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पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल हसनैन या हुड्डा बन सकते हैं कश्मीर के राज्यपाल, बीवीआर सुब्रमण्यम नए मुख्य सचिव नियुक्त

जम्मू-कश्मीर में अब तक 11 चुनाव हो चुके हैं। राज्य ने 7 बार राज्यपाल शासन देखा है।

Danik Bhaskar | Jun 20, 2018, 10:18 PM IST

  • वोहरा 2008 में राज्यपाल बने थे, उनका कार्यकाल 25 जून को खत्म होना है
  • मनमोहन के पूर्व निजी सचिव सुब्रमण्यम जम्मू-कश्मीर के अगले चीफ सेक्रेटरी बन सकते हैं

श्रीनगर. जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू हो गया है। भाजपा-पीडीपी गठबंधन टूटने और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के इस्तीफे के बाद राज्यपाल एनएन वोहरा ने राष्ट्रपति को गवर्नर का शासन लगाने की सिफारिश भेजी थी। राज्य में पिछले 10 साल में चौथी बार राज्यपाल शासन लगा है। वोहरा का कार्यकाल इसी महीने खत्म हो रहा है। अगले राज्यपाल के लिए सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र हुड्डा और सैयद अता हसनैन के नाम की चर्चा है। पहले कहा जा रहा था कि अमरनाथ यात्रा खत्म होने तक वोहरा राज्यपाल पद पर बने रह सकते हैं। यात्रा 28 जून से 26 अगस्त तक चलेगी। वोहरा ने बुधवार शाम छत्तीसगढ़ कैडर के वरिष्ठ आईएएस अफसर बीवीआर सुब्रमण्यम को राज्य का मुख्य सचिव नियुक्त किया।

सर्जिकल स्ट्राइक के वक्त उत्तरी कमान के कमांडर थे हुड्डा : न्यूज एजेंसी के मुताबिक, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा को राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। वे 2014 से 2016 तक सेना की उत्तरी कमान के कमांडर रहे हैं। जब 28-29 सितंबर 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था तब हुड्डा ही जम्मू-कश्मीर में तैनात सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी थे। उन्होंने ही सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग और ऑपरेशन की निगरानी की थी।

2010 में कश्मीर के हालात संभाल चुके हैं हसनैन : सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल हसनैन कश्मीर में सेना की 15वीं कोर के कमांडर रह चुके हैं। 2010 में कश्मीर के मुश्किल हालात को वे बखूबी संभाल चुके हैं। वे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल के थिंक टैंक स्वामी विवेकानंद फाउंडेशन का भी हिस्सा हैं। बतौर कोर कमांडर कश्मीर पोस्टिंग के अलावा वे ब्रिगेडियर रहते हुए उड़ी स्थित सेना की 12 इंफैन्ट्री ब्रिगेड और बारामुला में 19 वे डिविजन भी कमांड कर चुके हैं। कश्मीर में सेना के मिशन सद्भावना में भी जनरल हसनैन की बड़ी भूमिका रही है। घाटी में लोगों से जुड़ने के लिए हार्ट डॉक्ट्राइन इन्हीं ने शुरू किया था। स्पोर्ट्स के जरिए युवाओं को आतंक और पत्थरबाजी से रोकने के लिए कश्मीर प्रीमियर लीग की शुरूआत भी हसनैन ने ही कराई थी।

2014 में पीएमओ में थे सुब्रमण्यम : सुब्रमण्यम छत्तीसगढ़ में अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) थे। वे 2004 से 2008 तक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निजी सचिव रह चुके हैं। 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने तब सुब्रमण्यम पीएमओ में थे। मार्च 2015 में उन्हें छत्तीसगढ़ भेजा गया। सुब्रमण्यम को आंतरिक सुरक्षा मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव बीबी व्यास का स्थान लिया। व्यास और सेवानिवृत्त आईपीएस अफसर विजय कुमार को राज्यपाल का सलाहकार नियुक्त किया गया है।

सीजफायर से आतंकियों को फायदा मिला: डीजीपी एसपी वैद ने बताया कि कश्मीर में रमजान के दौरान आतंकियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन पर रोक लगाई गई थी। आतंकियों को इससे काफी फायदा मिला है। इस वजह से आतंकी घटनाओं में इजाफा हुआ, लेकिन अब यह रोक हट गई है। राज्यपाल शासन लगने से आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाना काफी आसान हो जाएगा। आगे और भी मजबूत ऑपरेशन चलाए जाएंगे। राइजिंग कश्मीर अखबार के संपादक शुजात बुखारी की हत्या पर वैद ने कहा कि हमने एसआईटी का गठन किया है। पुलिस इस मामले को जल्द ही सुलझा लेगी। आर्मी के शहीद जवान औरंगजेब के बारे में उन्होंने कहा कि हत्या करने वाले आतंकियों की पहचान हो गई है। जल्द ही हम उन तक पहुंच जाएंगे।

