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  • China Becomes Stronger In The Indian Ocean, India's Neighboring Countries Are Also Under Its Control; Now Thinking Of Making Port In West Africa

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समुद्र में ड्रैगन का बढ़ता कद:हिंद महासागर में ताकतवर हुआ चीन, भारत के पड़ोसी देशों को भी कर रहा कंट्रोल; अब पश्चिम अफ्रीका में बंदरगाह बनाने पर विचार

बीजिंग/दिल्लीएक महीने पहले
चीन की सबसे बड़ी प्रगति पूर्वी अफ्रीका के देश जिबूती में देखने को मिली है। PLA ने यहां 1 अगस्त 2017 को अपने पहले विदेशी सैन्य अड्डे की शुरुआत की। (फाइल फोटो)

दुनिया को अपने काबू में करने के मंसूबे पाला चीन लगातार समुद्री क्षेत्रों में अपने पैर पसार रहा है। नौसेना के मामले में चीन अमेरिका से कई आगे निकल गया है। साथ ही वह अब भारत के पड़ोसी देश म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान को कंट्रोल करने लगा है। इसके अलावा उसकी नजर पूर्वी अफ्रीकी देश जिबूती के बाद पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल पर है। यहां वो ​​सेनेगल नौसेना के लिए एक बंदरगाह बनाने पर विचार कर रहा है। एक कम्युनिस्ट राष्ट्र के रूप में चीन ताकतवर देश है। वह सुरक्षात्मक, कूटनीतिक और आर्थिक मामलों में दुनियाभर के देशों से अलग ही क्षमता रखता है।

पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने और देश से दूर नौसेना के ठिकानों के अवसर तलाशने के प्रयासों में भी चीन की विस्तारवादी सोच नजर आती है। खासकर हिंद महासागर को लेकर इस देश की चर्चा अधिक होती है। यहां वो म्यांमार, श्रीलंका और पाकिस्तान के व्यापारिक बंदरगाहों में निवेश करता है और उन्हें अपने सैन्य हित के लिए भी इस्तेमाल करने से पीछे नहीं रहता। चीन कई तरह से अपने विस्तारवादी नीति को बढ़ा रहा है।

दुनिया के शीर्ष बंदरगाह में चीन के अकेले सात बंदरगाह

दुनिया के शीर्ष बंदरगाहो में सात अकेले चीन के हैं। बड़े बड़े देशों के लिए बंदरगाह संचालित करना आसान नहीं है। लेकिन चीन इससे अलग है। वह इनका उपयोग व्यवसायिक गतिविधि, सुरक्षा और जियोपॉलिटिक्स के लिए करता है। इसकी वजह चीन को एक वैश्विक शक्ति बनना है।

विदेशी पोर्ट के लिए चीन स्ट्रांगिक स्ट्रांग पॉइंट का इस्तेमाल करता है। यह एक रणनीतिक दृष्टिकोण है, जिसके सहारे वह दूसरे देशों को आर्थिक मदद के बहाने अपने सैन्य विस्तार को बढ़ावा देता है।

चीन की बंदरगाहों पर मौजूदगी काफी अनिश्चित है। लेकिन अब इनमें काफी तालमेल दिखने लगा है। इसमें COSCO मुख्य है। COSCO का मतलब चाइना ओशन शिंपिंग कंपनी है। यह पहले चाइना ओशन शिपिंग ग्रुप था। इसका स्वामित्व पहले चीन की सरकार के पास था। इसमें 13 विदेशी बंदरगाह शामिल हैं, जो ग्रीस का पीरियस, अबू धावी, बेल्जियम में जेब्रुग, और स्पेन में वेलेंसिया है।

चाइना मर्चेंट में 7 विदेशी बंदरगाह हैं। इसमें जिराउत में दोरालेह और श्रीलंका में हम्बनटोटा शामिल है। साथ ही टर्मिनल लिंक है। COSCO 460 से अधिक कंटेनर का संचालन करने की क्षमता रखता है। यह सबसे बड़ा बंदरगाह है। इसमें 111,397 चीनी नागरिक काम करते हैं। इनमें एक तिहाई से ज्यादा पार्टी के सदस्य हैं।

स्ट्रिंग पर्ल क्या और इसका खतरा क्यों है?

