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महाभारत 2019: देश में चुनाव सिर्फ विकास के मुद्दे पर नहीं हो सकते, दुर्भाग्य से कास्ट, क्रिमिनल और कैश भी प्रभाव रखते हैं- गडकरी

​सड़क परिवहन मंत्री व पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से दिल्ली के संपादक आनंद पांडे और संवाददाता शरद पांडे ने बातचीत की।

Bhaskar News | Last Modified - Jul 05, 2018, 07:54 AM IST

महाभारत 2019: देश में चुनाव सिर्फ विकास के मुद्दे पर नहीं हो सकते, दुर्भाग्य से कास्ट, क्रिमिनल और कैश भी प्रभाव रखते हैं- गडकरी, national news in hindi, national news
  • गडकरी ने कहा कि विपक्ष केवल हमारे डर की वजह से एक हो रहा है
  • मैं पीएम पद के सपने नहीं देखता, संभावना भी नहीं है और इच्छुक भी नहीं हूं

नई दिल्ली. सड़क परिवहन मंत्री और पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से दैनिक भास्कर दिल्ली के संपादक आनंद पांडे और संवाददाता शरद पांडे ने 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर खास बातचीत की। एकजुट विपक्ष, सरकार की छवि, नोटबंदी और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय पर जाने जैसे अहम मुद्दों पर गडकरी ने अपनी बात रखी। पेश हैं प्रमुख अंश-

Q. क्या आपको लगता है कि हिन्दुस्तान में विकास के मुद्दे पर चुनाव हो सकते हैं?

A. ये सही है कि चुनाव पूरी तरह विकास के मुद्दे पर नहीं हो सकते। हिन्दुस्तान का दुर्भाग्य है कि राजनीति में कैश, कास्ट एंड क्रिमिनल का भी प्रभाव है। पर नई पीढ़ी विकास के प्रति सजग है। जाति, पंथ, धर्म, भाषा से ऊपर उठ चुकी है।

Q. आप विजन की बात कर रहे हैं, पर पिछले चार साल में जो माहौल बना है उससे लग रहा है कि धार्मिक कट्‌टरता बढ़ी है?
A.
(थोड़ा तेज आवाज में) - ये गलत है। हम जिस दिन से सत्ता में आए हैं, विरोधी हमें मुस्लिम और दलित विरोधी बता रहे हैं। हम जाति, धर्म, पंथ और भाषा पर भेदभाव नहीं करेंगे। आप बताएं मेरी कोई भी योजना ऐसी है, जिसमें कहा गया है कि मुसलमान आवेदन न करें? रोजगार दिया तो क्या यह कहा कि इस जाति वालों को नहीं देंगे? बल्कि इसका उल्टा है कि हम जातिवाद से मुक्त हैं। जो एक ही जाति की राजनीति करते हैं, वही हमारी अड़चन हैं।

Q. जब आप कहते हैं कि जाति-धर्म नहीं देखते, तो आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए?
A.
शैक्षिक, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन दुर्भाग्य से सच्चाई है। आदिवासियों को 300-400 साल पहले स्कूल जाने से रोका गया। इससे सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन अाया। हालांकि आज ऐसा नहीं है। उन्हें समाज की मुख्य धारा में आने तक आरक्षण देना होगा। बाबा साहब ने कहा था कि आरक्षण स्थायी नहीं है। सामाजिक, आर्थिक आधार पर आरक्षण देना है। दूसरी तरफ जिन्हें आरक्षण नहीं है और पिछड़े हुए हैं, वो जीवनयापन नहीं कर सकते हैं। जैसे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। उन्हें आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए। जब तक समाज स्वस्थ नहीं हो जाता तब तक इस पर झगड़ा करना ठीक नहीं है।

Q.अब तो जनरल कैटेगरी के लोग बोल रहे हैं कि आरक्षण बंद करना होगा?
A. जनरल कैटेगरी के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए सोचना होगा। आरक्षण का उपयोग राजनीति के लिए नहीं होना चाहिए। यह संवेदनशील विषय है। चुनाव जीतने के लिए, आरक्षण के लिए जातियों का उपयोग कर लड़ना ठीक नहीं है।

Q. इसके बावजूद चुनाव में मुद्दे दलित के होते हैं, किसान के होते हैं?
A. किसान आर्थिक और दलित सामाजिक मुद्दा है। जो किसान हैं, दलित समाज से हैं, उनकी गरीबी का संबंध जात-धर्म से नहीं है।

