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अमेरिका से ग्राउंड रिपोर्ट-6:फ्लॉयड की मौत सामान्य नहीं थी, लेकिन हिंसक आंदोलन से हुए नुकसान को अनदेखा कैसे किया जाए

4 महीने पहलेलेखक: डेलावेयर से रेखा पटेल
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जॉर्ज फ्लॉयड का शव ह्यूस्टन में मंगलवार को दफनाया गया। इससे पहले यहां के फाउंटेन ऑफ प्राइज चर्च में ताबूत को छह घंटे के लिए रखा गया था।
  • अंतिम संस्कार में 60 हजार लोग शामिल और अब फ्लॉयड का स्टैच्यू भी बनाया जाएगा
  • सवाल यह है कि सात बार जेल जाने वाला फ्लॉयड क्या इस सम्मान के काबिल था?

मिनेपोलिस शहर में पिछले हफ्ते 46 साल के अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद अमेरिका के इतिहास के सबसे बड़े प्रदर्शन हुए। इस घटना से जनता में आक्रोश की सीमाएं टूट गईं। पूरे देश के 40 से भी अधिक शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए। मंगलवार को ह्यूस्टन में फ्लॉयड को दफनाया गया।

इन सबके बीच यह सवाल उठता है कि क्या फ्लॉयड वास्तव में इस सम्मान के काबिल था? जॉर्ज कई अपराध में शामिल होने के कारण 7 बार जेल जा चुका था। इसे नहीं भूलना चाहिए। हालांकि, उसकी मौत सामान्य नहीं थी, लेकिन यह भी सच है उसकी मौत के बाद हुए प्रदर्शनों में कई लोगों को नुकसान सहना पड़ा, इसे कैसे भुलाया जा सकता है। उसे हीरो बनाकर राजनीति की जा रही है।

मीडिया जैसा बता रहा, वैसी स्थिति नहीं
मीडिया जितना बता रहा है, यहां उतनी रंगभेद की स्थिति नहीं है। यदि ऐसा होता तो अफ्रीकन-अमेरिकन के साथ दूसरे देशों के लोग यहां प्रेम, सम्मान के साथ नौकरियों में ऊंचे पदों पर न बैठे होते। इस देश की कई होमलेस सुविधाओं का सबसे अधिक लाभ भी यही लोग उठा रहे हैं। फ्लॉयड की मौत के बाद हुए प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले कई युवा ऐसे हैं, जो ड्रग्स, चोरी जैसे अपराधों में शामिल हैं। आंदोलन में इनके शामिल होने से जनता को भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा।

जॉर्ज फ्लॉयड के शव को बग्घी से ह्यूस्टन के मेमोरियल गार्डेन कब्रगाह में दफनाने के लिए ले जाया गया। इस दौरान रास्ते पर बड़ी संख्या में भीड़ जुटी।
जॉर्ज फ्लॉयड के शव को बग्घी से ह्यूस्टन के मेमोरियल गार्डेन कब्रगाह में दफनाने के लिए ले जाया गया। इस दौरान रास्ते पर बड़ी संख्या में भीड़ जुटी।

अंतिम संस्कार में निकली रैलियां
फ्लॉयड के अंतिम संस्कार पर मिनेपोलिस, ह्यूस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स, फिलाडेल्फिया, अटलांटा और सिएटल में भी कई रैलियां निकाली गईं। रैली में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें ह्यूस्टन की रैली में 60 हजार लोग शामिल हुए। न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में ब्रिज बंद कर दिया गया। कुछ ऐसा ही नजारा अमेरिका के अन्य शहरों में भी दिखाई दिया।

यह फोटो अमेरिका के ह्यूस्टन शहर की है। यहां फ्लॉयड को दफनाने के लिए ले जाने के दौरान एक महिला ताबूत की फोटो खींचते हुए रो पड़ी।
यह फोटो अमेरिका के ह्यूस्टन शहर की है। यहां फ्लॉयड को दफनाने के लिए ले जाने के दौरान एक महिला ताबूत की फोटो खींचते हुए रो पड़ी।

8 मिनट 46 सेकंड का मौन रखा गया
ह्यूस्टन में फ्लॉयड को मंगलवार दोपहर दफनाया गया। इस दौरान 8 मिनट और 46 सेकंड का मौन धारण किया गया, क्योंकि इतनी ही देर पुलिस ने घुटने से फ्लॉयड की गर्दन दबाए रखी थी। दम घुटने से उसकी मौत हो गई थी। इसके साथ ही मिनेसोटा राज्य के मिनेपोलिस में फ्लॉयड का एक स्मारक भी बनाया जाएगा।