स्टिंग ऑफ पर्ल्स यानी हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की वह घेराबंदी है, इसे भारत के लिए तैयार किया गया है। यानी चीन की सेना किसी न किसी तरह से इलाके में स्थायी तौर पर मौजूद है। चीन ने पाकिस्तान से लेकर मालदीव तक अपने सैन्य अड्डे बना लिए हैं। यह एक हिंद महासागर में चीन नियंत्रित हिस्से का नेटवर्क है।

इसका उपयोग पिपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) कर सकता है। इस पर कई सालों से चर्चा चल रही है, लेकिन यह अबतक बनकर तैयार नहीं हो पाया है। पाकिस्तान के ग्वादर इलाके को PLA का बेस बताया जाता है।

चीन की सबसे बड़ी प्रगति पूर्वी अफ्रीका में जिबूती देश में देखने को मिली है। PLA ने यहां 1 अगस्त 2017 को अपने पहले विदेशी सैन्य अड्डे की शुरुआत की थी। इसका विकास अदन की खाड़ी में तैनात काउंटर पाइरेसी टास्क फोर्स को मदद देने के लिए किया गया था।

इस इलाके में टास्क फोर्स की तैनाती 2008 से है। हॉर्न ऑफ अफ्रीका के इलाके में समुद्री घटना लगभग खत्म हो गई है। वहीं, अब चीन अपनी सेना वहां से बुलाने के मूड में नहीं है। इससे पता चलता है कि PLA अभी वहीं तैनात रहना चाहता है।

यह भी पढ़ें: चीन दुनिया की सबसे बड़ी नौसैन्य ताकत:समुद्र में अब चीन सबसे ताकतवर, 20 साल में अपने से तीन गुना शक्तिशाली अमेरिकी नौसेना से आगे निकला

जिबूती बेस की दूरी लेमिनियर कैंप से 15 मिनट की दूरी पर है। लेमिनियर अमेरिका की तरफ से दी जाने वाली अफ्रीका महाद्वीप को सबसे बड़ी सैन्य सुविधा है। चीनी के अधिकार वाला डोरलेह कमर्शियल पोर्ट PLA के जहाजों को खड़ा करने के लिए है।

PLA भी अपने स्तर पर इसका विस्तार कर रहा है। 2021 शुरुआती महीनों मे यह आंकड़ा 43% तक पहुंच जाएगा। कथित तौर पर चीन पश्चिम अफ्रीका के सेनेगल इलाके में सेनेगल नौसेना के लिए एक बंदरगाह बनाने पर विचार कर रहा है। यह पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण अटलांटिक के लिए PLA नौसेना को सुविधा प्रदान करेगा।

विस्तार के लिए अपनी बेल्ट एंड रोल नीति को जारी रखेगा चीन: अमेरिकी खुफिया एजेंसी​​​​​​​

  • अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने बताया है कि चीन की सरकार आर्थिक,राजनीतिक और विस्तार के लिए अपनी बेल्ट एंड रोल नीति को जारी रखेगा। इससे चीन की सैन्य शक्ति को बढ़ावा मिलेगा। बेल्ट एंड रोड चीन की एक नीति है। इसमें सिल्क रोड के आधार पर एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों को सड़कों और रेल मार्गों से जोड़ा जाना है।
  • साल 2013 में जिनपिंग ने इंडोनेशिया की संसद में एक मेरिटाइम सिल्क रोड का पहली बार आइडिया दिया था। जिनपिंग ने यह आइडिया सत्ता संभालने के 1 साल बाद दिया था। इसका उद्देश्य चीन को यूरोप और बाकी एशिया के देशों से जोड़ना था।
  • दरअसल, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का चीन पर पूरा प्रभाव है। चाहे वह पब्लिक सेक्टर हो या प्राइवेट। सरकार अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए निजी कंपनियों पर अधिक दबाव डालती है। इसलिए वह 2017 का कानून नेशनल इंटेलिजेंस लॉ सभी बिजनेस को डाटा के लिए सरकारी अनुरोधों का पालन करने के लिए मजबूर करता है।
  • जाहिर है कि सड़क और रेल कनेक्शन और दुनिया में बंदरगाहों का नेटवर्क होने से चीन को फायदा होता है। यह चीन के मजदूरों के लिए रोजगार पैदा करता है। साथ ही एक नेटवर्क भी देता है। इससे दुनिया के अधिकतर देश चीन की तरफ खींचे चले आते हैं, और वह अपने जाल में फंसा देता है।
  • वहीं, चीन वैक्सीन कूटनीति का उपयोग कर अपने प्रभाव को भी बढ़ाने की कोशिश करेगा। जल्द ही चीन नए अंतर्राष्ट्रीय मानदंडो का उपयोग मानव अधिकारों और टेक्नॉलोजी को प्रमोट करने को भी करेगा। इसके लिए जल्द हमें सभी देशों की संप्रभुता और राजनीतिक स्थिरता पर भी जोर देना होगा।

