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भारत-श्रीलंका संबंध:एक्सपर्ट बोले- नए PM भारत के ज्यादा करीब; श्रीलंका के हालात जल्द सुधरने की उम्मीद नहीं

नई दिल्ली/कोलंबो5 दिन पहलेलेखक: वृष्टि नारद
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रानिल विक्रमसिंघे श्रीलंका के ​​​​नए प्रधानमंत्री बन गए हैं। 12 मई को उन्होंने शपथ ली। रानिल के लिए रास्ता बेहद मुश्किल है। श्रीलंका इस वक्त करीब-करीब दिवालिया हो चुका है। उसके फॉरेन रिजर्व 2 अरब डॉलर के करीब हैं। सियासी हालात भी खराब हैं और इसकी वजह से वहां यूनिटी गवर्नमेंट बनाकर फिलहाल जनता को अमन के लिए लॉलीपॉप थमाने की कोशिश की गई है।

बहरहाल, रानिल पांच बार पहले भी प्रधानमंत्री रह चुके हैं। भारत और अमेरिका के करीबी माने जाते हैं और सबसे बड़ी बात उन्हें श्रीलंका का सबसे बेहतर पॉलिटिकल एडमिनिस्ट्रेटर माना जाता है। ऐसे में अब भारत और श्रीलंका के रिश्ते किस तरफ जाएंगे? दोनों के सामने क्या चुनौतियों होंगी और क्या हमारा ये पड़ोसी मुश्किलात से उबर पाएगा? हमने इन तमाम मसलों पर विदेशी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर रहीस सिंह से बातचीत की...

विक्रमसिंघे के आने से भारत के साथ श्रीलंका के संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

महिंदा राजपक्षे चीन के ज्यादा करीब थे। विक्रमसिंघे का झुकाव पूर्व में भी भारत की तरफ ज्यादा रहा है। वो एक बार फिर पीएम हैं, उम्मीद है कि दोनों देशों के रिश्ते अब पहले से ज्यादा मजबूत होंगे।

रानिल के दौर में भारत की तरफ डाइवर्ट हुआ था श्रीलंका
विक्रमसिंघे के पिछले कार्यकालों को देखा जाए तो ये साफतौर पर नजर आता है कि उनका झुकाव भारत की तरफ रहा है। कोलंबो एयरपोर्ट और हंबनटोटा को लेकर वो चीन से भारत की तरफ डाइवर्ट हुए थे। उन्होंने राजपक्षे युग का कुछ हद तक सफाया भी किया था। क्योंकि महिंदा राजपक्षे के समय श्रीलंका पूरी तरह से चीन की गोद में बैठ गया था।

श्रीलंका एंटी-इंडियन एक्टिविटीज में भी शामिल था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि महिंदा की सरकार चीन के साथ थी और उसी के कहने पर चलती थी। ऐसे में श्रीलंका की प्रो-इंडिया पॉलिसी नहीं थी। विक्रमसिंघे के सत्ता में आने से भारत के लिए भी अच्छा होगा। क्योंकि भारत के पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल और श्रीलंका अनस्टेबल डेमोक्रेसी है।

भारत-श्रीलंका लॉन्ग टर्म रिलेशन किस पर होंगे निर्भर?
हाल में तो ये देखना होगा कि वे इंटरनल पॉलिटिक्स को कैसे हैंडल करते हैं? क्योंकि वहां समस्या एक दिन में खत्म होने वाली नहीं है। इस पर ही भारत और श्रीलंका के लॉन्ग टर्म रिलेशन निर्भर करेंगे। शुरूआती तौर पर देखा जाए तो भारत के साथ श्रीलंका के रिश्ते पिछली सरकार से बेहतर होंगे।

हालात जल्द बेहतर नहीं होंगे
संघर्ष अभी लंबा चलेगा। श्रीलंका की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। पहले की श्रीलंकाई सरकारों ने चीन, जापान और भारत जैसे देशों से खूब कर्ज लिए। 2010 के बाद से ही लगातार श्रीलंका का विदेशी कर्ज बढ़ता गया। 2 वर्षों में श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 70% तक घट गया है। फरवरी तक श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में केवल 2.31 बिलियन डॉलर ही बचा था, जबकि 2022 में ही उसे लगभग 4 बिलियन डॉलर का लोन चुकाना है। इससे एक वक्त ऐसा आएगा जब उनकी इकोनॉमी को सपोर्ट करने वाला कोई नहीं होगा।

मुश्किलें और भी हैं
श्रीलंका में मल्टी-एथनिक कल्चर है। सिंहली, तमिल, मुस्लिम और बौद्ध धर्म के लोग हैं। जब आर्थिक संकट आता है, तो पॉलिटिकल एंगल जुड़ ही जाता है। इससे संघर्ष लंबा खिंच जाता है। श्रीलंका अभी पॉलिटिकल अनस्टेबेलिटी और इकोनोमिक क्राइसिस से जूझेगा। क्षेत्रवाद और इससे जुड़ी मांगें भी जोर पकड़ेंगी। तमिल फ्रीडम मूवमेंट तेज हो सकता है। श्रीलंका को दूसरे देशों से सहयोग की जरूरत होगी, लेकिन ये देश किस तरह उसकी मदद कर पाएंगे, ये तो श्रीलंका में पॉलिटिकल स्टेबेलिटी पर डिपेंड करेगा।

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