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कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर जस्टिस केएम जोसेफ की पदोन्नति की सिफारिश का फैसला टाला

इससे पहले कॉलेजियम ने जस्टिस जोसेफ के नाम की सिफारिश की गई थी, लेकिन केंद्र ने यह प्रस्ताव लौटा दिया था।

DainikBhaskar.com | Last Modified - May 02, 2018, 06:08 PM IST

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    - केंद्र ने जस्टिस जोसेफ के नाम की सिफारिश 26 अप्रैल को कॉलेजियम को लौटा दी थी

    नई दिल्ली. उत्तराखंड हाईकोर्ट के जस्टिस केएम जोसफ को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस बनाने के लिए उनके नाम की सिफारिश पर आज दोबारा विचार किया गया। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों की बैठक के बाद सिफारिश पर फैसला टाल दिया गया। पिछले हफ्ते केंद्र सरकार इस सिफारिश को दोबारा विचार के लिए कॉलेजियम को वापस भेज चुकी है।

    जस्टिस लोकुर छुट्टी पर
    - चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस जे चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ इस कॉलेजियम के सदस्य हैं। लेकिन जस्टिस लोकुर तबीयत ठीक नहीं होने की वजह से 26-27 अप्रैल को काम पर नहीं आए थे। ऐसे में वे आज की बैठक में मौजूद रहेंगे या नहीं इस पर स्थिति साफ नहीं है।

    इंदु मल्होत्रा का नाम केंद्र ने मंजूर कर लिया था
    - सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने 10 जनवरी को जस्टिस जोसेफ और वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की थी।

    - केंद्र सरकार ने इंदु मल्होत्रा के नाम को तो मंजूरी दे दी थी, लेकिन जस्टिस जोसेफ का नाम दोबारा विचार के लिए कॉलेजियम को लौटा दिया था।

    - केंद्र का कहना था कि यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट के मापदंड के मुताबिक नहीं है।

    कांग्रेस का आरोप- केंद्र बदले की राजनीति कर रहा
    - जस्टिस जोसेफ के नाम की सिफारिश लौटाने पर कांग्रेस की तरफ से दो बयान आए। कपिल सिब्बल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, "भारत की न्याय व्यवस्था खतरे में है। अगर हमारी न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एकजुट नहीं होती है तो फिर लोकतंत्र पर संकट खड़ा हो जाएगा। ये लोग अपने लोग भरना चाहते हैं। देश में 410 जजों की जरूरत है। हम ये जानना चाहते हैं कि कौन न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खड़ा होगा? क्या न्यायपालिका एक आवाज में कहेगी कि बस अब बहुत हुआ?
    - वहीं, रणदीप सिंह सुरेजवाला ने कहा, ‘"भारत की न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा हमला किया जा रहा है। अगर देश इसके खिलाफ नहीं खड़ा हुआ तो ये लोकतंत्र को खत्म कर देगा। उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जोसेफ देश के सबसे वरिष्ठ मुख्य न्यायाधीश हैं, इसके बावजूद मोदी सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में भेजने से इनकार कर रही है। क्या ये उत्तराखंड में लगा राष्ट्रपति शासन रद्द करने का बदला है?’’
    - सुरजेवाला ने कहा, ‘‘मोदी सरकार इस मामले में आदतन अपराधी है। जून 2014 में उसने कानूनविद् गोपाल सुब्रमण्यम को सुप्रीम कोर्ट जज बनाने की सिफारिश भी इसलिए ठुकरा दी थी कि क्योंकि सुब्रमण्यम अमित शाह एंड कंपनी के खिलाफ वकालत कर चुके हैं।’’

    भाजपा ने कहा- कांग्रेस को सवाल पूछने का हक नहीं
    - भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा, ‘"न्यायपालिका की गरिमा को लेकर कांग्रेस के पास हमसे सवाल पूछने का नैतिक अधिकार नहीं है। कांग्रेस पार्टी का पूरा रिकॉर्ड ही ऐसी घटनाओं से भरा हुआ है, जिसमें न्यायपालिका से समझौता किया गया।’’

    जस्टिस जोसेफ उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं
    - वे उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं। उन्होंने 2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने का मोदी सरकार का आदेश खारिज कर दिया था और हरीश रावत सरकार को बहाल करने का आदेश दिया था।

    4 साल से उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं जस्टिस जोसेफ
    - जस्टिस जोसेफ इस साल जून में 60 साल के हो जाएंगे। उन्हें 14 अक्टूबर 2004 को केरल हाईकोर्ट में स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और उन्होंने 31 जुलाई 2014 को उत्तराखंड उच्च न्यायलय का प्रभार संभाला था।

    जजों की जरूरत क्यों?
    - कॉलेजियम और केंद्र दोनों के पास फंसे जजों के 36 फीसदी पद खाली हैं। ये भरें तो बाकी जजों से रोजाना 7 हजार केसों का बोझ घटेगा। 146 नाम दो साल से अटके हैं। 36 नाम सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पास लंबित हैं। 110 नामों को केंद्र सरकार से मंजूरी का इंतजार है।
    - देश के 24 हाईकोर्ट में 395 और सुप्रीम कोर्ट में जजों के 6 पद रिक्त हैं।

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