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ब्रिटिश लॉ कमीशन ने जारी की चेतावनी:सेल्फ ड्राइविंग कारें अश्वेतों को अंधेरे में पहचान नहीं पाती, यह महिलाओं और बच्चों के लिए भी असुरक्षित

लंदन2 महीने पहले
लॉ कमीशन ने कहा है कि सेल्फ ड्राइविंग कारों में महिलाओं व सड़क पर सही तरह से न चलने वालों को लेकर भी समस्या आ सकती है।
  • वयस्क पुरुषों को ध्यान में रखकर इसकी डिजाइन तैयार की गई है
  • ब्रिटेन में 2035 तक 40% नई कारें सेल्फ ड्राइविंग एआई टेक्नोलॉजी वाली ही बिकेंगी

ब्रिटेन के लॉ कमीशन ने सेल्फ ड्राइविंग कारों में इस्तेमाल की जा रही टेक्नोलॉजी को लेकर चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि सेल्फ ड्राइविंग कारें अश्वतों को पहचानने में पूरी तरह सक्षम नहीं है। साथ ही महिलाओं के मामले में भी इस टेक्नोलॉजी में भेदभाव बरता गया है। इसकी डिजाइन में खामी है, इनमें पूर्वाग्रह झलकता है। अगर इसमें सुधार नहीं किया गया तो नतीजे खतरनाक हो सकते हैं।

सेल्फ ड्राइविंग कारों में एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है और उन्हें इस तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि वह पैदल चलने वालों को पहचान लें। इससे वे तय कर सकें कि कहां रुकना है और दुर्घटना से किस तरह बचना है। विशेषज्ञों ने यहां पूर्वाग्रह शब्द इसलिए इस्तेमाल किया है, क्योंकि अंधेरे या कम रोशनी में अश्वेत को ज्यादा जोखिम हो सकता है। लॉ कमीशन ने कहा है कि सेल्फ ड्राइविंग कारों में महिलाओं व सड़क पर सही तरह से न चलने वालों को लेकर भी समस्या आ सकती है।

इन गाड़ियों के ऑपरेटिंग सिस्टम पुरुषों ने डिजाइन किए हैं। हालांकि ब्रिटेन में एक स्वतंत्र निकाय सेल्फ ड्राइविंग कारों के लिए कानूनी ढांचा तैयार कर रहा है। विशेषज्ञ इस बात को लेकर चिंतिंत हैं कि ब्रिटेन में 2035 तक 40% नई कारें सेल्फ ड्राइविंग टेक्नोलॉजी वाली ही बिकेंगी। इसलिए जरूरी है कि सड़कों पर उतरने से पहले इन गाड़ियों को हर तरह की परिस्थिति में प्रतिक्रिया देने के लिए पूरी तरह तैयार किया जाए। इसके रोडमैप पर काम कर रहे निकाय के प्रमुख एडमंड किंग के मुताबिक दुर्घटनाओं की बड़ी वजह इंसानों से होने वाली गलती है, पर हमें ये जोखिम नई टेक्नोलॉजी के साथ नहीं अपनाने चाहिए। यानी रोबोटिक गलतियां स्वीकार करनी चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि संभवत: सिस्टम को व्हीलचेयर और मोबिलिटी स्कूटर के हिसाब से भी प्रशिक्षित नहीं किया गया है। छोटे यात्रियों, महिलाओं और बच्चों का भी ध्यान नहीं रखा गया है, क्योंकि डिजाइनिंग पुरुषों को केंद्र में रख कर की गई है। इसके अलावा मौजूदा फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी भी चेहरों के रंग पहचानने में भेदभाव करती है।

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