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अगर धारा 377 को अपराध न माना जाए तो समलैंगिकता पर लगा सामाजिक धब्बा भी मिट जाएगा: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि बीते सालों में भारतीय समाज में ऐसा माहौल बनाया गया है जिसके चलते समलैंगिकों के साथ भेदभाव होता है।

Dainik Bhaskar

Jul 12, 2018, 02:30 PM IST
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  • सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार से समलैंगिकता के मुद्दे पर सुनवाई जारी
  • याचिकाकर्ता की वकील ने दलील दी- सामान्य यौन झुकाव की तरह ही है समलैंगिकता

नई दिल्ली. समलैंगिकता को अपराध माना जाए या नहीं, इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इस पर शीर्ष कोर्ट ने गुरुवार को कहा, "अगर धारा 377 को अपराध न माना जाए तो समलैंगिता पर लगा सामाजिक धब्बा और इस समुदाय के साथ भेदभाव भी खत्म हो जाएगा।'' आईपीसी की धारा 377 में दो समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से शारीरिक संबंधों को अपराध माना गया है और सजा का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में इसे चुनौती दी गई है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच ने कहा, "बीते कुछ सालों में भारतीय समाज में एक ऐसा परिवेश बनाया गया है जिसके चलते समलैंगिक समुदाय के साथ भेदभाव होता है। इस तरह का बर्ताव उन लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। किसी भी समलैंगिक शख्स के साथ महज इसलिए भेदभाव नहीं हो सकता कि यौन संबंधों के लिए उसका झुकाव किस तरफ है।'' एक याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुईं वकील मेनका गुरुस्वामी से कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई ऐसा कानून, नियम, उपनियम या दिशा-निर्देश हैं जो समलैंगिकों को उन अधिकारों से वंचित करता है जो दूसरे लोगों को मिले हैं। इस पर मेनका ने कहा, "ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।''

कोर्ट में किसने-क्या कहा?

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, "हमारे समाज में जड़ों में कई जख्म हैं, जिसको लेकर समलैंगिक समुदाय में डर बना रहता है।"

जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा, "परिवार और सामाजिक दबाव के चलते समलैंगिक समुदाय के लोगों की विपरीत लिंग के लोगों से शादी जबरन शादी करा दी जाती है, इससे बाईसेक्शुअलिटी को बढ़ावा मिलता है। साथ ही समलैंगिकों को मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। समाज के पूर्वाग्रह के चलते समलैंगिकों को डॉक्टरी परामर्श के लिए भी जाना पड़ता है।"

याचिकाकर्ता के वकील अशोक देसाई ने कहा, "समलैंगिकता हमारी काफी समय संस्कृति का हिस्सा रही है। भारत में ये नई चीज नहीं है। कई देश इसे स्वीकार कर चुके हैं।"

बुधवार को मेनका ने कोर्ट में दलील दी थी कि समलैंगिकता एक सामान्य यौन झुकाव की तरह ही है। धारा 377 उपनिवेशवादी कानून जैसा है जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लैंगिक आधार पर भेदभाव नहीं), अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

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