ASPI की रिपोर्ट में दावा- चीन ने भविष्य की योजनाएं सोच समझकर तैयार की है

  • इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया स्ट्रेटजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) ने भी चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर फरवरी में एक रिपोर्ट जारी की है। इसका शीर्षक "चीन के नौसेना विस्तार के पीछे बंदरगाह संचालक (Leaping across the Oceans: The Port Operators behind China's Naval Expansion) है। इसको लिखने वाले चार्ली लियोन्स जोन्स और राफेल बीवीट ने कहा है कि इसका कनेक्शन PLA से है। कोरोना से उभरने की संभावना का मुख्यकेंद्र BRI है। भविष्य की योजनाएं बहुत सोच विचार कर तैयार की गई है। इस दौरान PLA के उद्देश्यों को लेकर काम किया जाएगा।

इस तरह के ठिकानों को हथियार बना सकता है चीन

  • ASPI की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अन्य देश के साथ तनाव होता है, तो चीन इन देशों की मदद ले सकता है। राजनीतिक तौर पर सभी को इकट्ठा कर विरोधी देश के खिलाफ गलत प्रचार चलाया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक CCP और COSCO के बीच सुरक्षा को लेकर जो रिश्ता है, उसका उपयोग भी किया जा सकता है। इसमें मिसाइल से लेकर बड़े से बड़े जहाज का संचालन किया जा सकता है।
  • स्पाइरिलिंग डेब्ट ट्रेप में फंसना किसी भी देश के लिए जोखिम से कम नहीं है। यह चीन को शोषण करने का मौका देती है। यह सिर्फ विकासशील देशों के साथ ही नहीं है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया में उत्तरी क्षेत्र की सरकार ने अनजाने में चीन की कंपनी लैंडब्रिज इंडस्ट्री को डार्बिन बंदरगाह पर 99 साल की लीज की मंजूरी दी । चीन के नौसैनिक ने इस इलाके में अपनी मौजूदगी से न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया को दहशत में ला दिया था। चीन की दुनिया के बंदरगाहों पर बढ़ती मौजदूगी ने अब अन्य देशों की चिंता बढ़ा दी है। ASPI ने अपनी रिपोर्ट कहा है कि चीन अपने हित के लिए अन्य देशों की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकता है।

चीन अपने सैन्य मंसूबों को निवेश और डेवलपमेंट की आड़ मे छुपाता

  • ASPI की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन जानता है कि सैन्य ठिकाने बनाने के लिए युद्ध की स्थिति बन जाती है। इसलिए वह अपने सैन्य मंसूबों को निवेश और डेवलपमेंट की आड़ मे छुपाता है। USA ने 9 अप्रैल के एनुअल थ्रेट असेसमेंट ऑफ द यूएस इंटेलिजेंस कम्युनिटी में उल्लेख किया कि चीन लगातार अपनी बीजिंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को संरक्षित करने के लिए आर्थिक, तकनीकि और कूटनीति के साथ अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ा रहा है। वह अपने सीमा को पूर्वाग्रह के रूप में देखता है और इसको लेकर अमेरिका के खर्चे पर अंतरर्राष्ट्रीय सहयोग चाहता है। लेकिन इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हम PLA से विदेशी सैन्य ठिकानों और एक्सेस समझौतों का पालन करते रहने की उम्मीद करते हैं।

दुनिया की जागरूकता ने चीन के प्रभाव को कम किया

  • ASPI की रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन अभी भी बंदरगाहों का अधिक से अधिक निर्माण चाहता है। लेकिन दुनिया में चीन को लेकर जागरूकता और कोरोना ने इसके प्रभाव को कम कर दिया है। चीन और अमेरिका बीच चल रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने इसके मंसूबों को बहुत बड़ा धक्का दिया है। क्योंकि अधिकतर देश जिनपिंग की विस्तारवादी नीति को पहचानते हैं। चीन छोटे देश के साथ ही हस्तक्षेप करता है और अपने जाल में फंसाता है।
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