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तालिबान का अफगानिस्तान:अब काबुल भी तालिबान का, बिना गोली चलाए ही राजधानी पर काबिज हो गए लड़ाके

9 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल

तालिबान ने बीते 10 दिन में अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है। 15 अगस्त को काबुल पर कब्जे के साथ ही अफगानिस्तान में तालिबान का राज कायम हो गया है। इन लड़ाकों की रफ्तार ने दुनियाभर के सुरक्षा विश्लेषकों को हैरान कर दिया है। तालिबान ने कई जिलों और शहरों पर बिना एक भी गोली चलाए कब्जा किया है।

तालिबान ने 6 अगस्त को ईरान सीमा से सटे जरांज पर कब्जा किया था। यह तालिबान के नियंत्रण में आने वाली पहली प्रांतीय राजधानी थी। इसके बाद एक-एक करके अफगानिस्तान की कई प्रांतीय राजधानियां तालिबान के कब्जे में आती गईं।

जलालाबाद में सड़कों पर तालिबान लड़ाकों की गाड़ियां घूमती नजर आईं।
जलालाबाद में सड़कों पर तालिबान लड़ाकों की गाड़ियां घूमती नजर आईं।

अफगानी सेना लोगों का भरोसा नहीं जीत पाई
विश्लेषक मानते हैं कि अफगानिस्तान की सेना के पास हथियार और प्रशिक्षण तो था, लेकिन वह स्थानीय लोगों का भरोसा जीतने में नाकाम रही। कई सालों से अफगान सेना पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। स्थानीय लोगों के लिए सवाल ये था कि वे किसे ज्यादा नापसंद करते हैं। अफगान सरकार और उसके सुरक्षा बलों को, या तालिबान को। तालिबान ने हाल के सालों में स्थानीय स्तर पर कूटनीति का इस्तेमाल किया और लोगों को अपने साथ मिलाने की कोशिश की। यही वजह है कि बहुत से इलाके तालिबान ने एक भी गोली चलाए बिना ही कब्जा कर लिए।

दोस्तम के सैनिक लड़े, लेकिन टिक नहीं पाए
शनिवार (14 अगस्त) को मजार-ए-शरीफ में कमांडर अता नूर और मार्शल दोस्तम के संगठित बलों ने कुछ टक्कर जरूर दी, लेकिन अफगान सेना के भीतरघात की वजह से उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा। अफगान सेना के भारी हथियार और हेलिकॉप्टर तथा लड़ाकू विमान सीधे तालिबान के हाथों में पहुंच गए।

इधर, शनिवार रात को तालिबान पाकिस्तान से काबुल जाने वाले हाईवे पर बसे अहम शहर जलालाबाद में दाखिल हुए और बहुत आसानी से सुबह होते-होते गवर्नर हाउस पर झंडा फहरा दिया। वहीं हजारा शिया बहुल बामियान प्रांत में भी तालिबान ने बिना गोली चलाए फतह हासिल कर ली। ये वही बामियान है जहां साल 2000 में तालिबान ने प्रसिद्ध बुद्ध प्रतिमाओं को बारूद से उड़ा दिया था। माना जा रहा था कि बामियान में उनका विरोध होगा, लेकिन ये प्रांत भी आसानी से उनके हाथों में आ गया।

काबुल में ईरानी दूतावास के बाहर वीजा के लिए लंबी कतार में लगे लोग।
काबुल में ईरानी दूतावास के बाहर वीजा के लिए लंबी कतार में लगे लोग।

रविवार सुबह काबुल पहुंचे तालिबानी लड़ाके
रविवार सुबह जब काबुल में लोगों की आंख खुली, तो तालिबान उनके दरवाजे पर खड़े थे। दोपहर होते-होते ये साफ हो गया कि राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर जा रहे हैं और पूरे अफगानिस्तान की कमान तालिबान के हाथों में जा रही है। तालिबान की रफ्तार पर उसके प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने भास्कर से कहा, ‘हम जानते थे कि यदि शांति प्रक्रिया और वार्ता कामयाब नहीं होती है तो हम सैन्य रूप से ऐसी प्रगति कर सकते हैं। हमें अपनी ताकत पर पूरा भरोसा था।’