Q. पिछले 100 साल से भी अधिक समय से किसानों की स्थिति ज्यों की त्यों है?
A. (बीच में काटते हुए) नहीं ऐसा नहीं है। जब मैं अध्यक्ष था, यूपी में गन्ने का उत्पादन 55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर था। आज 70-75 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है। स्थितियां बदली हैं।

Q. डेटा अपनी जगह हैं, पर किसानों के सुसाइड पहले भी हो रहे थे और आज भी?
A. सहमत हूं कि किसान आज भी अस्वस्थ हैं। गांधीजी कहते थे कि 90% आबादी गांवों में रहती है। आज आंकड़ा 65% हो गया है। दिल्ली-मुंबई की जनसंख्या क्यों बढ़ी? क्योंकि गांवों में अच्छे स्कूल, अस्पताल, रोड नहीं हैं। किसान की फसल की कीमत नहीं है। यह इसलिए हुआ क्योंकि पं. नेहरू के मॉडल में गांव-गरीब और किसान की अनदेखी की गई थी। इसलिए ये स्थितियां थीं।

Q. 2019 के चुनाव आने वाले हैं। अब तीन धारणाएं बन रही हैं। मोदी लहर पहले जैसी नहीं रही। पूरा विपक्ष एकजुट हो रहा है और सरकार रिजल्ट नहीं दे पाई। क्या इससे आपको चुनाव में परेशानी होगी?

A. हम मजबूत हुए, इसलिए जो पार्टियां एक-दूसरे की तरफ देखती नहीं थीं, वो गले मिल रही हैं। विपक्ष के पास कोई सैद्धांतिक और वैचारिक समानता नहीं है। इनका नेता भी एक नहीं है। न ही हो सकता है। ये केवल हमारे डर से इकट्ठे हो रहे हैं। 2014 में लोग परिवर्तन चाहते थे इसलिए भाजपा और मोदीजी को चुना। जो 50-60 साल में कांग्रेस नहीं कर सकी, 48 साल में गांधी परिवार नहीं कर सका, वो काम हमारी सरकार ने 4 साल में किए हैं। कोई काम अंतिम नहीं होता, जितना काम करते हैं उतनी अपेक्षाएं बढ़ती हैं।

Q. अपेक्षाएं बहुत थीं, इसका मतलब है कि सरकार उतना नहीं कर पाई?
A. अपेक्षाओं का फिक्स काॅन्सेप्ट नहीं होता है। एक पूरी होती है तो दूसरी पैदा हो जाती है। 10 करोड़ लोगों के घरों में मिट्टी का चूल्हा जलता था। साढ़े चार करोड़ लोगों को गैस कनेक्शन दिया है। एक साल में बाकी लोगों को भी मिल जाएगा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लाखों को घर मिले हैं, क्या उनके अच्छे दिन नहीं आए?

Q. लेकिन विपक्ष का आरोप है कि वादों के हिसाब से रोजगार नहीं मिले?
A. रोजगार और नौकरी में फर्क है। सिर्फ मेरे विभाग में 10 लाख करोड़ के काम हो रहे हैं। इसमें भी काम करने वाले लोग हैं, तो क्या उनके लिए रोजगार नहीं है? हमारी इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में टर्नओवर दोगुना हो गया है। ट्रक मैन्युफैक्चरिंग का उत्पादन दोगुना हो गया है। इनमें मशीनों को चलाने वाले लोग हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर को बूस्ट नहीं मिला क्या? हाईवे बनाने वाले इंजीनियर, कॉन्ट्रैक्टर को काम नहीं मिला क्या? हां! यह एक साइकिल होता है कि एक सेक्टर के लिए अच्छा और दूसरे के लिए बुरा। जैसे अभी शुगर सेक्टर के लिए खराब दिन हैं। स्टील सेक्टर बढ़ रहा है। स्टील खराब होगा तो सीमेंट के लिए अच्छा होगा। देश में 40% सीमेंट हमारा मंत्रालय खरीदता है। सीमेंट इंडस्ट्री में रात-दिन काम चल रहा है। क्या उन्हें रोजगार नहीं मिला? हां! एक बात सच है कि काम भी मिल रहा है, रोजगार भी बढ़ रहा है और आबादी भी बढ़ रही है। किसानों के लिए सरप्लस प्रोडक्शन हुआ है। जब दालें 180 रुपए थीं तो हमारी बहुत आलोचना हुई। दाल 50 रुपए हुई, तो किसानों की हालत खराब हो गई। शुगर का 36 रुपए भाव है, एक समय 24 रुपए हो गया था। हां! निष्क्रियता अच्छी नहीं है। मनमोहन सिंह की सरकार में निष्क्रियता थी, आज नहीं है।

