​ममता जाएंगी एनडीए में!

4 वर्ष पहले
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असली संकट ममता बनर्जी के साथ है। धर्मसंकट भी और कर्मसंकट भी। जैसे वह यह तो चाहती हैं कि मोदी प्रधानमंत्री न रहें, लेकिन साथ ही राहुल गांधी से भी उन्हें खासी चिढ़ है। धर्म और कर्म के साथ मर्मसंकट यह कि ममता जल्दी से जल्दी अपने भतीजे अभिषेक को मुख्यमंत्री बनाना चाहती हैं। तो क्या इसके लिए वह 2019 में एनडीए में शामिल होंगी? चर्चा तो ऐसी ही है। 

 

नाकाम रहे आम 
वैसे ममता हैं समझदार। अपनी ओर से ऐसी कोई गलती वह तब तक नहीं करतीं, जब तक वह खुद न करना चाहें। जैसे इस बार वह सर्कुलर रोड स्थित बंग भवन में ठहरीं, न कि हमेशा की तरह अभिषेक बनर्जी के सांसद फ्लैट में। इस बार अहमद पटेल उनसे मिलने आमों की टोकरी लेकर यहीं आए थे। टोकरी में चिट्ठी यही थी कि ममता को कांग्रेस के साथ रहना चाहिए और संघीय मोर्चा नहीं बनाना चाहिए। लेकिन ममता बनर्जी ने उनसे दो टूक कह दिया कि राहुल गांधी क्षेत्रीय दलों के लिए मददगार नहीं हैं। 

 

हमारा ही कुमार और हमारा ही स्वामी? 
कांग्रेस के लिए ममता अकेली समस्या नहीं हैं। समस्याओं की टोकरी पूरी फुल है। एक हैं कुमारस्वामी जी, मुख्यमंत्री कर्नाटक। दिल्ली आए, केजरीवाल से समर्थन जताने के लिए चंद्र बाबू नायडू, पिनाराई विजयन और ममता से मिले, लेकिन इस मसले पर राहुल गांधी से बात तक नहीं की। कांग्रेस के बहुत से नेता परेशान हैं। हमारा ही कुमार और हमारा ही स्वामी? जब कांग्रेस और अजय माकन केजरीवाल के खिलाफ हैं, तो वह केजरीवाल के घर क्यों गए? कर्नाटक कैबिनेट में भी कांग्रेस परेशानी महसूस कर रही है। भारी मतभेद चल रहे हैं। ऐसे होगी विपक्षी एकता? 

 

समावेश का नॉनवेज आइडिया 
रेल मंत्री पीयूष गोयल की पिछली प्रेस कॉन्फ्रेंस में शाकाहारी और गैर-शाकाहारी भोजन परोसा गया था। हालांकि जब वह बिजली मंत्री थे, तब उन्होंने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लिए शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा था। अब पीयूष गोयल फिर गैर शाकाहारी पार्टियां करवा रहे हैं। शायद यह यू-टर्न 2019 के पहले का सर्व समावेशी आइडिया हो। 

 

काॅन्स्टिट्यूशन क्लब में गिलोटिन 
दिल्ली के काॅन्स्टिट्यूशन क्लब में बहुत चहल-पहल रहती है। जिम और क्लब तो पहले से था, अब सैलून भी बहुत लोकप्रिय हो रहा है। कई राष्ट्रीय नेता यहां आते रहते हैं। लेकिन सबसे मजेदार है- सैलून 
का नाम- गिलोटिन। यह एक यंत्र का नाम है, जो फ्रांस में क्रांति के दिनों में दुश्मनों की गर्दनें काटने के लिए इस्तेमाल होता था। संसदीय प्रक्रिया में भी यह शब्द लगभग इसी अर्थ में इस्तेमाल होता है। जाहिर है इस वाले गिलोटिन में बहुत से सांसद सिर की मालिश कराने से संकोच करते हैं। 

 

