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द न्यूयार्क टाइम्स से विशेष अनुबंध के तहत:किशोरों को अपनी बात विस्तार से रखने दें, किसी काम से जुड़ने को प्रेरित करें, इससे मनौवैज्ञानिक रिकवरी तेज होगी

न्यूयॉर्क2 महीने पहले
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मनोवैज्ञानिक बोले- किशोरों ने बहुत कुछ सहा, अब आने वाले महीने उनके लिए अहम। - Dainik Bhaskar
मनोवैज्ञानिक बोले- किशोरों ने बहुत कुछ सहा, अब आने वाले महीने उनके लिए अहम।

ओहायो के हाईलैंड हाइट्स में 15 साल की कॉलिन मूनी घर के पीछे बरामदे में क्लास के दोस्तों के साथ काफी समय बाद बैठी। सालभर स्कूल से दूर रहे आठवीं के बच्चे जब मिले तो फील्ड डे, ग्रेजुएशन डे और स्पेशल मास पर चर्चा की। इससे इनका मन कुछ तो हल्का हुआ। दरअसल दुनियाभर में किशोर इतना थके कभी नहीं दिखे। चाहे ऑनलाइन क्लास हों, परीक्षाएं रद्द हों या फिर दोस्तों से दूरी से, वे निराशा और अवसाद में हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब संक्रमण के मामले घट रहे हैं। ऐसे में आने वाला वक्त उनके लिए रिकवरी का दौर होगा।

मनोवैज्ञानिक लीजा डेमौर के मुताबिक मनोवैज्ञानिक संबल देने वाले तत्वों का निर्माण बहुत हद तक शारीरिक मांसपेशियों के समान है। इसलिए किशोरों को वक्त देना होगा। उनके लिए महामारी बड़े नुकसान जैसा है। वे खेलकूद का वक्त, दादी-नानी के साथ छुटि्टयां और बर्थडे पार्टियों को याद करते हैं। कुछ के दोस्त पीछे छूट गए, कई ने प्रियजनों को खो दिया है।

ब्रुकलिन की 15 वर्षीय एरियल भावनाएं व्यक्त करने के लिए कविताएं लिखती हैं। वे इसे अवसाद से बाहर निकलने का जरिया मानती हैं। 17 साल की एवा वेस्टरगार्ड कहती हैं कि मेरे लिए जॉब यानी नए लोगों से जुड़ना है। भले ही कम पैसे ही क्यों न मिलें। मनोविश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में भी यह दुख उनकी जिंदगी का हिस्सा होगा। उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। ताकि जो कुछ बचा है, वे उसे खुशी से गले लगा सकें। उन्हें उनकी बात विस्तार से रखने का मौका दें। उन्हें किसी काम से जुड़ने को कहें ताकि वे दिमाग कहीं और लगा सकें और बाहरी दुनिया से दोबारा जुड़ सकें।

किशोरों के फैसले में उनका साथ दें, उन्हें कम न आंकें

सबसे बड़ी बात किशोरों को तय करने दें कि आने वाला वक्त उन्हें कैसे बिताना है। अपनी इच्छाएं न लादें। अगर वो नई भाषा सीखना चाहते हैं या उपन्यास लिखने की इच्छा है, तो उनके रास्ते में बाधा न बनें। अगर वो पढ़ाई में हुए नुकसान की भरपाई करना चाहते हैं तो उनकी मदद करें। उनमें इस बात को लेकर अपराधबोध है तो उसे उबरने में मदद करें। जैसे इवांस्टन के 14 साल के कॉरी रॉबिंसन कोरोनाग्रस्त हुए थे।

उन्होंने कहा कि मैं अब छुटि्टयों में कुछ नहीं करता तो खुद को दोषी महसूस करूंगा। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसी सोच गलत है। अगर किशोरों के मन में अपराधबोध की भावना है तो वह आगे बढ़ने में परेशानी महसूस करेंगे। उनके फैसले में साथ दें, उन्हें कम आंकने की गलती न करें।

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