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समलैंगिकता केस में आज से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, जवाब में देरी पर केंद्र सरकार को फटकार

4 वर्ष पहले
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याचिकाकर्ताओं का तर्क- जो 160 साल पहले जो नैतिकता थी, उसके आज मायने नहीं रहे

 

 

नई दिल्ली.     धारा 377 हटाने के मुद्दे पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इसमें याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलील देते हुए पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि ये समलैंगिकता का मसला सिर्फ यौन संबंधों के प्रति झुकाव का है। इसका लिंग (जेंडर) से कोई लेना-देना नहीं है। आईपीसी की धारा 377 में दो समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से शारीरिक संबंधों को अपराध माना गया है और सजा का प्रावधान है। दायर याचिकाओं में इसे चुनौती दी गई है। उधर, भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने समलैंगिकता को हिंदुत्व के खिलाफ बताया।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से कोर्ट में पेश हुए पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा, "लिंग (जेंडर) और यौन संबंधों के प्रति झुकाव दोनों अलग-अलग मामले हैं। दोनों को एक नहीं किया जाना चाहिए। इसमें चुनने का सवाल नहीं उठता। धारा 377 मानवाधिकार का उल्लंघन करती है। समलैंगिकता का मसला सिर्फ यौन संबंधों के प्रति झुकाव का है। जब समाज बदल रहा है तो मूल्य भी बदल रहे हैं। यानी जो 160 साल पहले नैतिकता थी, उसके आज कोई मायने नहीं हैं।" सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "धारा 377 कानून का मसला है और हम इस पर चर्चा कर रहे हैं।"

 

हाईकोर्ट ने समलैंगिकता के पक्ष में दिया था फैसला:  दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 जुलाई, 2009 को वयस्कों के बीच समलैंगिकता को वैध करार देते हुए उसे अपराध की श्रेणी से बाहर रखने की बात कही थी। फैसले में कहा था कि 149 वर्षीय कानून ने इसे अपराध बना दिया था, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में  हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिक संबंधों को गैरकानूनी करार दिया। फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। इसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद क्यूरेटिव पिटीशन (एक तरह की पुर्नविचार याचिका जिसे आमतौर पर जज अपने चेंबर में ही सुनते हैं) दायर की गईं। इसमें प्रभावित पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट से अपील में कहा कि वो अपने मूल फैसले पर फिर से विचार करे। आईआईटी के 20 पूर्व और मौजूदा छात्रों द्वारा दायर याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दोबारा बहाल करने की मांग की गई है। 


जनवरी में 5 जजों की खंडपीठ को सौंपा गया था मामला: सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को समलैंगिकता मामले को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा था। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली इस बेंच में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस आरएफ नरीमन और जस्टिस इंदु मल्होत्रा हैं। नाज फाउंडेशन समेत कई प्रतिष्ठित लोगों द्वारा दायर याचिकाओं में भी 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे लोग जो अपनी पसंद से जिंदगी जीना चाहते हैं, उन्हें कभी भी डर की स्थिति में नहीं रहना चाहिए। स्वभाव का कोई निश्चित मापदंड नहीं है। नैतिकता उम्र के साथ बदलती है। सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, "ये सामान्य बात नहीं है। हम इस पर खुशी नहीं मना सकते। ये हिंदुत्व के खिलाफ है। अगर ये ठीक हो सकता है तो हमें मेडिकल शोध पर खर्च करना चाहिए। सरकार को इस मामले की सुनवाई के लिए 7 या 9 जजों की बेंच बनानी चाहिए।"

 

 

 

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