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दिलचस्प खबर:न स्त्री का अंडाणु, न पुरुष का स्पर्म, वैज्ञानिकों ने त्वचा की कोशिकाओं से लैब में बनाया इंसानी भ्रूण; 14 दिन वाले कानून ने आगे बढ़ने से रोका

एक महीने पहले
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क्या आप जानते हैं बच्चा जन्म लेने से पहले मां की कोख में भ्रूण होता है? अगर हां, तो इस जानकारी में कुछ और भी जोड़ने की जरूरत है। दरअसल, स्त्री का अंडाणु (egg) और पुरुष का शुक्राणु (sperm) आपस में मिलने यानी फर्टिलाइजेशन के कुछ दिन बाद सबसे पहले ब्लास्टोसिस्ट या ब्लास्टॉइड बनाते हैं। यही ब्लास्टोसिस्ट जाकर गर्भाशय की दीवार से चिपक जाता है और कुछ दिनों बाद भ्रूण बनता है।

अब बात इससे जुड़ी सबसे बड़ी खबर की। पिछले दिनों अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों के दो समूहों ने स्त्री के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु के बिना ही मानव भ्रूण की शुरुआती संरचना यानी ब्लास्टोसिस्ट बना दी। वह भी गर्भाशय में नहीं, बल्कि अपनी लैबोरेट्री की पेट्री डिश में।

पेट्री डिश कांच की एक छोटी सी प्लेट होती है, जिनमें वैज्ञानिक अपने प्रयोग करते हैं। आसान शब्दों में कहें तो वैज्ञानिकों ने स्त्री और पुरुष के बिना ही प्रयोगशाला में भ्रूण तैयार कर दिया।

पेट्री डिश में मौजूद इस ब्लास्टोसिस्ट ने ठीक वैसा ही व्यवहार किया जैसा वह गर्भाशय की दीवार पर चिपकने पर करते हैं। असली ब्लास्टोसिस्ट की तरह जब इन्हें चार-पांच दिन तक बढ़ने दिया गया तो उसमें भी भ्रूण की तरह प्लेसेंटा और प्री एम्नियोटिक कैविटी बनने की शुरुआत हो गई।

प्लेसेंटा वह नली होती है जिससे भ्रूण को माता के रक्त से पोषण और ऑक्सीजन छनकर मिलती है। इसे आम बोली में नाल भी कहते हैं। वहीं, एम्नियोटिक कैविटी वह झिल्ली है जिसमें भ्रूण पलता है।

वैज्ञानिक इससे आगे भी बढ़ सकते थे लेकिन इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर स्टेम सेल रिसर्च (ISSCR) की गाइडलाइन के अनुसार किसी भी मानव भ्रूण पर लैबोरेट्री में फर्टिलाइजेशन के 14 दिनों तक ही प्रयोग किए जा सकते हैं। इस नियम के चलते वैज्ञानिकों केवल 5 दिनों बाद ही रिसर्च रोक दी।

वयस्क इंसान की त्वचा से तैयार किया ब्लास्टोसिस्ट

वैज्ञानिकों के पहले समूह ने वयस्क इंसान की त्वचा की कोशिकाओं को जेनेटिक प्रोग्रामिंग के जरिए मानव ब्लास्टोसिस्ट जैसा बना दिया।

वहीं दूसरे समूह ने वयस्क इंसान की त्वचा की कोशिकाओं और भ्रूण से ली गईं स्टेम सेल के जरिए यह प्रयोग किया। इन स्टेम सेल को खास रासायनिक क्रियाओं के जरिए ब्लास्टोसिस्ट जैसा गोल आकार दिया गया। शोधकर्ताओं ने अपनी संरचना को आई ब्लैस्टॉइड्स और ह्यूमन ब्लास्टॉइड्स नाम दिया है।

