अमेरिका / तालिबान से वार्ता रद्द होने से ट्रम्प की परेशानी बढ़ी, सेना वापसी के मुद्दे पर विदेश मंत्री और एनएसए एकमत नहीं



अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन आर बोल्टन एक बैठक के दौरान। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन आर बोल्टन एक बैठक के दौरान।
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन आर बोल्टन एक बैठक के दौरान।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन आर बोल्टन एक बैठक के दौरान।

  • राष्ट्रपति ट्रम्प अपने कार्यकाल के खत्म होेने तक अफगानिस्तान में शांति और वहां से सेना वापसी को सुनिश्चित करना चाहते हैं
  • राष्ट्रपति ट्रम्प ने गत 30 अगस्त को अपने शीर्ष सलाहकारों की बैठक बुलाई थी और अफगानिस्तान मुद्दों को लेकर चर्चा की थी
  • बैठक में निर्णय लिया गया था कि वार्ता के लिए अफगानिस्तान सरकार और तालिबान को एक साथ शामिल किया जाए

Dainik Bhaskar

Sep 09, 2019, 08:08 PM IST

वॉशिंगटन. तालिबान और अफगान सरकार के साथ वार्ता रद्द होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की परेशानियां बढ़ती जा रही है। अमेरिका में अगले साल राष्ट्रपति चुनाव होना है और वह इससे ठीक पहले अफगानिस्तान को लेकर किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना चाहते हैं। इसी को लेकर दोनों पक्षों के साथ उसने आठ सितम्बर को एक बैठक प्रस्तावित की थी।

 

राष्ट्रपति ट्रम्प ने पिछले महीने 30 अगस्त को अपने शीर्ष सलाहकारों की बैठक बुलाई थी और अफगानिस्तान मुद्दों को लेकर चर्चा की थी। बैठक में ट्रम्प ने इस पर चर्चा की थी कि अफगानिस्तान में पिछले 18 महीनों से जारी युद्ध और हिंसा की घटनाओं से किस प्रकार अमेरिका को बाहर निकाला जाए और उनके कार्यकाल के दौरान तक एक शांति योजना लाई जा सके।

 

पोम्पियो और बोल्टन के बीच अफगान मुद्दे पर टकराव है

इस बैठक में विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन आर बोल्टन के बीच टकराव नजर आया। विदेश मंत्री और उनके वार्ताकार जल्मे खलीलजाद अफगानिस्तान में बिना शांति स्थापित किए सेना वापसी का विरोध कर रहे हैं। वहीं, बोल्टन बिना किसी अंतिम नतीजे पर पहुंचे सेना वापसी की बात कर रहे हैं। बोल्टन ने वॉर्सा से एक वीडियो के माध्यम से कहा था कि ट्रम्प को अफगानिस्तान में किसी अमेरिकी सेना के मारे जाने से पहले ही उसे वापस लेने का फैसला ले लेना चाहिए।

तालिबान से नौ राउंड की वार्ता के बाद डील पर लगभग सहमति बन गई थी

  1. ट्रम्प ने हालांकि इस मौके पर कोई निर्णय नहीं लिया। लेकिन उन्होंने बैठक के दौरान वाशिंगटन में आठ सितम्बर को तालिबान और अशरफ गनी के साथ एक वार्ता को अंतिम रूप देने पर विचार किया था। ट्रम्प का कहना था कि वह राष्ट्रपति अशरफ गनी को भी बैठक में आमंत्रित करेंगे। अफगान सरकार इस वार्ता में पक्षकार नहीं है।

  2. ट्रम्प ने 5 सितंबर को हुए कार बम धमाके में एक अमेरिकी समेत 12 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद इस बैठक को रद्द कर दिया गया। ट्रम्प ने शनिवार रात को ट्वीट कर इसकी घोषणा की थी। इसके बाद न सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा के अधिकारियों बल्कि सरकार के सभी सदस्य चौंक गए जो इस वार्ता में शामिल थे।

  3. ट्रम्प ने जब से अपना पदभार संभाला था, वह तब से अफगानिस्तान से सेना की वापसी को लेकर अपना ध्यान केंद्रित किए हुए थे। ताकि इससे अगले साल होनेवाले चुनाव में उन्हें मदद मिल सके। अफगानिस्तान के पूर्व राजदूत खलीलजाद पिछले एक साल से तालिबान से बातचीत सफल बनाने के प्रयासों में जुटे हुए हैं।

  4. अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा और कतर में नौ राउंड की बातचीत हो चुकी है। इस दौरान दोनों पक्षों ने कई मुद्दों पर सहमति बना ली थी। खलीलजाद ने भी घोषणा की थी कि समझौते के दस्तावेज को सैंद्धांतिक तौर पर अंतिम रूप दिया जा चुका है।

  5. इस समझौते में कहा गया था कि अगले 16 महीनों में अफगानिस्तान से 14 हजार अमेरिकी सैनिकों को धीरे-धीरे बाहर निकाल लिया जाएगा और इसके विपरीत तालिबान आतंकवाद के खिलाफ अफगानिस्तान के जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा। लेकिन अफगान सरकार ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि इस वार्ता में स्थायित्व स्थापित करने जैसे मुद्दों की कमी है।

  6. बोल्टन हमेशा इस समझौते के खिलाफ रहे क्योंकि पोम्पियो के सहयोगियों ने सुरक्षा सलाहकार को इस बातचीत से हमेशा अलग करने की कोशिश की। बोल्टन ने तर्क दिया था कि ट्रम्प बिना किसी समझौते के एक संख्या तक सेना छोड़कर करीब पांच हजार सैनिकों को बाहर निकाल सकता है। अमेरिकी सरकार का एक तबका इस तर्क पर सहमत नहीं है।

     

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