भास्कर इंटरव्यू / टोक्यो में चुनाव जीते पहले भारतीय ने कहा- जापान में नेता एक दूसरे को बुरा नहीं बोलते



first indian who won election in japan yogendra puranik interview
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first indian who won election in japan yogendra puranik interview

  • पुराणिक ने बताया- जापान में राजनीति नौकरी की तरह, प्रचार के दौरान तीन वॉर्निंग मिलने पर चुनाव से बेदखल होने का खतरा रहता है

Dainik Bhaskar

May 02, 2019, 10:45 AM IST

टोक्यो. जापान में पहली बार किसी भारतीय ने कोई चुनाव जीता है। राजधानी टोक्यो के इदोगावा वार्ड से योगेंद्र पुराणिक ने 6,447 वोट हासिल कर चुनाव जीता है। भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान नेताओं के बीच जहां तीखी बयानबाजी हो रही है, वहीं योगेंद्र बताते हैं कि जापान में स्वच्छ राजनीति पर जोर है। कोई उम्मीदवार किसी दूसरे नेता के बारे में बुरे शब्द नहीं कह सकता। प्रचार के दौरान अगर कोई उम्मीदवार कुछ गलत करे तो पुलिस और चुनाव अधिकारी सीधे फोन कर वॉर्निंग दे देते हैं। तीन बार की चेतावनी आपने नजरअंदाज कर दी तो आपके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग सकती है। पढ़ें योगेंद्र की दैनिक भास्कर प्लस ऐप के साथ बातचीत के अंश...

 

जापान की राजनीति में आने का ख्याल कैसे आया?
पुराणिक :
वैसे तो मैं समाजसेवक के रूप में भारतीय और जापानी समाज में पहले से ही काफी सक्रिय रहा। चीनी और कोरियन समाज के लोगों से भी मेरी दोस्ती रही है। राजनीति में आने का ख्याल तीन साल पहले आया। मैंने सोचा कि समाज के लिए कुछ तो काम किया जाए। इदोगावा की सरकार कुछ ठोस कदम उठा नहीं रही थी। सोचा कि अब नहीं तो फिर कभी नहीं। इसीलिए, इस साल चुनाव लड़ने का सोचा और जीता।

 

जापान और भारत की राजनीति में क्या फर्क देखते हैं?
पुराणिक :
जापान के चुनाव काफी शालीनता के साथ और नियमों के अनुसार होते हैं। यहां मैंने एक-दूसरे को बुरा-भला या खराब शब्द कहने वाले भाषण नहीं सुने। गलत काम होते नहीं देखे। सभी नेता एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। यह जरूर है कि यहां की राजनीति में धर्म काफी मायने रखता है। कुछ धार्मिक संगठनों से जुड़े राजनीतिक दल काफी वोट हासिल करते हैं।

 

जापान में किस तरह चुनाव होता है? भारत से कितना अलग है? क्या प्रचार का तरीका भी अलग है?
पुराणिक :
यहां पुलिस और चुनाव अधिकारी काफी दक्षता से सभी उम्मीदवारों पर नजर रखते हैं। कुछ भी गलत हो तो आपको फोन आ जाता है कि आप ये गलत कर रहे हैं। इसे रोकिए। एक ही गलती के लिए दो बार वॉर्निंग आ जाए तो आपकी छवि खराब हो जाती है। तीसरी वॉर्निंग के बाद आपको चुनाव से बेदखल कर दिया जाता है। पैसों का हिसाब भी बड़ी बारीकी से रखा जाता है। यहां नेतागिरी एक नौकरी की तरह है। यहां नेता भगवान नहीं है। प्रचार का तरीका भी भारत से काफी अलग है। जनादेश को कागज पर छापकर बांटा जाता है। रेलवे स्टेशन पर सुबह 5 से 9 बजे तक नेता खुद बांटते हैं। फिर दिनभर स्पीकर लगी वैन से अनाउंस करते घूमते हैं। जहां भी थोड़ी भीड़ मिलती है, वहीं खड़े होकर 5-10 मिनट का भाषण भी दे देते हैं।

 

एक भारतीय नागरिक होने के नाते जापान में चुनाव लड़ना कितना मुश्किल है?
पुराणिक :
बहुत ही मुश्किल है, क्योंकि सिर्फ वही लोग वोट दे सकते हैं, जिनके पास जापान की नागरिकता है। जापान की नागरिकता रखने वाले भारतीय ज्यादा नहीं हैं। मैंने 15 साल से इदोगावा में जो सामाजिक कार्य किए और जिस तरह से लोगों से जुड़ा, सिर्फ उसी के भरोसे इस चुनाव में उतरने की हिम्मत की। जीत या हार, इस मुद्दे को एकतरफ रखकर चुनाव में उतरना ज्यादा जरूरी था। मेरा चुनावी मुद्दा बहुत ही प्रैक्टिकल रहा। मेरे भाषण भी पूरी तरह से पॉजिटिव रहे। 

 

भारतीय राजनीति की ऐसी बातें जो आपको पसंद और नापसंद हैं?