Q. नोटबंदी का सरकार ने बहुत प्रचार किया था, लेकिन पिछले चार माह से ज्यादा बात नहीं कर रही है सरकार, कहीं यह फैसला...
A. (बीच में रोकते हुए) बात की तो कहते हो ...क्यों की, नहीं की तो क्यों नहीं की। प्याज सस्ता हुआ तो किसान संकट में और महंगा हुआ तो ग्राहक संकट में। ये सब लोकतंत्र का तकाजा है। ऐसा ही चलता आया है, देश भी ऐसे चलता है।

Q. अगर यूपी में सपा, बसपा साथ आते हैं तो वहां 50-60 सीटों का नुकसान हो सकता है। इसकी भरपाई कहां से करेंगे?

A. मायावती और अखिलेश इकट्ठे हुए हैं। इनके संबंध पहले कैसे थे, सब जानते हैं। दोनों के बीच प्रेम क्यों हुआ? क्या कोई वैचारिक समानता आई है? यह हमारे मजबूत होने का संकेत है। मुकाबला कड़ा जरूर होगा, लेकिन हमारी ताकत भी बढ़ी है। अभी तो एकजुटता अच्छी लग रही है। लोकसभा चुनाव में जहां बसपा का उम्मीदवार दूसरे नंबर पर था वहीं सपा का तीसरे पर। तो बसपा को टिकट मिलता है तो क्या सपा वाला उसे वोट देगा?

Q. प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय जाने में आपकी प्रमुख भूमिका मानी जा रही है?
A. मेरी प्रमुख भूमिका नहीं है। हां, प्रणबजी जब राष्ट्रपति थे तो बहुत बार मिलता था। मैंने ही एक बार कहा था कि आपका संघ से कभी इंटरेक्शन हुआ है, तो बोले नहीं। मैंने कहा कि एक बार समझ लीजिए, वो क्या कह रहे हैं। आपको लगता है कि यह विचार गलत है, तो वो भी आप बताएं। अगर आप अनुमति दें तो मोहन भागवतजी से कहूंगा कि आपसे मिलें। मैंने भेंट कराई। फिर भागवतजी मिले। इसके बाद दो-तीन बार मिलते रहे। फिर सहज हो गए। उन्होंने नागपुर कार्यक्रम के लिए प्रणबजी से अनुरोध किया और वो आए। उनके जाने के पीछे कोई रणनीति या प्लान नहीं था।

Q. शत्रुघ्न सिन्हा का कहना है कि पार्टी में सुनवाई नहीं हो रही है। कोई फोरम नहीं है, जहां वो अपनी बात रख सकें?
A. वो मीडिया में सुनवाई कर रहे हैं। उन्हें पार्टी में बात करनी चाहिए। वो फोरम की बात करते रहे हैं, जो मिलना चाहता है, वो मिल रहा है न। ये हर पार्टी में होता है। कहीं खुश होते हैं, कहीं नाराज होते हैं। पार्टी में थोड़ा बहुत चलता है।

Q. अगर भाजपा को अकेले बहुमत नहीं मिलता है तो पीएम के लिए मुफीद चेहरा आपका माना जा रहा है?
A. (सवाल खत्म होने से पहले) बिल्कुल नहीं। मैं मुंगेरीलाल के हसीन सपने नहीं देखता। मैं कोई दावा नहीं करता। मैं नागपुर में पार्टी के पोस्टर चिपकाता था। दीवारों पर चूना लगाता था। ये मेरी औकात थी। इसके बाद मैं बीजेपी अध्यक्ष बना, मंत्री बना, विपक्ष का नेता बना, महाराष्ट्र का मंत्री था। पीएम पद के सपने नहीं देखता, संभावना भी नहीं है और इच्छुक भी नहीं हूं। मैं इस रेस में ही नहीं हूं।

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