का नाम सिल्क रूट पड़ गया। अब उसी सिल्क रूट को चीन नए रूप में तैयार कर रहा है।

    - चीन ने सिल्क रूट को 'वन बेल्ट वन रोड' नाम से शुरू किया है। जिसका मकसद रेलवे, बंदरगाहों, हाइवे और पाइपलाइन के नेटवर्क के जरिए एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़कर व्यापार बढ़ाना है। प्रोजेक्ट के जरिए चीन व्यापार के लिए 60 से ज्यादा देशों का नेटवर्क तैयार कर रहा है। भारत ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है।

    क्या है न्यू मैरीटाइम सिल्क रूट?

    वन बेल्ट वन रोड के दो रूट होंगे। पहला रूट जमीन पर तैयार होगा, जो चीन को सेंट्रल एशिया के जरिए यूरोप से जोड़ेगा। दूसरा रूट समुद्र मार्ग से चीन को साउथ ईस्ट एशिया और ईस्ट अफ्रीका होते हुए यूरोप से जोड़ेगा। जो चीन के फुझाउ, ग्वानझाऊ से होते हुए वितयनाम के हनोई, जकार्ता, मलेशिया, इंडोनेशिया के समुद्री मार्ग से होते हुए कीनिया, ग्रीस और इटली तक जाएगा। इसे ही 'मैरीटाइम सिल्क रूट' कहा जा रहा है।

    वन बेल्ट वन रोड पर चीन की पॉलिसी
    विदेश मामलों के जानकार की मानें तो इस प्रोजेक्ट के जरिए चीन एशिया में बड़ी ताकत बनकर उभरेगा। वन बेल्ट वन रोड के जरिए चीन दुनिया के 60 से ज्यादा देशों को एक-दूसरे के करीब लाएगा और दुनिया की दो तिहाई आबादी को सीधे अपनी अर्थव्यवस्था से जोड़ देगा। वहीं अपने सस्ते और बेहतर उत्पादों को दुनिया के बाजारों तक आसानी से पहुंचा पाएगा।

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