अंडाणु और शुक्राणु मिलकर ऐसे बनाते हैं भ्रूण

स्त्री के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु में फर्टिलाइजेशन के कुछ दिनों के बाद अंडाणु ब्लास्टोसिस्ट नाम की संरचना बनाता है। इसकी बाहरी परत ट्रोफेक्टोडर्म कहलाती है और उसके अंदर बाकी पदार्थ सुरक्षित होता है। जैसे-जैसे ब्लास्टोसिस्ट विकसित होता जाता है, वैसे-वैसे अंदर का पदार्थ दो तरह की कोशिकाओं के समूह में बंट जाता है। इन्हें इपीब्लास्ट और हाइपोब्लास्ट कहते हैं।

इसके बाद ब्लास्टोसिस्ट जाकर गर्भाशय के टिशू पर चिपक जाता है और आगे का विकास वहीं दीवार से जुड़ कर होता है। यहीं इपीब्लास्ट की कोशिकाएं भ्रूण बनाती हैं। ट्रोफेक्टोडर्म आगे चलकर पूरा प्लेसेंटा बनाता है और हाइपोब्लास्ट से उस झिल्ली का निर्माण होता है, जिससे बढ़ते भ्रूण को पोषण की सप्लाई मिलती है।

बच्चे का विकास, जन्मजात बीमारियां समझने, गर्भपात रोकने काम आएगी यह स्टडी

स्टडी में कहा गया है कि इससे गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास को समझने, गर्भपात रोकने, जन्मजात कमियों को समझने और उन्हें दूर करने और बच्चे की चाह रखने वाले असमर्थ जोड़ों की ज्यादा मदद की जा सकेगी।

न्यूयॉर्क में इकान स्कूल ऑफ मेडिसिन में स्टेम सेल के बारे में पढ़ाने वाले प्रोफेसर थॉमस स्वाका कहते हैं कि इस तरीके से बने वैकल्पिक मॉडल उपलब्ध होने से रिसर्चरों को असली भ्रूणों का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और उन पर नियम-कानूनों का दबाव भी कम होगा।

अभी भी मानव के प्रारंभिक विकास के स्तर पर होने वाले बदलावों से जुड़ी इतनी सारी बातें रहस्य बनी हुई हैं, जिनसे शरीर की तमाम गतिविधियों, अंगों और बीमारियों के बारे में समझा जा सकता है।

भ्रूण पर रिसर्च की राह में कई कानूनी और नैतिक अड़चन

किसी भी तरह की रिसर्च के लिए इंसानी भ्रूण को पाना वैज्ञानिकों के लिए हमेशा से बहुत कठिन रहा है। दरअसल, मानव भ्रूण को लेकर मौजूदा अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानून ऐसे हैं जिनमें कई कानूनी और नैतिक अड़चनें हैं।

इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर स्टेम सेल रिसर्च (ISSCR) के अनुसार IVF के जरिए बच्चा पाने की कोशिश करने वालों के लिए भ्रूण विकसित करने का काम अंडे और स्पर्म का फर्टिलाइजेशन कराने के लिए केवल 14 दिनों तक ही किया जा सकता है। इस अवधि के बाद उसे कल्चर करने पर रोक है। यानी फर्टिलाइजेशन के 14 दिनों के लिए वैज्ञानिक किसी तरह प्रयोग कर सकते हैं।

दूसरी ओर वैज्ञानिकों का कहना है कि 14 दिन वाले नियम में उन भ्रूणों की बात नहीं है जो बिना फर्टिलाइजेशन के तैयार किए गए हों, फिर भी टीम के रिसर्चर्स ने नियमों की सीमा में रहते हुए केवल पांच दिन तक ही ब्लास्टॉइड को कल्चर किया।

रिसर्च के अगुवाः ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों की अगुवाई मोनाश यूनिवर्सिटी के बायोमेडिसिन डिस्कवरी इंस्टीट्यूट और ऑस्ट्रेलियन रीजेनेरेटिव मेडिसिन इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर मोनाश ने की। वहीं अमेरिकी वैज्ञानिकों ने यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर के प्रोफेसर लाइकियन यू के साथ काम किया।

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