चेन्नई / सुभाष चंद्र बोस के दो सिपाही, ये 70 साल से आजाद हिंद फौज का बैज लगा रहे हैं

वी रथिनवेलु(बाएं) और वी अंगुसामी (दाएं)। फाइल फोटो वी रथिनवेलु(बाएं) और वी अंगुसामी (दाएं)। फाइल फोटो
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वी रथिनवेलु(बाएं) और वी अंगुसामी (दाएं)। फाइल फोटोवी रथिनवेलु(बाएं) और वी अंगुसामी (दाएं)। फाइल फोटो

  • गुरुवार को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 123वीं जयंती है, यह वी रथिनवेलु और वी अंगुसामी के लिए विशेष यादों का दिन है
  • चेन्नई के कोरुक्कुपेट में रहने वाले 96 साल के रथिनवेलु और 91 साल के अंगुसामी ने रंगून, इम्फाल और कोहिमा में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी थी
  • 1943 में रंगून में एक लाख लोगों के साथ दोनों आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए थे, यहीं सुभाष चंद्र बोस से पहली मुलाकात हुई

दैनिक भास्कर

Jan 23, 2020, 07:47 PM IST

चेन्नई. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 123वीं जयंती पर देश उनको याद कर रहा है। यह याद उन दोनों के लिए विशेष है, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में लड़ाई लड़ी। भले ही नेताजी की आजाद हिंद फौज देश में 70 साल से अस्तित्व में नहीं हैं, लेकिन इसके दो सिपाही अब भी रोज अपने सीने पर बैज लगाते हैं। चेन्नई के कोरुक्कुपेट में रहने वाले 96 साल के वी रथिनवेलु और 91 साल वी अंगुसामी ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रंगून, इम्फाल और कोहिमा में अंग्रेजों के खिलाफ जंग लड़ी थी। आज भी उनके घर की दीवार पर सुभाष चंद्र बोस के साथ उनकी तस्वीर और आजाद हिंद फौज का प्रमाणपत्र सजा है। 

वी रथिनवेलु ने बताया, 1943 में रंगून (अब यंगून) में आम सभा हुई थी। इसमें एक लाख भारतीय सुभाष चंद्र बोस से मिले थे। सबका उद्देश्य देश को आजादी दिलाना था। हम दोनों की सुभाष चंद्र बोस से यह पहली मुलाकात की थी। उनका भाषण देशभक्ति से भरा था और उसमें आजादी का जोश था। वह बताते हैं बोस उसी परिवार के सदस्य को सेना में लेते थे, जिसके यहां चार बच्चे थे। चार में दो को सेना में शामिल किया जाता था और दो को परिवार की देखभाल के लिए लौटा दिया जाता। उन्हें इस बात का यकीन नहीं है, सुभाष चंद्र बोस अब नहीं हैं।

दो दशक तक बर्मा में रहे 
91 साल के अंगुसामी बताते हैं कि वह युद्ध के बाद अगले दो दशक तक बर्मा में रहे। यहां स्थानीय लोगों के अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। 1965 में भारत वापस भेजे जाने से पहले वहां रहने वाले भारतीयों ने अपनी रोजी-रोटी के लिए प्रोविजन स्टोर और राशन की दुकानें खोल ली थींं। वह बताते हैं कि 1944 की इम्फाल में हुई लड़ाई में आजाद हिंद फौज और जापानी सेना ने कॉमनवेल्थ से आर्मी को सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया था। इस लड़ाई 10 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी, लेकिन 1945 में जापान के समर्पण करने के बाद कॉमनवेल्थ सेनाओं ने आजाद हिंद फौज के कई लोगों को पकड़ लिया था।

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