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देश में यूरिया के लिए थम गए आंदोलन, कभी बम बनाने में भी इसका इस्तेमाल होता था

Dainik Bhaskar

Jun 12, 2018, 08:27 PM IST

हर साल देश में 148 लाख टन यूरिया का इस्तेमाल होता है

How fulfilled demand of urea in India for which movement were comman in a period

  • आंदोलन रुकने की वजह है नीम कोटिंग, इससे यूरिया का बम बनाने में होने वाला दुरुपयोग रुका और उपलब्धता बढ़ी
  • चार प्लांट शुरू हुए तो, 5 साल में आयात बंद कर देंगे, 10 साल में निर्यात करने लगेंगे

नई दिल्ली. यूरिया की उपलब्धता को लेकर देश में अब कोई संकट नजर नहीं आता। इस यूरिया के लिए देशभर में कभी किसानों के बड़े आंदोलन होते थे। लेकिन अब हालत यह है कि 2012 से 2016 के बीच जिस यूरिया की बिक्री 30 से 30.6 मिलियन टन के बीच रही, इस साल वह घटकर 28 टन हो गई। संकट और किल्लत खत्म होने के दो कारण हैं। पहला- अब यूरिया पर 100 फीसदी नीम कोटिंग हो रही है। इससे बम बनाने जैसी गतिविधियों में यूरिया का गलत इस्तेमाल थम गया है। दूसरा- मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजना लागू करने के चलते यूरिया की खपत में गिरावट आई है। इस योजना के तहत मिट्‌टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम (एनपीके) स्तर को 4:2:1 पर लाना है।

यूरिया का आयात 1 साल में 7.25% घटा

- यूरिया की मांग 320 लाख टन है

- 50-70 लाख टन हर साल आयात करना होता है

- 226 लाख टन घरेलू उत्पादन

- 135 टन इस साल उत्पादन रहा

- 140 टन पिछले साल था

- 16 हजार रुपए प्रति टन उत्पादन पर खर्च होते हैं

- 5,360 रुपए प्रति टन कीमत पर बेचा जाता है

- 7.25% यूरिया का आयात कम हुआ

- पिछले साल 40 लाख टन आयात

- इस साल 37.10 लाख टन आयात

कैसे पूरी हुई कमी ?

इसके तीन बड़े कारण हैं - नीम कोटिंग, छोटे बैग और पुराने प्लांट दोबारा शुरू करना।


1) छोटे बैग

पहले किसानों को 50 किलो के बैग में यूरिया मिलती थी। अप्रैल 2018 से सरकार ने 45 किलो के बैग बनाने शुरू कर दिए हैं। ये इसलिए कारगर रहा क्योंकि किसान वजन से यूरिया का इस्तेमाल नहीं करते हैं। हर साल इससे 7,000 करोड़ रुपए की बचत होगी।

2) नीम कोटिंग

- यूरिया के इस्तेमाल को कम करने के लिए दो प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं- एसएचसी और एनसीयू।

- एनसीयू 2008 से शुरू किया गया। तब 20% यूरिया को ही नीम कोटेड करने की अनुमति थी। 2010 में इसे बढ़ाकर 35% किया और 2015 में 100% कर दिया गया।

- इसमें एक टन यूरिया को 400 एमएल नीम तेल से कोटिंग की जाती है। जरूरी फर्टिलाइजर के कंपोजिशन को नीम कोटिंग देकर बदला गया है। सभी फर्टिलाइजर आउटलेट्स के लिए अब नीम कोटेड यूरिया बेचना अनिवार्य है।

इसका फायदा

- नीम कोटिंग से गैर कृषि कार्यों में यूरिया का उपयोग नहीं हो पाता। गलत इस्तेमाल रुक जाता है। वरना इसे विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल किया जाता रहा है। मिट्‌टी को ज्यादा पोषण मिलता है। पौधे को लंबे समय तक पोषण मिलता है। बार-बार फर्टिलाइजर के इस्तेमाल की जरूरत नहीं होती। पैदावार बढ़ती है और पैसे की भी बचत होती है। यूरिया की लाइफ बढ़ती है।

बम बनाने में होता था इस्तेमाल, नीम कोटेड होने से यह बंद हुआ

नॉर्थ ईस्ट में कई बार बम बनाने के लिए यूरिया के इस्तेमाल की बात सामने आई है। कई बार बम बनाने वाली जगहों से यूरिया बरामद भी की गई। या तो इसे विस्फोटक की तरह इस्तेमाल करने के लिए कैमिकल्स में मिलाया जाता है या फिर आरडीएक्स और टीएनटी की तीव्रता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।


3) चार प्लांट दोबारा शुरू किए जाएंगे

- सरकार ने यूरिया के चार प्लांट को दोबारा शुरू करने का फैसला किया है। इनमें गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), बरौनी (बिहार), तलचर (ओडिशा) और रामागुनदम (तेलंगाना) प्रमुख हैं। यूरिया प्लांट्स को फिर शुरू करने के लिए सरकार ने गैस पाइपलाइन बिछाने के लिए 10 हजार करोड़ रूपए दिए हैं।

