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तालिबान राज में एक और समस्या:20 साल से फल-फूल रही अफगानी कला संकट में; कई बड़े कलाकार देश छोड़ भागे, जो हैं उन्होंने हुनर छोड़ा

एक महीने पहलेलेखक: शरीफ हसन
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तालिबान ने अब तक प्रतिबंध की घोषणा नहीं की पर नीतियों में अनिश्चितता के कारण संकट। - Dainik Bhaskar
तालिबान ने अब तक प्रतिबंध की घोषणा नहीं की पर नीतियों में अनिश्चितता के कारण संकट।

अफगानी कला बदले माहौल में पिछले दो दशक से खुली हवा में सांस लेना सीख ही रही थी कि तालिबान हुकूमत का संकट खड़ा हो गया। तालिबान ने अभी भले कला काे प्रतिबंधित नहीं किया, लेकिन उनके रुख काे लेकर कुछ तय नहीं है। तालिबानी रुख को देखते हुए कई कलाकार जिंदगी और कला बचाने के लिए देश छाेड़ गए। जो कलाकार अफगानिस्तान में रह गए उन्हें लगता है कि वे यहां रहकर कला जीवित नहीं रख पाएंगे।

अपने हुनर से परिवार की गुजर-बसर करने वाले संकट में हैं। वर्ष 2001 में तालिबान के खात्मे के बाद पनपी कला को तालिबानी तहस-नहस करने पर आमादा हैं। उन्हाेंने संगीत स्कूल बंद कर दिए। सार्वजनिक स्थानों पर लगी प्रतिमाएं ढंक दीं। चित्रों पर रंग पोत दिए गए। रेडियाे और टीवी पर गानाें, संगीत कार्यक्रमाें, काॅमेडी शाे का प्रसारण बंद हाे गया। फिल्म प्राॅडक्शन भी ठप है।

जिस दिन अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भागे थे कलाकार ओमैद शरीफी (36) काबुल के पुराने शहर में गवर्नर दफ्तर में चित्र पेंट कर रहे थे। शहर में दहशत देख काम बंद कर सब घर चले गए। कई कलाकार अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी सहित अन्य देशाें काे चले गए। वर्जीनिया में रह रहे ओमैद का कहना है कि अफगानिस्तान में कला-संस्कृति का भविष्य धुंधला है।

शरीफी ने काबुल में धमाकाें से क्षतिग्रस्त दीवाराें पर शांति और समानता के संदेश लिखे। करीब 2200 चित्र पेंट किए। पिछले तीन महीने में इन्हें सफेद पेंट से पाेत कर धार्मिक और तालिबान समर्थक नारे लिखे गए हैं। शरीफी कहते हैं कि हमने कड़ी धूप और सर्दी में इन्हें पेंट किया था। हमें मारने की धमकी मिली, लेकिन काम बंद नहीं किया।

स्टार गायक ने बंद कर दिया गाना... अब सब्जी बेचने को मजबूर

इंडियन आइडल की तरह कार्यक्रम अफगान स्टार के लाेकप्रिय गायक हबीबुल्ला शबाब ने अपने सभी गाने फाेन से डिलीट कर दिए। बकौल शबाब मैं संगीत के बारे में बात ही नहीं करता। अकेले में अपने गाने याद कर राेना आता है। शबाब अब सब्जी बेचने लगे हैं। अफगानिस्तान में ग्रैफिटी आर्ट जैसी नई कलाओं के साथ ही काॅमेडियन और गायकाें की नई पीढ़ी तैयार हाे रही थी। तालिबानी हिंसा के विराेध में कॉमेडी करने वाले और गीत गाने वाले ये कलाकार अब भय में जीने काे मजबूर हाे हैं।

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