आखिर इतनी तेजी से कैसे आगे बढ़ा तालिबान?
अब सवाल उठ रहा है कि तालिबान बिजली जैसी रफ्तार से कैसे आगे बढ़ा? अफगान सेना इतनी जल्दी पस्त कैसे हुई? यही समझने के लिए हमनें अफगानिस्तान युद्ध पर लंबे समय से नजर रख रहे रक्षा विश्लेषकों से बात की।

फरान जैफरी कई सालों से अफगानिस्तान के युद्ध पर नजर रखे हुए हैं। वे ब्रिटेन स्थित आतंकवाद विरोधी संस्थान ITCT के डिप्टी डायरेक्टर हैं। पॉल डी मिलर अफगानिस्तान में रह चुके हैं। वे CIA और अमेरिका की सुरक्षा परिषद से भी जुड़े रहे हैं। अभी जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में इंटरनेशनल अफेयर के प्रोफेसर हैं।

तालिबान के लड़ाके हथियारबंद तो हैं, लेकिन कई शहरों में उन्हें बिना लड़े ही जीत मिली है।
तालिबान के लड़ाके हथियारबंद तो हैं, लेकिन कई शहरों में उन्हें बिना लड़े ही जीत मिली है।

प्रोफेसर मिलर कहते हैं कि वे तालिबान की कामयाबी से हैरान नहीं है, लेकिन तालिबान की रफ्तार ने उन्हें चौंका दिया है। प्रोफेसर मिलर कहते हैं, 'मैं इस बात से बिल्कुल भी हैरान नहीं हूं कि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने पर तालिबान युद्ध जीत रहा है, पर तालिबान की गति ने मुझे हैरान कर दिया है। इसकी एक वजह ये है कि इस समय अफगान सेना के हौसले पस्त हैं।'

तालिबान की रफ्तार पर टिप्पणी करते हुए फरान जैफरी कहते हैं, 'तालिबान का इस रफ्तार से आगे बढ़ना कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का नतीजा है। तालिबानी चुपचाप जमीन पर अपना होमवर्क कर रहे थे। जो रिपोर्टें अब मिल रही हैं उनसे पता चलता है कि तालिबान के नेता अफगानिस्तान में कई राजनीतिक और सैन्य कमांडरों के संपर्क में थे।

काबुल की सरकार बहुत भ्रष्ट थी। सरकार को ये भी नहीं पता था कि काबुल के बाहर लोग क्या सोचते हैं? सरकार ने पिछले सालों के दौरान देशभर में स्थानीय नेताओं और मिलीशिया कमांडरों को निशाना बनाया और अब वे चाहते हैं कि यही तालिबान के खिलाफ लड़ाई में उनका साथ दें।'

अफगानिस्तान में लंबी तैनाती के बाद वापस लौटते हुए अमेरिकी फोर्स के सैनिक।
अफगानिस्तान में लंबी तैनाती के बाद वापस लौटते हुए अमेरिकी फोर्स के सैनिक।

जिस सेना को अमेरिका ने तैयार किया, वह बिखर गई
जैफरी कहते हैं, 'यदि ये रिपोर्ट्स सही हैं तो इसका मतलब यही है कि तालिबान लोकल मिलिट्री और राजनीतिक नेताओं को चुपचाप आत्मसमर्पण करने या मैदान छोड़ने के लिए मना रहा था। ये अभी स्पष्ट नहीं है कि अफगान सेना के बारे में इतनी गुप्त जानकारियां तालिबान को पहले से ही मिल गईं थीं, लेकिन ये तो पक्का है कि इस होमवर्क के बिना तालिबान इतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ सकता था।'

वहीं प्रोफेसर मिलर का मानना है कि अफगान सेना के हौसले पस्त होने की वजह अमेरिका का रवैया है। प्रोफेसर मिलर कहते हैं, 'इसकी एक वजह ये भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने का एकतरफा फैसला लिया है। तालिबान ने कतर में 2020 में हुए समझौते की अपनी शर्ते पूरी नहीं की हैं, बावजूद इसके अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकल रहा है।

