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आकाश में धूल बिखेरकर गर्मी रोकने की योजना, वैज्ञानिकों के साथ काम कर रहे बिल गेट्स

एक वर्ष पहले
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  • 800 से ज्याद बड़े हवाई जहाज लाखों टन चॉक मिट्‌टी को पृथ्वी से 19 किलोमीटर ऊपर स्ट्रेटोस्फीयर में छिड़क देंगे
  • एक आशंका भी है, कहीं इसकी वजह से गंभीर चेन रिएक्शन न शुरू हो जाए

न्यूयॉर्क (अमेरिका). यह योजना किसी साइंस फिक्शन जैसी लगती है, लेकिन अगले दस सालों में यह हकीकत बन सकती है। इस योजना के तहत हर दिन 800 से अधिक बड़े हवाई जहाज लाखों टन चॉक मिट्‌टी को पृथ्वी से 19 किलोमीटर ऊपर ले जाकर स्ट्रेटोस्फीयर में छिड़क देंगे। 

इस धूल की वजह से पृथ्वी के स्ट्रेटोस्फीयर में एक धूल का आवरण बन जाएगा और बड़ी मात्रा में सूर्य की किरणें और गर्मी वापस अंतरिक्ष में चली जाएगी। यह प्रयोग पृथ्वी को गर्म होने से काफी हद तक बचा सकता है। यह किसी गार्डन शेड बनाने वाले की योजना नहीं है, बल्कि इस प्रोजेक्ट पर माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक काम कर रहे हैं।
 
 

प्रयोग को लेकर अभी निश्चित नहीं हैं वैज्ञानिक 

  • इस योजना के प्रारंभिक परीक्षण पर करीब 21 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके तहत न्यू मेक्सिको रेगिस्तान के 19 किलोमीटर ऊपर जाकर एक साइंटिफिक बैलून करीब दो किलो चूना बिखेरेगा। इससे आकाश में ट्यूब के आकार का करीब पौन किलोमीटर लंबा और 100 मीटर व्यास का क्षेत्र बन जाएगा। इस गुब्बारे पर लगे सेंसर इसके बाद इस धूल की वजह से सूर्य की किरणों के परावर्तित होने की दर और इसके आसपास की हवा पर प्रभाव का विश्लेषण करेंगे।
  • हालांकि, यह प्रयोग अभी इस डर से रोका हुआ है कि कहीं इसकी वजह से गंभीर चेन रिएक्शन न शुरू हो जाए और इससे गंभीर सूखे और तूफान के हालात न बन जाएं। एक डर यह भी है कि कहीं स्ट्रेटोस्फीयर में धूल छिड़कने से ओजोन परत को नुकसान तो नहीं होगा।

 

आइडिया ज्वालामुखी में विस्फोट से आया था 
हार्वर्ड की टीम के एक निदेशक लिजी बर्न्स स्वीकार करते हैं कि उनका आइडिया डरावना है, लेकिन इतना ही डरावना वातावरण में हो रहा परिवर्तन भी है। इसीलिए इससे संभावित खतरों के अध्ययन के लिए विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया गया है। सवाल यह है कि इस योजना का आइडिया कहां से आया? असल में इसकी प्रेरणा 1991 में फिलीपींस के माउंट पिनाटुबो ज्वालामुखी में विस्फोट से मिली थी। हालांकि, इस विस्फोट की वजह से 700 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और दो लाख लोग बेघर हो गए थे। लेकिन, इसने वैज्ञानिकों को स्ट्रेटोस्फीयर में होने वाले बदलावों का अध्ययन करने का मौका दे दिया था। उस समय इससे फैली धूल की वजह से दुनिया का तापमान छह महीने तक आधा डिग्री घट गया था।

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