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चर्चा में डॉ. अशरफ गनी:अफगानिस्तान का राष्ट्रपति होना सबसे खराब जॉब मानते हैं डॉ. गनी, इनकी सरकार पर अस्थिरता का खतरा मंडरा रहा

4 महीने पहले
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अफगानिस्तान के राष्ट्रपति डॉ. अशरफ गनी अहमदजई ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अफगानिस्तान का राष्ट्रपति होना इस धरती की सबसे खराब नौकरी है। - Dainik Bhaskar
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति डॉ. अशरफ गनी अहमदजई ने एक इंटरव्यू में कहा था कि अफगानिस्तान का राष्ट्रपति होना इस धरती की सबसे खराब नौकरी है।

अमेरिका की इंटेलिजेंस रिपोर्ट के मुताबिक छह महीनों के भीतर डॉ. गनी की सरकार गिर सकती है। पूरे अफगानिस्तान पर तालिबानियों के कब्जे की आशंका है। गनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिला अधिकारों के पैरोकार हैं। हालांकि 2017 में उनकी एक टिप्पणी विवादित रही थी। इस पर उन्होंने महिलाओं से माफी भी मांगी थी।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति डॉ. अशरफ गनी अहमदजई ने अक्टूबर 2017 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि अफगानिस्तान का राष्ट्रपति होना इस धरती की सबसे खराब नौकरी है। डॉ. गनी ने जब यह बात कही, तब शायद उन्हें अंदाजा नहीं रहा होगा कि हालात और भी बदतर होने वाले हैं।

यह दक्षिण एशियाई देश फिर से खूनी संघर्ष की ओर बढ़ रहा है। दो दशकों बाद अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान छोड़कर स्वदेश लौट रही हैं। सितंबर तक सारे सैनिक वापस अमेरिका लौट जाएंगे। खबर है कि तालिबान आधे अफगानिस्तान पर कब्जा कर चुका है। निर्दोष अफगानी नागरिक मारे जा रहे हैं।

पिछले साल अफगानिस्तान के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गए डॉ. गनी
तालिबान की शर्त है कि जब तक डॉ. गनी राष्ट्रपति रहेंगे, शांति वार्ता नहीं हो सकेगी। 72 साल के डॉ. गनी पिछले साल ही अफगानिस्तान के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गए हैं। अफगानिस्तान की अस्थिर राजनीति में डॉ. गनी अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला को हराकर राष्ट्रपति बने थे। इसके लिए भी दोबारा मतगणना करानी पड़ी थी।

इसके पहले 2014 के राष्ट्रपति चुनाव में भी यही स्थिति बनी थी। कभी अमेरिकी नागरिक रहे डॉ. गनी अकादमिक विद्वान हैं और अफगानिस्तान में विकास कार्यों के पीछे की वजह माने जाते हैं। गनी कहते हैं कि उनकी अफगानी सेनाएं तालिबानियों का मुकाबला करने के लिए तैयार हैं। इस अस्थिरता के बीच अफगानिस्तान और डॉ. अशरफ गनी पर दुनियाभर की निगाहें टिकी हैं।

प्रोफेसर से राजनीतिज्ञ तक का सफर

हॉपकिंस-बर्कले में प्रोफेसर रहे, आठ भाषाएं जानते हैं
डॉ. गनी अफगानिस्तान के लोगार प्रांत में पैदा हुए। लेबनान में बेरूत स्थित अमेरिकन यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी (मानवशास्त्र) की पढ़ाई की। इसके बाद वापस अफगानिस्तान आकर काबुल में एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाने लगे। इस बीच अफगानिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी सरकार ने गनी के कई परिजनों और रिश्तेदारों को नजरबंद कर दिया। उनके कई पूर्व छात्रों को परेशान करने के साथ उनकी हत्या भी कर दी गई।

इससे परेशान गनी 1977 में अफगानिस्तान छोड़कर अमेरिका चले गए। वहां उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी में मास्टर्स और फिर पीएचडी पूरी की। अमेरिका की नागरिकता लेकर जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले में एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाने लगे। डॉ. गनी दारी, पश्तु, अंग्रेजी, अरेबिक, उर्दू, फ्रेंच, रसियन और हिंदी जानते हैं।

दुनिया के 100 बुद्धिजीवियों में 50वें नंबर पर हैं गनी
2001 में अमेरिका में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका के कई प्रांतों में लॉकडाउन लग गया था। वॉशिंगटन स्थित वर्ल्ड बैंक में काम कर रहे डॉ. गनी का घर दूर था। जाने के लिए कोई साधन नहीं था। दफ्तर में घंटों फंसे रहे गनी ने उस वक्त तय कर लिया था कि अब और नहीं। आतंकवाद को रोकने और अपनी भूमिका को समझने की जरूरत है।

अमेरिका में 24 साल बिताने के बाद दिसंबर 2001 में वह अफगानिस्तान लौट आए। 2009 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकता त्याग दी थी। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि जब अफगानिस्तान सुलग रहा था, वे अमेरिका में आराम की जिंदगी जी रहे थे। हालांकि गनी कहते हैं कि उन दो दशकों में वह अफगानिस्तान के बारे में ही सोचते रहे। 2013 में आयोजित एक सर्वे में वह दुनिया के टॉप-100 बुद्धिजीवियों मेंं 50वें क्रम पर थे।

10 साल वर्ल्ड बैंक में रहे, अफगानिस्तान में नई मुद्रा शुरू की
डॉ. गनी ने पर्यावरणीय मुद्दों से लेकर सार्वजनिक जीवन में धर्म की भूमिका पर अध्ययन किया। 1985 में पाकिस्तान के मदरसों पर शोध के लिए गए। इसके बाद उन्होंने अकादमिक क्षेत्र छोड़ विकास कार्यों की ओर ध्यान लगाया। विश्व बैंक में 10 साल एंथ्रोपोलॉजिस्ट रहे। गनी 2002-04 तक हामिद करजई की सरकार में वित्तमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने नई मुद्रा लॉन्च की।

राजस्व का केंद्रीकरण किया। टेलीफोन सिस्टम स्थापित करने में मदद की। अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र के दूत के सलाहकार के रूप में बॉन समझौते को लागू करने में मदद की। इसके चलते ही अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार की दिशा में कदम आगे बढ़े। हामिद करजई के सलाहकार के रूप में लोया जिरगा (बड़ी सभा)आयोजित की। इस सभा में ही संविधान को मान्यता मिली और करजई को नियुक्त किया गया। अफगानिस्तान के राष्ट्रीय विकास रूपरेखा विकसित की।

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