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कैप्टन प्रीत चांदी की भारतीय मीडिया से पहली बातचीत:बोलीं- "ये तुमसे नहीं होगा...' को ही मैंने ताकत बना लिया और अंटार्कटिका पहुंच गई, नई पीढ़ी को प्रेरणा देगी मेरी कोशिश

11 दिन पहले
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कैप्टन प्रीत चांदी - Dainik Bhaskar
कैप्टन प्रीत चांदी

ब्रिटिश सेना में भारतीय मूल की कैप्टन प्रीत चांदी उर्फ पोलर प्रीत साउथ पोल पर अकेले पहुंचने वाली पहली गैर श्वेत और दुनिया की तीसरी महिला बन गई हैं। इस सफर में उन्होंने कई दफा बर्फीले तूफान और माइनस 40 से 50 डिग्री तापमान का सामना किया। वे 45 दिन में ये सफर पूरा करने वाली थीं पर 40 दिनों में ही 1150 किमी की दूरी अकेले तय की। सेना में फिजियोथेरेपिस्ट 32 साल की प्रीत ने इस यात्रा के अनुभव और भविष्य की योजनाएं भास्कर के रितेश शुक्ल के साथ साझा कीं। पढ़िए उन्हीं के शब्दों में...

अभी मैं यूनियन ग्लेशियर स्थित अंटार्कटिका लॉजिस्टिक्स बेस पर हूं। मौसम साफ होने का इंतजार कर रही हूं ताकि घर लौट सकूं। पहले लग रहा था कि अकेलापन सताएगा। यकीन मानिए इन 40 दिनों के दौरान इतना अकेलापन महसूस नहीं हुआ जितना किशोरावस्था में लगता था। मेरा दृढ़ विश्वास है कि जब आप मन का काम करते हैं तब अकेलापन नहीं लगता। आप कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर कुछ भी हासिल कर सकते हैं। ऐसा करना मुझे बचपन से ही पसंद रहा है।

मन में वो सारे काम करने की लालसा रही, जो असंभव जान पड़ते हैं। जिनके बारे में लोग कहते हैं कि ये आपसे न हो पाएगा। हमेशा से सुनती आई हूं कि मैं ये नहीं कर सकती, वो मुझसे नहीं होगा। मेरा मानना है लोग जब कुछ करने से मना करते हैं, तब असल में वे अपना भय व्यक्त कर रहे होते हैं। इस “नहीं’ को मैंने चुनौतियों के रूप में लिया। दुनिया में अंटार्कटिका से ज्यादा ऊंची, सर्द, अकेली, सूखी और बर्फीली हवाओं से सराबोर कोई और जगह नहीं है।

यहां अकेले 40 दिन रह सकते हैं, तो फिर कुछ भी संभव है। इस उपलब्धि से मैं अपनी 8 साल की भतीजी की रोल मॉडल बन सकती हूं। मैं चाहती हूं कि वो और आने वाली पीढ़ी असंभव की सीमाओं से आगे निकल जाए और वे अनंत संभावनाओं को जी सकें। सगाई के कुछ ही हफ्तों बाद मैं इस सफर पर निकल पड़ी थी। माइनस 45 से 50 डिग्री की ठंड में 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवा के विपरीत 87 किलो वजन लेकर 9 से 11 घंटे स्कीइंग करना सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा।

गिरने से बचना, गिरकर उठना और फिर कोशिश करना थका देने वाला था। मेरा शरीर तो रोज थकता था पर आत्मा उत्साह से लबरेज रहती थी। मेरी नानी ने मुझे कुछ पैसे दिए थे कि मैं यात्रा के दौरान कुछ ले सकूं। साउथ पोल पर इस पैसे का इस्तेमाल सबसे बड़ी चुनौती बनी। इस दौरान मैंने अनुभव किया कि बर्फीले समुद्र की ही तरह उत्साह का विस्तार हो गया है जो अब कभी कम नहीं हो सकता। मैं एक सैनिक हूं और रक्षा करना मेरा काम है। इस यात्रा के बाद किसी को मेरी रक्षा करने की काबिलियत पर संदेह नहीं होगा।

मेरा भाई मुझे राखी बांधता रहा है। अब विश्वास के साथ मुझे राखी बांध सकता है। साउथ पोल के पास पृथ्वी और प्रकृति बहुत गंभीर दिखाई पड़ती है। ऐसा लगता है मानो वो अपनी पीड़ा उजागर नहीं करना चाहती। लेकिन हम सब जानते हैं प्रकृति पीड़ित तो है। इस जानकारी के बाद भी संवेदनहीनता हम सब को भारी पड़ेगी। यहां से लौटते ही दूसरी यात्रा का रोडमैप तैयार है। अब चाहती हूं कि साउथ पोल लांघकर दूसरे छोर तक पहुंचा जाए। ऐसा अब तक किसी महिला ने नहीं किया है। इन सब चुनौतियों को पार करने की शक्ति और प्रेरणा मुझे मेरे दादा जी से मिलती हैं।

उन्होंने मुझे हमेशा विश्वास दिलाया कि मैं जो चाहूं वो कर सकती हूं। हालांकि अब वो इस दुनिया में नहीं हैं। पर इस यात्रा में मुझे हमेशा लगा कि वो मुझे ऊपर से देख रहे हैं। मेरे दादाजी पंजाब से थे। मेरी परवरिश के लिए यूके शिफ्ट हो गए थे। वो बिल्कुल लंबी सफेद दाढ़ी में वो भारतीय सांता जैसे दिखते थे। मुझे त्योहारों में बैसाखी बहुत प्रिय है। इसके अलावा भांगड़ा और दिलजीत दोसांज के गाने बहुत पसंद हैं। इस सफर में भी मैं उनके गाने सुनती थी। इसलिए मैं खुद को पंजाबी गर्ल कहती हूं।’ - प्रीत