एक कहानी ऐसी भी:अफगानिस्तान में पुरुषों का वेश रख रहीं महिलाएं, वजह- ये अकेली हैं और पुरुष के बगैर घर से निकलने नहीं देता तालिबान

काबुल8 महीने पहले
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तालिबान की पाबंदियों का विरोध करतीं कुछ अफगान महिलाएं। - Dainik Bhaskar
तालिबान की पाबंदियों का विरोध करतीं कुछ अफगान महिलाएं।

पिछले साल 15 अगस्त को तालिबान ने काबुल के साथ ही पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा अगर किसी को भुगतना पड़ा है तो अफगान महिलाएं हैं। आए दिन इनके दर्द और तकलीफों की एक नई कहानी सामने आती है। चंद दिनों में दुनियां इन्हें भूल जाती है और हालात में कोई बदलाव नहीं आता। महिलाओं पर इतनी पाबंदियां लगाई गई हैं कि एक तरह से उनका सांस लेना भी दुश्वार हो गया है। जिंदगी पहले ही बहुत मुश्किल थी अब और ज्यादा हो गई है। खासतौर पर उन महिलाओं की जो अकेली हैं और युवा हैं। इनमें से कुछ तलाकशुदा हैं और किसी तरह जिंदगी बसर कर रहीं थीं। ऐसी ही एक कहानी यहां आपके लिए।

सही नाम नहीं बता सकती
UAE की वेबसाइट ‘द नेशनल’ ने एक तलाकशुदा महिला की कहानी बताई है। इसमें उसने तालिबान के डर से अपना असली नाम नहीं बताया, बल्कि मशहूर लेखिका राबिया बाल्कि के नाम से कहानी सुनाई।

राबिया कहती हैं- अफगानिस्तान में महिला होना ही गुनाह है, खासतौर से तालिबान के आने के बाद। और अगर आप सिंगल मदर हैं या तलाकशुदा है तो फिर हर सांस की कीमत देनी होती है। मैं 29 साल की तलाकशुदा और एक बेटी की मां हूं। फिलहाल, काबुल में छिपकर रह रही हूं।

कुछ अफगान महिलाओं ने पुरुषों जैसे वेश में तालिबान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।
कुछ अफगान महिलाओं ने पुरुषों जैसे वेश में तालिबान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।

तालिबान का डर
राबिया के मुताबिक- पहले हम काबुल में नहीं रहते थे, लेकिन पूरे मुल्क पर तालिबान का कब्जा हो चुका था। वो हर कदम पर मुझे धमका रहे थे। दोबारा शादी करने को कह रहे थे। तालिबानी कब्जे के पहले मैं एक एनजीओ के ऑफिस में काम करती थी। कुछ पैसे बचा लिए थे। तालिबान के डर से मैं काबुल आ गई। कुछ खैरात और कुछ बचे हुए पैसे से जिंदगी गुजार रही थी। दिसंबर में मुश्किल तब बढ़ गई जब तालिबान ने फरमान जारी किया कि कोई भी महिला अकेले घर से नहीं निकल सकती। उसके साथ मेहरम (कोई मेल यानी पुरुष गार्डियन) होना जरूरी है। ऑटो और टैक्सी भी चेक की जाने लगीं। मैं क्या करती? तलाकशुदा थी। कोई पुरुष गार्डियन नहीं था।

जिस महिला की यह कहानी है, वो काबुल में इस तरह निकलती है।
जिस महिला की यह कहानी है, वो काबुल में इस तरह निकलती है।

फिर विरोध का फैसला किया
राबिया आगे बढ़ती हैं और बताती हैं- मैंने विरोध का फैसला किया। अफगानी पुरुषों की तरह कपड़े पहने और एक सहेली से फोटो खिंचाए। इन्हें सोशल मीडिया पर डाल दिया। कैप्शन दिया- मैं महिला हूं और मेरा कोई मेल गार्डियन नहीं। डर लगा कि अगर मुझे कुछ हो गया तो बिटिया का क्या होगा? फिर सोचा मेरे जैसी कई महिलाएं होंगी। वो भी तो मेरा साथ देंगी। और यही हुआ भी। कुछ महिलाओं ने काबुल की सड़कों पर तालिबानी फरमान के खिलाफ प्रदर्शन किए। मैं भी उनमें शामिल हो गई। कुछ महिलाओं ने हमें ऑनलाइन सपोर्ट दिया। इन महिलाओं ने भी पुरुषों की तरह कपड़े पहने और सोशल मीडिया पर फोटो पोस्ट किए। इनमें एक नाम लिली हामिदी का भी था। हम तालिबान को ये बताना चाहते थे कि वो हमारी आवाज को ज्यादा देर तक दबा नहीं सकते।

पुरुषों को काम भी करना है
राबिया के मुताबिक- जो महिलाएं तलाकशुदा नहीं हैं, उनके साथ भी 24 घंटे पुरुष कैसे रह सकता है। उसे भी तो काम पर जाना पड़ेगा। मैं नहीं चाहती कि तालिबान हमें ये बताएं कि हम क्या पहनें और क्या नहीं। बहरहाल, विरोध प्रदर्शन के बाद तालिबान ने मुझे पहचान लिया। उसके बाद लिली का तो आज तक पता ही नहीं चला। तालिबान मुझे खोजते हुए घर आ गए और गिरफ्तार करके साथ ले गए। मुझसे दूसरी प्रदर्शनकारी महिलाओं के बारे में सवाल किए और कई थप्पड़ मारे। बाद में छोड़ दिया। मैं बेटी को साथ लेकर अब तक छिपती फिर रही हूं। आज मेरे पास कुछ नहीं है। न घर और न नौकरी। मुल्क भी अब मेरा कहां रहा? राबिया कहती हैं- मैं काबुल की सड़कों पर पुरुषों के वेश में निकलती हूं और किसी से आंखें मिलाने से बचती हूं। चेहरे पर मास्क रहता है।

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