मुंबई / दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्ती में 10 करोड़ दीये बनते हैं, कारोबार 1000 करोड़ रुपए

10 crore diyas are made in the world's largest slum
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10 crore diyas are made in the world's largest slum

  • 87 साल पहले आए कुम्हार परिवारों ने मुंबई के धारावी को सबसे बड़ा दीया बाजार बनाया
  • 50 लाख डिजाइनर दीये अमेरिका, ब्रिटेन, खाड़ी देशों तक भेजे जा रहे

दैनिक भास्कर

Oct 21, 2019, 11:31 AM IST

मुंबई (कुमुद कुमार दास). 1932 में गुजरात से विस्थापित होकर आए कुम्हार परिवारों ने दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्ती धारावी के कुम्हारवाड़ा को सबसे बड़ा दीयों का बाजार बना दिया है। 12.5 एकड़ में फैले इस इलाके में एक हजार परिवार मिट्टी के दीये, पॉट और सजावट की दूसरी चीजें बनाते हैं। इन दिनों यहां दिवाली की खरीदी के लिए बड़ी संख्या में व्यापारी गोवा, शोलापुर, नागपुर, नासिक, सूरत और बड़ौदा से आ रहे हैं। सालभर में यहां करीब 10 करोड़ दीये बनाए जाते हैं। इसके चलते कुम्हारवाड़ा को नया नाम भी मिला है-पॉटरी विलेज।

 

कुम्हारवाड़ा के सबसे बड़े दीया ट्रेडर नरोत्तम टांक बताते हैं ‘हम यहां बने डिजाइनर दीयों को अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और खाड़ी देशों तक भेजते हैं। इनकी ऑनलाइन बिक्री भी होने लगी है।’ इतना ही नहीं, स्कूल-कॉलेज छात्र भी इन कारीगरों से हुनर सीखने आ रहे हैं। प्रशिक्षण के लिए क्लासेस लगने लगी हैं।

 

हर परिवार साल में एक लाख दीए बनाता है 

धारावी प्रजापति सहकारी उत्पादक संघ के अध्यक्ष कमलेश चित्रोदा बताते हैं कि यहां हर कुम्हार परिवार सालभर में औसतन 1 लाख दीये बनाता है। इससे महीने में 15 से 20 हजार रुपए की आय होती है। हर साल यहां से 8 से 10 करोड़ दीये बिकते हैं। करीब 50 लाख दीये विदेश जाते हैं। यहां दीयों, पॉटरी और अन्य सजावटी सामान का सालाना व्यापार 1000 करोड़ रुपए का है।

 

आर्किटेक्ट, इंटीरियर डेकोरेटर यहां पॉटरी आर्ट सीखते हैं

ऐसी ही क्लास चलाने वाले युसूफ गलवानी बताते हैं कि आर्किटेक्ट, इंटीरियर डेकोरेटर और पॉटरी आर्टिस्ट काम सीखने आ रहे हैं। इनके लिए इन दिनों हम छह महीने की क्लासेस चला रहे हैं, जिसमें फीस 7000 रुपए महीना तक है। धारावी प्रजापति सहकारी उत्पादक संघ के उपाध्यक्ष देवजी चित्रोदा को कुम्हारवाड़ा इन दिनों परिवर्तन की ओर बढ़ता नजर आता है। वे बताते हैं ‘पर्यावरण को ध्यान में रख यहां जैव ईंधन से चलने वाली बिना धुएं की 7 भट्टियां लग भी चुकी हैं। 

 

पूरा परिवार काम करता है

पुरुष सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक चाक (पहिया) चलाते हैं और महिलाएं मिट्टी का गोला बनाने और दीयों की सजावट कर उनकी मदद करती हैं। रोजाना एक परिवार 2 से 5 हजार तक दीए बना लेता है। स्कूल-कॉलेजों से लौटकर बच्चे भी हाथ बंटाते हैं। भट्टियों की देखरेख, दीयों और पॉट्स को गेरू में रंगना और चित्रकारी का काम नई पीढ़ी करती है। वेशॉवर फाउंडेशन यहां बने डिजाइनर दीये बड़ी कंपनियों तक पहुंचाने का काम कर रहा है। 

 

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