पुराणिक : कांग्रेस और भाजपा की लड़ाई में भारत का काफी नुकसान हुआ है। घर का भेदी लंका ढाए जैसी परिस्थिति है। राजनीतिक दलों के विचारों में अंतर होना जरूरी है, लेकिन जरूरी कामों को करने में कोई दोराय नहीं होनी चाहिए। देश को आगे ले जाना, कालाबाजारी खत्म करना, सरकारी कामों में पारदर्शिता लाना, इन चीजों में दोराय नहीं हो सकती है। भारतीय राजनीति में विचारवादी नेता कम है। युवाओं को राजनीति में आने की जरूरत है। भारतीय राजनीति में धार्मिक बातें और हेट स्पीच पर रोक लगाने की जरूरत है। सिर्फ विकास के मुद्दे पर बात होनी चाहिए। अगर कुछ गलत हो रहा है तो भाषण में बातें न करें, उसके लिए सीधे पुलिस या कोर्ट में जाएं।

 

आप पुणे से आते हैं तो आप भारत कभी आते हैं? परिवार का कोई सदस्य अभी यहां रहता है?
पुराणिक :
मेरी बहन और भाई पुणे में ही रहते हैं, जबकि मेरी मां मेरे साथ जापान में रहती हैं। बेटा अभी लंदन में पढ़ाई कर रहा है।

 

आप जापान में कब से रह रहे हैं? किस वजह से वहां गए थे?
पुराणिक :
मैं 1997 और 1999 में जापान सरकार की स्कॉलरशिप पर विद्यार्थी के तौर पर जापान आया था। फिर 2001 में मैंने यहां नौकरी शुरू की। तब से यहीं रह रहा हूं।

 

आप जैसे भारतीय अगर अन्य देशों की राजनीति में शामिल होते हैं तो उससे भारत को कितना फायदा?
पुराणिक :
मैं राजनीति को सिर्फ राजनीति की तरह नहीं देखना चाहता। मैंने 10 साल से ज्यादा बैंक और 10 साल से ज्यादा आईटी के क्षेत्र में काम किया है। मैं राजनीति और विकास के मुद्दे को एक प्रक्रिया के नजरिए से देखना चाहता हूं। इससे दो चीजें होंगी। पहला काम पर ध्यान रहेगा और दूसरा कटुता कम होगी। अगर इस तरह की राजनीति की जाए तो उससे देश को काफी फायदा होगा।

 

भारत में हो रहे आम चुनावों को लेकर क्या नजरिया है? आपके अनुमान के मुताबिक, यहां कौन जीत सकता है?
पुराणिक :
मोदीजी के कामों में बहुत-सी अड़चनें आई होंगी, ये हमारे समझ में आता है। वे बहुत कुछ कर सकते थे, लेकिन कर नहीं पाए। इससे लोगों में काफी निराशा है। लोग किस तरह वोट देंगे, ये देखना जरूरी है। मोदीजी को अगली पीढ़ी के नेताओं को आगे लाना होगा। वहीं, कांग्रेस को परिवार से हटकर किसी और नेता को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने के बारे में सोचना चाहिए। 

 

आप आगे टोक्यो के मेयर और फिर सांसद का चुनाव लड़ने की बात करते हैं, इसे कितना आसान देखते हैं?
पुराणिक :
मैं इदोगावा में पिछले 15 साल से काम कर रहा हूं। राष्ट्रीय राजनीति में जाने की इच्छा भी है। अगले 4 साल में मैं कितना काम कर पाता हूं, लोगों का कितना विश्वास जीत पाता हूं, उसी पर सब कुछ तय होगा। फिलहाल तो काम करने पर ध्यान देना है।

 

विदेशी मूल के लोगों को राजनीति में स्वीकार करने के बारे में जापानी लोगों में किस तरह की सोच है?
पुराणिक :
पहली बात यह है कि जापानी भाषा की दीवार बहुत बड़ी है। जब तक आप यहां की भाषा नहीं समझेंगे तब यहां राजनीति करना मुश्किल है। दूसरी बात, जापानी समाज उतना उदार नहीं है। ये लोग अपने लोगों के ही ज्यादा करीब रहते हैं। इस वजह से काफी जापानियों को साथ लेकर काम करना जरूरी है।

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