फिर वही कहानी 
क्या फिर होगा मंत्रिमंडल फेरबदल? यह सबसे पसंदीदा गपशप होती है, और फिलहाल इसके अनुसार 2019 आमचुनाव और यहां तक कि राज्य विधानसभा चुनावों से भी पहले प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल में फेरबदल कर सकते हैं। बात में वजन यह है कि शिवसेना जैसे सहयोगियों के लिए थोड़ी गुंजाइश निकालनी होगी। और शहरी विकास आदि मामलों के कामकाज को परखा जा रहा है। और यह कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में असंतोष को संभालने के लिए कुछ सांसदों को शपथ दिलानी होगी। हर बार की तरह कहानी का उपसंहार यही है कि - लेकिन करना तो प्रधानमंत्री को ही है, और वे वास्तव में क्या चाहते हैं, यह कोई नहीं जानता। 

 

कड़क रक्षा मंत्री 
रक्षा भूमि को लेकर सेना और रक्षा मंत्री के बीच मतभेद थे। सेना रक्षा भूमि को लेकर जिद पर अड़ी भी थी, लेकिन आखिर में रक्षा मंत्री भी अड़ गईं और उन्होंने एक कड़ा संदेश दिया। वह सेनाप्रमुख को सहमत कराने में सफल रहीं। वास्तव में सेना के पास अंग्रेजों के जमाने से ही बहुत लंबी चौड़ी भूमि है। यह बार-बार विवादों का बिंदु भी रही है। सवाल यह भी है कि सेना के पास इस भूमि का उपयोग क्या है? 

 

... जैसे बीजेपी करती है 
राहुल गांधी की इफ्तार पार्टी। कई वरिष्ठ संपादकों और पत्रकारों को इसका निमंत्रण नहीं मिला। जिन्हें मिला, उन्हें भी बहुत अंत में मिला। एसपीजी और दिल्ली पुलिस दोनों सख्त थे, लिहाजा पीआईबी कार्डधारक बड़ी संख्या में पहुंच गए। आखिर में रणदीप सुरजेवाला को इस गड़बड़ी का अहसास हुआ। लिहाजा पत्रकारों की पहचान करने के लिए द्वार पर एक जूनियर व्यक्ति खड़ा कर दिया गया। राहुल गांधी इस मीडिया प्रबंधन और निमंत्रण प्रबंधन से खुश नहीं हैं। भिवंडी के बाद यह लगातार दूसरी बड़ी गड़बड़ी थी। राहुल ने मीडिया यूनिट से कहा है कि भविष्य में वह वैसे ही मीडिया प्रबंधन करे, जैसे बीजेपी करती है। 

 

शाहनवाज की इफ्तार पार्टी 
शाहनवाज हुसैन की इफ्तार पार्टी में भी वह रौनक नहीं थी। राजनाथ सिंह आए, प्रतिभा के साथ आडवाणी आए, डॉ.जोशी आए, मीनाक्षी लेखी आईं। लेकिन न प्रधानमंत्री आए और न अमित शाह आए। अमित शाह तो सूरजकुंड में संघ के साथ बैठक में व्यस्त थे। शाहनवाज हुसैन की इफ्तार पार्टी में शाकाहारी भोजन की अलग व्यवस्था थी। नॉनवेज में मटन बिरयानी, चिकन-मटन कोरमा, आम और पान के स्वाद वाली कुल्फी और गुलाम जामुन थे। व्यवस्था अनिल बलुनी ने संभाल रखी थी। 

 

8 पोस्ट खाली हैं 
सीबीआई में संयुक्त निदेशकों के 20 स्वीकृत पदों में से 8 पद रिक्त पड़े हैं। परिणामस्वरूप सभी पर कार्यभार थोड़ा ज्यादा चल रहा है। 

 

सरजी का आइडिया 
अरविंद केजरीवाल हवा का रुख भांपने में लगे हैं। एक विकल्प, जिस पर विचार चल रहा है, वह यह है कि विधानसभा भंग कर दी जाए और सारा ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ते हुए नए चुनाव करा लिए जाएं।

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