- न्यू इन्वेस्टमेंट पॉलिसी के तहत पश्चिम बंगाल के पानागढ़ में ग्रीनफील्ड अमोनिया यूरिया कॉम्प्लेक्स तैयार किया गया है। जिसकी क्षमता 1.3 एमएमटी सालाना है। 1 अक्टूबर 2017 से उत्पादन शुरू हो चुका है। सब्सिडी के लिए यूनिट को अपनी क्षमता का 50% इस्तेमाल करना जरूरी है और एसएसपी यूनिट के लिए 40 हजार एमटी प्रोडक्शन जरूरी है।

- चार प्लांट शुरू हुए तो, 5 साल में आयात बंद कर देंगे, 10 साल में निर्यात करने लगेंगे।

कैसे तय होती है कीमत ?

- यूरिया का मार्केट पूरी तरह सरकार कंट्रोल करती है। कीमत 5350 रुपए प्रति मीट्रिक टन तय की गई है। फर्टिलाइजर मूवमेंट कंट्रोल ऑर्डर के तहत निर्माता, आयात और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए साफ निर्देश दिए गए हैं। सिर्फ चार फर्म इसका आयात कर सकते हैं। कब और कितना आयात होना है और उन्हें क्या सब्सिडी दी जाएगी ये भी स्पेसिफिक है।

- भारत दुनिया में फर्टिलाइजर्स का दूसरा सबसे ज्यादा खपत करने वाला और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारतीय फर्टिलाइजर सेक्टर देश में सबसे ज्यादा रेग्युलेटेड सेक्टर है। फर्टिलाइजर बिजनेस से जुड़ी हर चीज पर सरकार का कंट्रोल रहता है। सरकार किसानों के लिए सस्ते फर्टिलाइजर मुहैया कराने के लिए सब्सिडी देती है। पिछले साल का सब्सिडी बिल 70 हजार करोड़ है। 2018-19 में यूरिया सब्सिडी 45 हजार करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।

- दुनियाभर में भारत में यूरिया की कीमत सबसे कम है। बाहर इसकी कीमत 86 डॉलर प्रति टन है। वहीं साउथ एशिया और चीन जैसी जगहों पर भारत से दो से तीन गुना ज्यादा।

- 2020 तक यूरिया की कीमत नहीं बढ़ेगी। सब्सिडी के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर लागू कर दिया गया है। और इसकी कीमत 5360 रुपए प्रति टन रहेगी। यानी एक बोरी की कीमत 268 से 300 होगी।

- 7यूरिया की कीमतों को कम करने के लिए पिछले 12 सालों से 5% सब्सिडी दी जा रही है। जबकि डीएपी और बाकी फर्टिलाइजर्स पर ये काफी कम है। यही वजह है कि किसान यूरिया ही इस्तेमाल करना चाहते हैं।


यूरिया

- खुदरा कीमत 270 रुपए हर 50 किलो के बैग की कीमत

- कीमत निर्धारण सरकार द्वारा

- सप्लाई की कीमत 970 रुपए हर 50 किलो के बैग के लिए

- सब्सिडी के साथ कीमत 700 रुपए हर 50 किलो के बैग के लिए

- सब्सिडी कैल्कुलेशन - सप्लाई की कीमत माइनस खुदरा कीमत


डीएपी

- कीमत 1190 रुपए हर 50 किलो के बैग की कीमत

- सप्लाई की कीमत 1,810 रुपए हर 50 किलो के बैग के लिए

- सब्सिडी के साथ कीमत 620 रुपए हर 50 किलो के बैग के लिए

- सब्सिडी कैल्कुलेशन - सरकार द्वारा तय


एमओपी

- कीमत 850 रुपए हर 50 किलो के बैग की कीमत

- सप्लाई की कीमत 1,300 रुपए हर 50 किलो के बैग के लिए

- सब्सिडी के साथ कीमत 450 रुपए हर 50 किलो के बैग के लिए

एमआरपी प्रति टन

- यूरिया - 5,360 रुपए

- अमोनियम फॉस्फेट सल्फेट - 23,124 रुपए

- नाइट्रोजन फॉस्फेट पोटाश - 22,780 रुपए

(डिपार्टमेंट ऑफ फर्टिलाइजर के 2014 के आंकड़े)


यूरिया इंडस्ट्री में नुकसान

- राज्यों में लगे यूरिया प्लांट में से 50% घाटे में चल रहे हैं। रिटर्न की बात करें तो साल 2016-17 में -0.73% था।

- यूरिया के निर्यात में भी 34% की कमी 2014 के बाद से आई। चार बड़ी यूरिया प्रोडक्शन यूनिट ने 2014 में काम करना बंद कर दिया।

- 1990 से अभी तक 13 यूनिट या तो बंद हो गए हैं या काम रुका हुआ है।

(आंकड़े फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक)


भास्कर ने सवालों के जवाब जानने के लिए फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के डीजी सतीश चंद्र से बात करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।

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