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मंगोलिया / पांच देशों के निगरानी वाले दो पक्षियों ने मध्यप्रदेश में 7 सितंबर को रात काटी



ग्वालियर में रात गुजारने वाला पक्षी ऑनऑन कॉमन कुकू। ग्वालियर में रात गुजारने वाला पक्षी ऑनऑन कॉमन कुकू।
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ग्वालियर में रात गुजारने वाला पक्षी ऑनऑन कॉमन कुकू।ग्वालियर में रात गुजारने वाला पक्षी ऑनऑन कॉमन कुकू।

  • वैज्ञानिकों ने 5 पक्षियों पर टैग लगाए थे, इन्हें 4 से 8 जून को छोड़ा गया था
  • पांच पक्षियों में से दो ने भारत में प्रवेश के बाद हजारों किलोमीटर की यात्रा 24 सितंबर से 29 सितंबर में पूरी की है

Dainik Bhaskar

Oct 06, 2019, 03:00 PM IST

ग्वालियर/ऊलानबाटर.  मंगोलिया के वैज्ञानिक 20 से ज्यादा पक्षियों के अप्रवास के दौरान रूट, परेशानियां,  व्यवहार और उनकी दिनचर्या को जानने के लिए काम कर रहे हैं। इन पक्षियों में ओरिएंटल कुकू पक्षी भी शामिल है। वैज्ञानिकों ने कुकू पक्षी के अप्रवास को जानने के लिए इनके शरीर पर सैटेलाइट टैग लगाए, ताकि उनकी लोकेशन पता लगाई जा सके। इस साल 4 से 8 जून के बीच इन पक्षियों को टैग लगाकर छोड़ा गया था। इस प्रोजेक्ट में इंडोनेशिया/मलेशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, इंडिया, न्यूजीलैंड की सहभागिता रही। 

 

इनमें से दो पक्षियों ने भारत में प्रवेश किया। दोनों ने हजारों किलोमीटर की यात्रा 24 सितंबर से 29 सितंबर में पूरी की है। ऑनऑन नाम के इस पक्षी ने भारत-नेपाल बॉर्डर से सीमा से उड़ान भरी थी। 7 सितंबर को ऑनऑन ग्वालियर में था। जबकि नमजा नाम का कुकू बुंदेलखंड के जिलों देखा गया। दोनों के बीच 230 किमी की दूरी थी। इन पक्षियों के कंधे पर लगा सैटेलाइट टैग वैज्ञानिक शोध के लिए एप्रूवड है।

 

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टैग की कीमत 10 से 12 लाख रुपए
टैग से मिलने वाले सिग्नल से वेबसाइट पर पक्षियों की लोकेशन ट्रेस की जा रही है। 10 से 12 लाख रुपए की कीमत वाला यह टैग दिन में सिर्फ एक बार ब्लिंक करता है। टैग में मिनी सोलर पैनल, सैटेलाइट डाटा रहता है। इससे पता चलता है कि यह पक्षी इस समय कहां पर है। 

 

पक्षियों को लगाए गए टैग नंबर

 

  • ओरिएंटल कुकू: टैग 161312
  • कॉमन कुकू: टैग 170438
  • कॉमन कुकू: टैग 170436
  • कॉमन कुकू:  टैग 170437
  • कॉमन कुकू : टैग 161314

 

टैग में कैमरा नहीं होता
वर्ल्डलाइफ साइंस एंड मंगोलिया (डब्ल्यूएससीसी), ओरिएंटल बर्ड क्लब और बर्मिंग बीजिंग के वैज्ञानिकों ने पक्षियों में  टैग लगाया था। इसमें कैमरा नहीं होता है। सिर्फ लोकेशन के बारे में पता चला चलता है। यह बीजिंग कोयल परियोजना का सहायक प्रोजेक्ट था, जिसने पहली बार पूर्वी एशियाई आम कोयल के प्रवास के बारे में भी खुलासा किया गया।

 

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