आजादी के लिए अभियान / अफगानी महिलाओं की मांग- तालिबान से हो रही शांति वार्ता में सरकार हमें भी शामिल करे



कोबरा समीम। -फाइल फोटो कोबरा समीम। -फाइल फोटो
X
कोबरा समीम। -फाइल फोटोकोबरा समीम। -फाइल फोटो

  • अफगानिस्तानी महिलाओं ने शांति और अधिकार के लिए चलाया माय रेड लाइन अभियान
  • यह अभियान पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता फरहनाज फोरोटन ने शुरू किया था
  • अफगान राष्ट्रीय साइक्लिंग टीम की राइडर कोबरा समीम ने भी अभियान ज्वाइन किया

Dainik Bhaskar

Apr 23, 2019, 08:04 AM IST

काबुल. अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों की मांग को लेकर ‘माय रेड लाइन’ नाम से एक ऑनलाइन अभियान जोर पकड़ रहा है। इसके तहत देश की महिलाएं सरकार पर दबाव बना रही हैं कि अमेरिका और तालिबान के बीच होने वाली शांति वार्ता में उन्हें भी शामिल किया जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो बाद में उनकी आजादी और अधिकारों को दबाया जा सकता है। इस अभियान से अफगान राष्ट्रीय साइकिलिंग टीम की राइडर कोबरा सामिम और अभिनेत्री समीरा हामिदी भी जुड़ गई हैं। 

अभियान को देशभर की महिलाओं का समर्थन

  1. पूर्व राजनीतिज्ञ फर्खुंदा जहरा नादेरी ने ट्वीट किया था, ''महिला नेतृत्व की भूमिका की सुरक्षा को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। समीरा हमीदी की मांग है कि शांति वार्ता में महिलाओं को शामिल किया जाए।'' 

    N

  2. 23 साल की सामिम ने कहा, ''यदि तालिबान आता है, तो हमसे शिक्षा और खेल जैसे अधिकारों को छीन लिया जाएगा। महिलाओं का घर से निकलना तक प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। हमें शांति चाहिए, लेकिन हम खेल और साइक्लिंग से भी जुड़े रहना चाहते हैं।''

  3. सोशल मीडिया पर काफी लोग माय रेड लाइन अभियान से जुड़ रहे हैं। अभियान का उद्देश्य सरकार, तालिबान और अमेरिका पर दबाव बनाना है, ताकि महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए और शांति समझौते में जल्दबाजी के चलते कोई गड़बड़ी न हो।

  4. अफगानिस्तान की महिला पत्रकार ने शुरू किया अभियान

    माय रेड लाइन अभियान एक पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता फरहनाज फोर्तोन ने शुरू किया था। फोर्तोन ने अभियान संयुक्त राष्ट्रीय महिला अफगानिस्तान के समर्थन से शुरू किया था। वह लिखने की आजादी को अपनी रेडलाइन बताते हुए कहती हैं- ''मेरी कलम और मेरी आजादी की स्वतंत्रता।''

    N

  5. फोर्तोन ने कहा, ''शांति के साथ देश के हर कोने में युध्द पीड़ितों को सामाजिक न्याय भी मिलना चाहिए। यदि शांति आती है और न्याय नहीं मिलता है, तो यह एक स्थिर शांति नहीं होगी।''

  6. 2001 में अमेरिकी आक्रमण से पहले तालिबान ने शरिया कानून लागू करते हुए लगभग पांच साल तक अफगानिस्तान पर शासन किया। तालिबान राज में महिलाओं को उनके घरों तक सीमित कर दिया गया, उन्हें बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया और स्कूल जाने से मना किया गया। लोगों को सार्वजनिक रूप से मार दिया जाता था।

    N

  7. अमेरिकी सीनेट आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के सीनेटर ज्यां शाहीन ने इसी सप्ताह प्रेस वार्ता में कहा कि इस तरह का कदम महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि "महिलाओं के हितों, साथ ही अफगान समाज के एक व्यापक वर्ग के हितों को भी वार्ता में शामिल करने की आवश्यकता है।

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना