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  • Doctors Made 3D print 'living' Body Parts, For The First Time In The World, Scientists Added Broken Ear Bones , The Power To Hear The Curtain Recovered

दुनिया में पहली बार वैज्ञानिकों ने 3-डी प्रिंटिंग से कान की टूटी हडि्डयां जोड़ीं, सुनने की शक्ति लौटाई

एक वर्ष पहले
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प्रोफेसर मशुदु सिफुलारो पिछले 10 साल से श्रवण बाधित तथा कान संबंधी सभी रोगों पर अध्ययन कर रहे हैं। - Dainik Bhaskar
प्रोफेसर मशुदु सिफुलारो पिछले 10 साल से श्रवण बाधित तथा कान संबंधी सभी रोगों पर अध्ययन कर रहे हैं।
  • प्रिटोरिया विश्वविद्यालय अस्पताल के प्रोफेसर मशुदु सिफुलारो की टीम ने ग्राउंडब्रेकिंग सर्जरी कर सफलता हासिल की
  • यह तकनीक बेहद उपयोगी है, क्योंकि इससे कान में पाई जाने वाली कुछ छोटी हड्डियों का सटीक पुनर्निर्माण भी संभव हुआ है

प्रिटोरिया. दक्षिण अफ्रीकी वैज्ञानिकों ने 3-डी प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल कर 35 साल के एक व्यक्ति के कान की टूटी हुई सभी हडि्डयां दुरुस्त और कान का परदा ठीक कर दिया है, जिससे वह पहले की तरह सुन सकेगा। इस व्यक्ति का एक कान कार दुर्घटना में पूरी तरह नष्ट हो चुका था। वैज्ञानिकों का कहना है कि 3-डी प्रिंटिंग तकनीक से इस तरह का उपचार दुनिया में पहली बार किया गया है।


प्रिटोरिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और वैज्ञानिक मशुदु सिफुलारो ने कहा कि उनकी टीम ने 3-डी प्रिंटिंग तकनीक से ग्राउंडब्रेकिंग सर्जरी कर यह कमाल किया है। टीम ने प्रिंटर से घायल के कान के क्षतिग्रस्त क्षेत्रों को स्कैन किया। फिर एक प्रयोग कर टूटी हुई हडि्डयों, टिशुओं का पुनर्निर्माण करने लगे। 

तकनीक से सबसे छोटी हड्‌डी भी स्कैन हो सकती है
यह तकनीक शरीर में सबसे छोटी हड्‌डी को भी स्कैन कर उसका वास्तविक आकार बता देती है। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तकनीक ने उन्हें वे सभी प्रयोग करने की अनुमति दे दी है, जो उन्होंने पहले कभी नहीं सोचा था। यह तकनीक से कान में पाई जाने वाली कुछ छोटी हड्डियों का सटीक पुनर्निर्माण भी संभव हुआ है। हड्‌डी को भी स्कैन कर उसका वास्तविक आकार बता देती है। वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तकनीक ने उन्हें वे सभी प्रयोग करने की अनुमति दे दी है जो उन्होंने पहले कभी नहीं सोचा था। यह तकनीक बेहद उपयोगी है, क्योंकि इससे कान में पाई जाने वाली कुछ छोटी हड्डियों का सटीक पुनर्निर्माण भी संभव हुआ है।

आविष्कार को आगे बढ़ाने फंड की जरूरत होगी
प्रिटोरिया विश्वविद्यालय की टीम का मानना है कि इस आविष्कार से जन्मजात बहरापन, संक्रमण, आघात से सुनने की क्षमता खोना तथा मेटाबॉलिजम के कारण होने वाली परेशानियों, कान के अंदरूनी भागों में हुए नुकसान, शिशुओं की जन्मजात बीमारी या संक्रमण के कारण सुनाई नहीं देने वाले रोगियों को ठीक करने में भविष्य में मील का पत्थर साबित होगा। प्रोफेसर मशुदु सिफुलारो पिछले 10 साल से श्रवण बाधित तथा कान संबंधी सभी रोगों पर अध्ययन कर रहे हैं। लेकिन पिछले दो साल से उनका ध्यान केवल इस बात पर केंद्रित है कि 3-डी प्रिंटिंग का उपयोग और कहां-कहां किया जा सकता है। इस आविष्कार के बाद उन्होंने कहा कि इसे आगे बढ़ाने के लिए उन्हें फंड की जरूरत होगी, जो चैरिटी के द्वारा पूरी की जा सकती है या सरकार कोई मदद कर दे।