जम्मू-कश्मीर में अब तक 11 चुनाव हुए, राज्य ने 8 बार राज्यपाल शासन देखा

कब-कब लगा राज्यपाल शासन
पहला 26 मार्च, 1977 से 9 जुलाई 1977
दूसरा 6 मार्च 1986 से 7 नवंबर 1986
तीसरा 19 जनवरी 1990 से 9 अक्टूबर 1996
चौथा 18 अक्टूबर 2002 से 2 नवंबर 2002
पांचवां 11 जुलाई 2008 से 5 जनवरी 2009
छठा 8 जनवरी 2015 से 1 मार्च 2015
सातवां 7 जनवरी 2016 से 4 अप्रैल 2016
आठवां 20 जून 2018 से लागू

1957-1977 : पहली बार 1957 में चुनाव। नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) को 75 में 68 सीट मिली। बख्शी गुलाम मो. वजीर-ए-आजम बने। 62 में भी नेकां जीती। 1967-72 में कांग्रेस जीती। 1975 में इंदिरा का नेकां के शेख अब्दुल्ला से करार हुआ। कांग्रेस के मीर कासिम ने अब्दुल्ला के लिए कुर्सी छोड़ दी।

1977-1982 : 1977 में कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर अब्दुल्ला सरकार गिराई। पहली बार राज्यपाल शासन लगा। 1977 के चुनावों में नेकां जीती और शेख अब्दुल्ला दोबारा मुख्यमंत्री बनाए गए। 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन पर बेटे फारूक अब्दुल्ला सीएम बने। कांग्रेस की मदद से अब्दुल्ला के बहनोई गुलाम शाह ने सरकार गिरा दी। शाह दो साल सीएम रहे। 6 मार्च, 1986 से 7 नवंबर, 1986 तक राष्ट्रपति शासन रहा।

1986-2002 : 1986 में हुए चुनावों में फिर नेकां जीती और फारूख सीएम बने। 1990 में जगमोहन को राज्यपाल बनाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया। 1996 तक राज्यपाल शासन रहा। 1996 के चुनाव में फिर नेशनल कॉन्फ्रेंस को सफलता मिली। फारूख तीसरी बार सीएम बने।

2002-2018 : 2002 चुनाव में कांग्रेस-पीडीपी की सरकार बनी। मुफ्ती सईद सीएम बने। 3 साल के बाद कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद सीएम बने। पीडीपी ने सरकार गिरा दी। 2008 में हुए चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। नेकां-कांग्रेस की सरकार बनी। उमर अब्दुल्ला सीएम बने। 2014 में चुनाव हुए। 2015 में भाजपा-पीडीपी में गठबंधन। पीडीपी के मुफ्ती सईद फिर सीएम बने। उनके निधन के बाद महबूबा राज्य की पहली महिला सीएम बनी।

गठबंधन सरकार बनने की संभावना नहीं :  पीडीपी और भाजपा के बीच सवा तीन साल पहले गठबंधन हुआ था। भाजपा ने मंगलवार को पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी से गठबंधन तोड़कर महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। कांग्रेस और पीडीपी ने एकदूसरे के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है। वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने भी किसी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है।

 

गठबंधन तोड़ने की दो वजह जो भाजपा ने बताईं : राम माधव ने कहा, ‘‘घाटी में आतंकवाद, कट्टरपंथ, हिंसा बढ़ रही है। ऐसे माहौल में सरकार में रहना मुश्किल था। रमजान के दौरान केंद्र ने शांति के मकसद से ऑपरेशंस रुकवाए। लेकिन बदले में शांति नहीं मिली। जम्मू और कश्मीर क्षेत्र के बीच सरकार के भेदभाव के कारण भी हम गठबंधन में नहीं रह सकते थे।’’

 

मतभेद की दो असल वजहेंपहली- रमजान के दौरान सुरक्षाबल आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन रोक दें, इसे लेकर भाजपा-पीडीपी में मतभेद थे। महबूबा के दबाव में केंद्र ने सीजफायर तो किया लेकिन इस दौरान घाटी में 66 आतंकी हमले हुए, पिछले महीने से 48 ज्यादा। ऑपरेशन ऑलआउट को लेकर भी भाजपा-पीडीपी में मतभेद था। दूसरी- पीडीपी चाहती थी कि केंद्र सरकार हुर्रियत समेत सभी अलगाववादियों से बातचीत करे। लेकिन, भाजपा इसके पक्ष में नहीं थी।

 

पूरी खबर यहां पढ़ें: भाजपा ने कहा- आतंकवाद बढ़ने से गठबंधन में रहना मुश्किल था, वोहरा ने राज्यपाल शासन लगाने के लिए रिपोर्ट भेजी ​