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महामारी का नौकरियोंं पर असर:महामारी के दौरान कम और मध्यम आय वाले ज्यादातर देशों में गरीब और कम शिक्षित लोगों की नौकरियां ज्यादा सुरक्षित रहीं

3 महीने पहलेलेखक: जोनाथन रोथवेल
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कोरोनावायरस ने दुनियाभर के समुदायों को वर्ग के हिसाब से प्रभावित किया। - Dainik Bhaskar
कोरोनावायरस ने दुनियाभर के समुदायों को वर्ग के हिसाब से प्रभावित किया।

अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और कई अन्य देशों में महामारी ने सबसे ज्यादा असर निम्न-आय और कम शिक्षित लोगों की नौकरी पर डाला है। इससे उनकी आर्थिक स्थिति भी खराब हुई है। पर कम और मध्यम आय वाले ज्यादातर देशों में इस वर्ग के लोगों की नौकरियां ज्यादा सुरक्षित रही हैं। इनमें यूरोप और एशिया के कई देश शामिल हैं। वैश्विक कंसल्टेंसी गैलप ने जुलाई 2020 से मार्च 2021 के दौरान दुनिया भर में किए गए सर्वे के आधार पर ये नतीजे निकाले हैं। इसमें करीब 117 देशों में कोरोना के असर का सर्वे किया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आम तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लंबे समय से यहीं समझाया है कि संक्रामक रोग और स्वास्थ्य संबंधी परिणाम सीधे तौर पर सामाजिक-आर्थिक स्थिति को संवेदनशीलता के साथ प्रभावित करते हैं। पर गैलप की रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी खास वर्ग को होने वाले नुकसान और महामारी के बीच सीधा संबंध हो, यह जरूरी नहीं है। बल्कि महामारी के बावजूद कम आय वाले देश नौकरियों को सुरक्षित रखने में ज्यादा आगे रहे क्योंकि वहां बड़े पैमाने पर छंटनियां नहीं हुईं। हालांकि इसकी एक बड़ी वजह उन देशों में कम आय या शिक्षा वाली आबादी में बड़े पैमाने पर बेरोजगारी भी रही।

अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस सहित कुछ मुट्ठी भर देशों के आंकड़ों से पता चलता है कि कोरोना से कम आय वाले समुदायों, अश्वेत लोगों और कुछ जातीय अल्पसंख्यकों में ज्यादा मौतें हुई हैं। लेकिन इसकी वजह कुछ और है। रिसर्च में पता चला है कि इस समुदाय के लोगों का एक्सपोजर श्वेतों की तुलना में ज्यादा रहा। वे 30% ऐसी नौकरियों में रहे, जहां उन्हें लोगों से सीधा संपर्क करना पड़ा। यह रिसर्च जल्द ही अमेरिकन एकेडमी ऑफ पॉलिटकिल एंड सोशल साइंस में प्रकाशित होने वाली है।

डिग्री और बिना डिग्री वालों को नुकसान दोनों ही तरह के देशों में बराबर

रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर सबसे गरीब 20 देशों के 41% कर्मचारियों ने कहा कि महामारी के दौरान उनकी नौकरी या कारोबार को नुकसान हुआ। 20 अमीर देशों में यह आंकड़ा 23% रहा। पर दोनों ही तरह के देशों में कॉलेज डिग्री वालों में यह 16-16% और बिना डिग्री वालों में यह 35-35% ही रहा, यानी दोनों जगह बराबर।