जब राष्ट्रपति बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी का फैसला लिया तो उन्होंने अफगान लोगों को ये संदेश दिया कि आगे जो भी हो, अमेरिका तो छोड़कर जा रहा है। इससे अफगान सैनिकों को ये लगा कि उनके पास युद्ध लड़ने लायक संसाधन ही नहीं होंगे, ऐसे में वे इस नतीजे पर पहुंचे कि उनके पास लड़ने की कोई वजह ही नहीं है।'

अमेरिका 9/11 हमलों के बाद अल-कायदा को खत्म करने के लिए अफगानिस्तान आया था। तब अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन था। अब 20 साल बाद अमेरिका अफगानिस्तान में स्थिरता और शांति लाने के अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा किए बिना ही लौट रहा है। अभी अमेरिकी सेना पूरी तरह से अफगानिस्तान से गई भी नहीं है और जिस अफगान सेना को अमेरिका ने 20 सालों से तैयार किया था, वह ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है।

काबुल में रविवार को दिनभर चिनूक हेलिकॉप्टर उड़ान भरते नजर आए।
काबुल में रविवार को दिनभर चिनूक हेलिकॉप्टर उड़ान भरते नजर आए।

सिर्फ स्पेशल फोर्सेज के भरोसे रहना अफगान की बड़ी भूल
अमेरिका ने कुछ महीनों में ही तालिबान को सत्ता से हटा दिया था। बहुत से लोगों ने मान लिया था कि तालिबान अब खत्म हो जाएगा, लेकिन जैफरी कहते हैं कि ये आंकलन गलत था। वे कहते हैं, 'लोगों ने सालों पहले ही तालिबान को खत्म मान लिया था। यही सबसे बड़ी गलती थी। तालिबानी पूरी तरह अफगानिस्तान से कभी नहीं गए थे।

जब अफगानिस्तान में नाटो और अमेरिकी सुरक्षा बल अपनी कामयाबी के शिखर पर थे, तब भी तालिबानी पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे। हाल के सालों में तालिबान के फिर से उठ खड़े होने के कई कारण हैं। हलांकि इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि अफगानिस्तान सरकार स्थानीय स्तर पर एक सक्षम सेना और पुलिस बल खड़ा करने में नाकाम रही।'

फरान जैफरी कहते हैं, 'अफगानिस्तान में कई जगह ऐसा होता रहा कि रेगुलर आर्मी अपने ठिकाने बिना लड़े तालिबान को समर्पित करती रही। फिर सेना के स्पेशल फोर्सेज इन्हें तालिबान से मुक्त करा कर रेगुलर आर्मी को सौंपते और वे फिर से इन्हें गंवा देते। अफगानिस्तान के स्पेशल फोर्सेज देश में हर मोर्चे पर नहीं लड़ सकते थे। अफगान सरकार शहरों की सुरक्षा के लिए सिर्फ स्पेशल फोर्सेज पर ही निर्भर रही और ये भारी भूल साबित हो रही है।'

अमेरिका की मदद के बिना तालिबान से टक्कर लेना संभव नहीं
तालिबान की सबसे प्रमुख मांग है देश में शरिया कानून (इस्लामी कानून) लागू करना। अफगान सेना के पास वायुसेना भी थी और विदेशी सैन्य बलों की मदद भी। तालिबान के पास कोई वायुसेना नहीं है। अफगान सेना के मुकाबले उनके पास भारी हथियार भी कम थे। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अफगान सेना इतनी पस्त क्यों साबित हुई है?

इसके कारण समझाते हुए फरान जैफरी कहते हैं, 'अफगान सुरक्षा बलों की एक और सबसे बड़ी समस्या ये रही कि उनके पास इतने सैनिक नहीं थे जितने कि कागजों में हैं। इन्हें घोस्ट सोल्जर कहा जाता है। अफगानिस्तान पर नजर रखने वाले सभी लोग इस बारे में जानते हैं। अफगानिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उस सेना के लिए फंड हासिल कर रहा था, जो जमीन पर उस संख्या में मौजूद ही नहीं थी। इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका और नाटो की मदद के बिना अफगानी सेना तालिबान से टक्कर नहीं ले सकती थी।'

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