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कैंसर पर रिसर्च:कोशिकाओं की बार कोडिंग से वैज्ञानिक जान रहे कैंसर के कुछ इलाज विफल क्यों, इसके फैलने व दोबारा होने जैसी गुत्थियां भी सुलझा रहे

2 महीने पहलेलेखक: जिना कोलाटा
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शोधकर्ताओं का दावा- दवा में बदलाव कर इलाज को प्रभावी बनाने में मदद मिल सकेगी। - Dainik Bhaskar
शोधकर्ताओं का दावा- दवा में बदलाव कर इलाज को प्रभावी बनाने में मदद मिल सकेगी।

व्हाइट ब्लड सेल कैंसर वाले मरीज (क्रोनिक लिम्फेटिक ल्यूकेमिया से ग्रस्त) इलाज के बाद दोबारा कैंसर ग्रस्त हो जाते हैं। इसकी वजह कुछ कैंसर कोशिकाओं का प्रतिरोधी होना तो नहीं है? वैज्ञानिक लंबे समय से इस गुत्थी को सुलझाने में जुटे हैं, इसके लिए उन्होंने नई तकनीक ईजाद की है। शोधकर्ताओं ने इसे सेल (कोशिकाओं की) ‘बार कोडिंग’ नाम दिया है। यह सिर्फ कैंसर ही नहीं अन्य बीमारियों के उपचार विफल होने के कारण पता लगाने में भी कारगर है। विशेषज्ञों का मानना है कि उपचार हमेशा सही कोशिकाओं को लक्ष्य बनाकर नहीं होता।

अक्सर मेडिकल की किताबों में बताया जाता है कि कैंसर हमेशा परिपक्व बोन मैरो कोशिकाओं में पैदा होता है, जबकि स्टडी के दौरान पता चला कि यह बात सही नहीं है। कुछ रोगियों में कैंसर का मूल स्रोत प्राथमिक बोन मैरो या स्टेम सेल भी हो सकती हैं, जो शरीर में सभी डब्ल्यूबीसी, आरबीसी का निर्माण करती हैं। इन कोशिकाओं पर कीमोथेरेपी का असर भी नहीं होता। ये कोशिकाएं नई कैंसर कोशिकाओं को जन्म दे सकती हैं और बीमारी लौट सकती है। बार कोडिंग से ऐसी ही कोशिकाओं का पता लगाया जाता है। बार कोडिंग का श्रेय वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के डॉ. जे शेंड्यूर और सहयोगियों को है।

उन्होंने भ्रूण कोशिकाओं के विकास के दौरान इसका इस्तेमाल किया था। उन्नत होने के बाद इस तकनीक से अब भ्रूण से लेकर कैंसर कोशिका और परिपक्व कोशिकाओं की कोडिंग संभव है। क्रोनिक ल्यूकेमिया के मामले में बोस्टन चिल्ड्रन हॉस्पिटल डॉ. विजय शंकरन और उनकी टीम ने स्वाभाविक रूप से होने वाले म्यूटेशंस के जरिए उन मानव कैंसर कोशिकाओं की बार कोडिंग की जो विशेष कोशिकाओं को टारगेट करती हैं। डॉ. शंकरन बताते हैं, बार कोडिंग से हमें कैंसर के बारे में जो दृष्टिकोण मिला, वो पहले कभी नहीं मिला था।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डॉ. लियोनार्ड जोन ने इस तकनीक के जरिए क्लोन हेमेटोपोइसिस (सीएचआईपी) की स्टडी की, यह अवस्था बुजुर्गों में कैंसर और दिल के रोगों का जोखिम बढ़ाती है। उन्हें पता चला कि इस अवस्था में सिर्फ एक ब्लड स्टेम सेल बोन मैरो के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेती है।

बार कोडेड कोशिका से उसके ओरिजन का पता लगा लेते हैं शोधकर्ता

बार कोडिंग में हर सेल को एक स्टैम्प के साथ चिह्नित किया जाता है। यह स्टैम्प सेल से बनने वाली सभी बाकी सेल्स में भी पहुंचती है। शोधकर्ता एक सेल को देख सकते हैं, उसके बार कोड नोट कर सकते हैं। इसके जरिए वे सेल के वंश का पता लगाते हुए उसके ओरिजिन तक पहुंचते हैं। क्योंकि मूल बार कोडेड सेल से पैदा होने वाली हर कोशिका पर समान स्टैम्प होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या का मूल पता चलने के बाद दवा में बदलाव करके इलाज को प्रभावी बना सकते हैं।