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  • Buddhist monks made clothes from 40 tons of plastic waste, the temple's fame grew as a plastic recycling center

थाईलैंड / वाट चक डाएंग बौद्ध मंदिर, यहां दान में प्लास्टिक वेस्ट मांगते हैं ताकि इनसे कपड़े बनाए जा सकें

कपड़ों के अलावा प्लास्टिक कचरे से पैंसिल, केस, जूते, नाव भी बना रहे हैं। कपड़ों के अलावा प्लास्टिक कचरे से पैंसिल, केस, जूते, नाव भी बना रहे हैं।
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कपड़ों के अलावा प्लास्टिक कचरे से पैंसिल, केस, जूते, नाव भी बना रहे हैं।कपड़ों के अलावा प्लास्टिक कचरे से पैंसिल, केस, जूते, नाव भी बना रहे हैं।

  • बैंकॉक से लगभग 30 किमी दूर वाट चक डाएंग बौद्ध मंदिर में धर्म से अधिक चर्चा पर्यावरण बचाने की
  • श्रद्धालु रुपए और अन्न दान करने आते हैं तो ये भिक्षु उनसे एक थैली में प्लास्टिक वेस्ट भी मांगते हैं, अब तक 40 टन प्लास्टिक कचरे से कपड़े बनाए

दैनिक भास्कर

Feb 19, 2020, 09:15 AM IST

बैंकॉक. थाईलैंड के बौद्ध मंदिर पर्यावरण में बढ़ रहे प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यहां के भिक्षु प्लास्टिक कचरे से धागे बनाकर उनसे वस्त्र निर्माण कर रहे हैं। इन्हीं भगवा वस्त्रों को वे धारण करते हैं। इतना ही नहीं, ये भिक्षु दुनियाभर में फैले अपने समुदायों में इस काम के लिए जागरूकता फैला रहे हैं। बौद्ध भिक्षुओं के शिक्षण का केंद्र रहा यह मंदिर आज प्लास्टिक रिसाइक्लिंग के लिए प्रसिद्ध हो चुका है। अनेक कॉर्पोरेशंस, एनजीओ और कई सैलीब्रिटीज सामाजिक जिम्मेदारी निभाने के लिए इस मंदिर के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं।

थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित ‘वाट चक डाएंग’नामक बौद्ध मंदिर में भिक्षुओं और श्रद्धालुओं के बीच धर्म की चर्चा से ज्यादा बात पर्यावरण संरक्षण के उपायों पर होती है। श्रद्धालु पैसे व अन्न दान करने आते हैं तो ये भिक्षु उनसे एक थैली में प्लास्टिक वेस्ट भी मांगते हैं। इसके बाद लोग बोतलें व अनेक तरह का प्लास्टिक कचरा यहां दे जाते हैं। 

श्रद्धालु को प्लास्टिक कपड़े की कमीज पहने देख आइडिया आया

  • मंदिर के वरिष्ठ भिक्षु 56 साल के फ्रा टिपाकोर्न एरियो कहते हैं कि हमें लोगों को यह सिखाना जरूरी है कि वे किस तरह पर्यावरण बदल सकते हैं। मंदिर को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्लास्टिक से भिक्षुओ के लिए बनाए जा रहे भगवा वस्त्रों के कारण मिली है। अब तक भिक्षुओं ने 40 टन प्लास्टिक रिसाइकल किया है। प्लास्टिक के कपड़े बनाने का विचार तीन वर्ष पहले आया था। तब एक व्यक्ति मंदिर आया और उसने भिक्षु को बताया कि उसने जो कमीज पहनी है, वह प्लास्टिक से बनी है। 
  • इसके बाद हमने दान के रूप में प्लास्टिक लेना शुरू कर दिया। मंदिर ने इसके लिए बहुत बड़ी रीसाइकिलिंग मशीन लगाई। प्लास्टिक को रेशे में बदला जाने लगा। रेशे से कपड़ा बनाने, वस्त्रों की सिलाई तक का पूरा काम स्थानीय लोगों से कराया जा रहा है, जिससे उन्हें रोजगार मिल रहा है। मंदिर में वस्त्रों के अलावा कई कंपनियों के साथ मिलकर प्लास्टिक कचरे से पैंसिल, केस, जूते, नाव और यहां तक कि प्लास्टिक की दूध की बोतलों से शैड भी बनाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, सैंकड़ों अनुयायी मंदिर में रिसाइकलिंग के बारे में सीखने आते हैं। 

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