आंदोलन सामान्य जनता का आक्रोश
अफ्रीकन-अमेरिकन, श्वेत, लैटिन, एशियन और मूल अमेरिकन सभी फ्लॉयड की मौत के बाद शुरू हुए आंदोलन में शामिल हुए हैं। यह प्रदर्शन केवल एक अफ्रीकन-अमेरिकन की मौत के लिए नहीं हुए। सही मायने में यह आंदोलन अब तक दबे हुए आम आदमी का आक्रोश है। अमेरिका जैसे आजादी वाले देश में न्याय की गुहार लगाने की गुजारिश है।

कई लोग अपने आप को हमेशा से व्हाइट अमेरिकन से नीचा मानकर अपनी भावनाओं को दबाते रहे हैं। आखिर ऐसे समय में उनका आक्रोश इस तरह से बाहर आया और आंदोलन का हिस्सा बना। फ्लॉयड की मौत अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी नागरिक अशांति मानी गई है।

यह फोटो 9 जून 2020 की है। न्यूयॉर्क में एक प्रदर्शनकारी फ्लॉयड की फोटो के साथ प्रदर्शन कर रही है। फ्लायड को ह्यूस्टन में दफनाया गया है।
यह फोटो 9 जून 2020 की है। न्यूयॉर्क में एक प्रदर्शनकारी फ्लॉयड की फोटो के साथ प्रदर्शन कर रही है। फ्लायड को ह्यूस्टन में दफनाया गया है।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे आंदोलन
अमेरिका में पहले भी ऐसे आंदोलन हो चुके हैं। ऐसे आंदोलन इतिहास बनाते हैं। 1955 में एक अश्वेत महिला रोजा मोंटगोमेरी अल्बामा स्टेट में बस में श्वेतों की विशेष सीट पर बैठ गई थी। सीट खाली करने को कहा गया तो उन्होंने इनकार करते हुए विरोध कर दिया। रोजा पर केस दर्ज हुआ। उन्होंने इसके लिए लड़ाई लड़ी। आखिर 1956 में उन्हें अपना हक मिला। अमेरिकन सिविल राइट्स की लड़ाई में भी उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। अमेरिका की संसद ने उन्हें ‘मदर ऑफ फ्रीडम मूवमेंट ’ नाम दिया।
आखिर में 1960 में मार्टिन लूथर किंग की लड़ाई के बाद अश्वेतों को कई हक मिलने लगे। इसमें भी अमेरिकन सिविल राइट्स मूवमेंट की यह महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसके बाद वे राष्ट्रीय हीरो बन गए।

भारत में रंग नहीं, लेकिन जाति के आधार पर हुआ विभाजन
हमारे देश में भी एक ही तरह के रंग-रूप और बोली वाले लोगों के बीच ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र जैसे चार वर्ण हैं। सब इन्हीं में बंटे हुए हैं। इससे एक जैसे दिखने होने के बाद भी अलगाव का बीज रोपा गया। उन दिनों में अगर निचले तबके का कोई आदमी ऊंची जाति के लोगों के सामने से गुजरता, तो उसे अपने सिर पर चप्पल रखकर गुजरना पड़ता।

सवर्णों के अलावा अन्य लोगों को गांव के कुओं से पानी लेने की भी मनाही थी। इस जातीय भेदभाव ने हजारों साल से इंसान को इंसान से अलग करने में बड़ी भूमिका निभाई है। भारत में, किसी व्यक्ति के उपनाम से तय होता है कि वह किस समुदाय से है।

यह फोटो न्यूयॉर्क शहर की है। यहां प्रदर्शन के दौरान एक लड़की मेगाफोन से रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाती हुई।
यह फोटो न्यूयॉर्क शहर की है। यहां प्रदर्शन के दौरान एक लड़की मेगाफोन से रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाती हुई।

अमेरिका में कम हो रहा रंगभेद
अमेरिका में उपनामों के आधार पर लोगों में छोटे-बड़े जैसी कोई बात नहीं है। यहां पर रंग और किस देश के मूल निवासी हैं, इस आधार पर भेदभाव किया जाता रहा है। तमाम देशों से लाखों लोग अमेरिका आए हैं और यहां के निवासी बने हैं।

अंतर्विवाह के कारण यहां मिश्रित लोगों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई, जिसके चलते यहां रंगभेद कम हो रहा है। यहां रंगभेद नहीं, उनके व्यवहार के कारण भेदभाव किया जाता है। इसके अलावा अमेरिका का पहला और अंतिम नियम है कि चाहे कोई भी वजह हो इंसानियत को नहीं छोड़ा जाएगा।

(रेखा ने कई किताबें लिखी हैं। पिछले 20 सालों से वे कई मैगजीन और न्यूज पेपर से जुड़ी हुई हैं।)

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