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  • Frog stem cells become the world's first living and self healing robot, smaller than 1 mm in size

खोज / मेंढ़क के स्टेम सेल से दुनिया का पहला हीलिंग रोबोट बनाया, ये कैंसर के इलाज में मददगार

एक्सनोबोट्स के पास न  गियर है और न आर्म्स में हैं। इसके बजाय यह गुलाबी मांस के छोटे से टुकड़े की तरह ज्यादा दिखता है। एक्सनोबोट्स के पास न गियर है और न आर्म्स में हैं। इसके बजाय यह गुलाबी मांस के छोटे से टुकड़े की तरह ज्यादा दिखता है।
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एक्सनोबोट्स के पास न  गियर है और न आर्म्स में हैं। इसके बजाय यह गुलाबी मांस के छोटे से टुकड़े की तरह ज्यादा दिखता है।एक्सनोबोट्स के पास न गियर है और न आर्म्स में हैं। इसके बजाय यह गुलाबी मांस के छोटे से टुकड़े की तरह ज्यादा दिखता है।

  • वर्मोंट और टफ्ट्स यूनिवर्सिटी ने मिलकर यह रोबोट बनाया, यह मानव शरीर में आसानी से घूम सकता है
  • वैज्ञानिक ने इसे जेनोबोट्स नाम दिया, यह कई हफ्तों तक बिना फूड के जिंदा रह सकता है 
  • यूनिवर्सिटी का कहना है कि यह न तो पारंपारिक रोबोट है और न ही किसी जानवर की प्रजाति से, यह नई तरह की जीवित मशीन है

दैनिक भास्कर

Jan 15, 2020, 07:38 AM IST

वर्मोंट (अमेरिका). वैज्ञानिकों ने मेंढ़क के स्टेम सेल से दुनिया का पहला लीविंग और सेल्फ हीलिंग रोबोट बनाया है। इसमें अफ्रीका के पंजे वाले मेंढक का स्टेम सेल इस्तेमाल किया गया है। यह आकार में एक मिलीमीटर (0.004 इंच) से भी कम है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह रोबोट मानव शरीर में आसानी से चल और तैर सकता है। इसके अलावा, कई हफ्तों तक बिना फूड के जिंदा रह सकता है और समूह में एक साथ काम भी कर सकता है।

इस सूक्ष्म रोबोट का उपयोग कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने या समुद्र से माइक्रोप्लास्टिक्स को हटाने के लिए किया जा सकता है। वर्मोंट यूनिवर्सिटी ने बताया कि यह पूरी तरह से नए जीवन का रूप है। यह शोध वर्मोंट यूनिवर्सिटी ने टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर किया है। इसका नाम 'जेनोबोट्स' रखा गया है।

एक्सनोबोट्स में स्व-उपचार की क्षमता भी होती है
स्टेम कोशिकाएं विशेष कोशिकाएं होती हैं, जो विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता रखती हैं। शोधकर्ताओं ने मेंढक के भ्रूण से जीवित स्टेम कोशिकाओं को निकाला और उन्हें अंडे पर छोड़ दिया। फिर,कोशिकाएं बंट गईं और सुपरकंप्यूटर द्वारा डिजाइन किए कए गए विशिष्ट "बॉडी फॉर्म्स" में बदल गए। शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्रकृति में ऐसा कभी नहीं देखा। इसके बाद सेल्स ने खुद ही काम करना शुरू कर दिया। त्वचा की कोशिकाओं ने संरचना का निर्माण किया, जबकि हृदय की मांसपेशियों की कोशिकाओं के स्पंदन ने रोबोट को अपने आप आगे बढ़ने की अनुमति दी। जेनोबोट्स में स्व-उपचार की क्षमता भी होती है; जब वैज्ञानिकों ने रोबोट के टुकड़े किए तो यह अपने आप ठीक हो गया और चलता रहा।

अनोखी मशीन है यह

एक शोधकर्ता जोशुआ बोंगार्ड ने बताया कि ये अनोखी मशीन है। इनके मुताबिक, 'यह न तो पारंपारिक रोबोट है और न ही किसी जानवर की ज्ञात प्रजाति से। यह नई तरह की जीवित मशीन है। जेनोबोट्स परपरांगट रोबोट की तरह नहीं दिखता है। इसके पास न तो गियर या न आर्म्स में होते हैं। इसके बजाए वे गुलाबी मांस के छोटे से टुकड़े की तरह ज्यादा दिखते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह बॉयोलिजिकल मशीन है।

रोबोट की खासियत 

  • जेनोबोट्स को समुदों में रेडियोएक्टिव वेस्ट, माइक्रोप्लास्टिक को एकत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। मानव शरीर में दवाओं को ले जा सकती है। यहां तक की धमनियों में भी आसानी से घूम सकती है।
  • जेनोबोट्स जलीय वातावरण में अतिरिक्त पोषक तत्वों के बिना दिनों या हफ्तों तक जीवित रह सकता है। इन्हें आंतरिक दवा वितरण के लिए उपयुक्त बनाया जा सकता है।
  • इन तात्कालिक काम के अलावा, जेनोबोट्स शोधकर्ताओं को कोशिका जीव विज्ञान के बारे में अधिक जानने में भी मदद कर सकती है। इसके अलावा, भविष्य में मानव स्वास्थ्य और दीर्घायु के क्षेत्र में अहम हो सकती है।

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