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रिफ्यूजी कैंप में तब्दील हो रहा अफगानिस्तान:स्कूल-अस्पताल वीरान, तालिबान के खौफ से डॉक्टर-नर्स नजर नहीं आ रहे, सीमावर्ती इलाकों में काबुल एयरपोर्ट जैसा नजारा है

3 महीने पहलेलेखक: उत्तरी अफगानिस्तान से नासिर अब्बास
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लश्करगाह की रहने वाली मां बच्चों के साथ कंधार के कैंप में रहने को मजबूर है। - Dainik Bhaskar
लश्करगाह की रहने वाली मां बच्चों के साथ कंधार के कैंप में रहने को मजबूर है।

अफगानिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी काबुल एयरपोर्ट जैसा नजारा है। हजारों लोग डर और अराजकता के चलते तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान और पाकिस्तान सहित दूसरे देशों में घुसने की कोशिश कर रहे हैं।

इनमें कई ऐसे भी हैं, जो इलाज जैसी मूलभूत जरूरत के लिए इन देशों का रुख कर रहे हैं। दरअसल, अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से उत्तर अफगानिस्तान के ज्यादातर हेल्थ सेंटर बंद हो गए हैं।

अस्पताल छोड़कर चले गए डॉक्टर और नर्स
डॉक्टर और नर्स अंडरग्राउंड हैं या मुल्क छोड़ चुके हैं। हेरात के नजीब उल्लाह को डर है कि उनके 75 वर्षीय हृदयरोगी पिता इलाज के अभाव में दम तोड़ देंगे। वे कहते हैं कि अब यहां हॉस्पिटल तबाह हो चुके हैं। सूने पड़े अस्पतालों में न डॉक्टर हैं और न ही नर्स। अपनी पत्नी के इलाज के लिए भटक रहे एक शख्स ने बताया कि तालिबान के कब्जे के बाद से डॉक्टर और नर्स अस्पतालों से भाग गए हैं।

तालिबान के इतिहास से हर कोई वाकिफ
हर किसी की तरह, वे (डॉक्टर) तालिबान से डरते हैं। उन्होंने डर के मारे अस्पतालों को छोड़ दिया है। यह शख्स बताता है कि हर कोई तालिबान के इतिहास से वाकिफ है, किस तरह उन्होंने 90 के दशक में सत्ता में आने पर डॉक्टर और मेडिकल कर्मचारियों को प्रताड़ित किया था, उसका खौफ आज भी लोगों के जेहन में बसा है।’ तालिबान के सत्ता में आने और सुरक्षित रहने के लिए सीमा पार करने की प्रतीक्षा में माता-पिता और उनके चार बच्चों सहित एक परिवार काबुल छोड़ गया है।

काबुल के ऐसे धराशाई होने की उम्मीद न थी
नाम न बताने का अनुरोध करते हुए परिवार ने दैनिक ​​भास्कर को बताया कि मैं और मेरी बड़ी बेटी काबुल में एक एनजीओ के लिए काम कर रहे थे। मैंने एक अमेरिकी एनजीओ के साथ काम किया है। हमें उम्मीद नहीं थी कि काबुल इतनी जल्दी धराशाई हो जाएगा। कोई भी इसके लिए पहले से मानसिक या शारीरिक रूप से तैयार नहीं था। हमें पासापोर्ट रिन्यू कराने तक का मौका ही नहीं मिला।

दोगुनी कीमतें देकर राशन जुटा रहे
आंखों में आंसू लिए वह कहता रहा कि अफगानिस्तान में कोई सुरक्षित नहीं है। तालिबान ने लोगों की तलाश शुरू कर दी है, खासकर वे जो अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए काम कर रहे हैं। दूसरी तरफ, केंद्रीय व्यवस्था खत्म होने से दैनिक उपयोग की चीजें ऊंची कीमतों में बिक रही हैं। कोई इन कीमतों को कंट्रोल नहीं कर रहा है। डर के चलते ज्यादातर दुकानें बंद हैं। लोग दोगुनी कीमतें देकर राशन जुटा रहे हैं। लोग भविष्य अंधेरे में देख रहे हैं।

हेलमंद में तालिबान का सबसे ज्यादा खौफ
हेलमंद प्रांत में हाल के दिनों में संघर्ष में सबसे अधिक मौतें हुई हैं। यहां विद्रोही गुट तालिबान से लड़ रहे हैं। यहां हजारों की संख्या में लोगों ने पलायन किया है। इस प्रांत के हेलमंद, लश्करगाह, गेरेश्क और नादअली जिलों में ही लड़कियों के लिए स्कूल चलते थे, लेकिन अब स्कूल सूने पड़े हैं। कुछ स्कूल खुले हैं, लेकिन उनमें एक भी लड़की नहीं पहुंच रही है। परिवार भी अपनी बेटियों को स्कूल नहीं भेजना चाहते।

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