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सबसे अलग है यह मंदिर:नेपाल का गुह्येश्वरी शक्तिपीठ; पशुपतिनाथ से पहले मां के दर्शन की परंपरा, माता की महामाया और शिव के कपाली रूप की पूजा

8 दिन पहलेलेखक: काठमांडू से भास्कर के लिए अभय राज जोशी
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मां गुह्येश्वरी मंदिर में प्रतिमा नहीं है, यह मंदिर तांत्रिक अनुष्ठानों का बड़ा केंद्र है। - Dainik Bhaskar
मां गुह्येश्वरी मंदिर में प्रतिमा नहीं है, यह मंदिर तांत्रिक अनुष्ठानों का बड़ा केंद्र है।

नेपाल में काठमांडू की पहचान मंदिरों के शहर के रूप में है। यहां का गुह्येश्वरी मंदिर सबसे अलग है। यह शक्तिपीठ पशुपतिनाथ मंदिर के पूर्व में बागमती नदी की दूसरी ओर है। यह स्थान मां सती और शिव की एकता का अद्भुत प्रतीक है। यहां पशुपतिनाथ से पूर्व मां गुह्येश्वरी के दर्शन करने की परंपरा है। इन दिनों बड़ी संख्या में भारत और नेपाल से हजारों भक्त पहुंचे हैं। खास बात है कि इस मंदिर में मां की कोई प्रतिमा नहीं है।

मंदिर के गर्भगृह में एक छिद्र है, जिसमें से जल की धारा बहती रहती है। इसे चांदी के कलश से ढंका गया है। इस मंदिर में सती और शिव दोनों की पूजा होती है। सती को महामाया और शिव को कपाली के रूप में पूजा जाता है। दिव्य आकृति के पास में ही भैरव कुंड है। भक्त इस कुंड में अपना हाथ डालते हैं और जो कुछ भी मिलता है, उसे परमात्मा के आशीर्वाद के तौर पर स्वीकार किया जाता है।

गुह्येश्वरी अपने तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए भी जाना जाता है। माना जाता है कि शक्ति पाने के इच्छुक यहां पूजा को आते हैं। मंदिर प्रबंधन समिति के अध्यक्ष सुमित खड़की बताते हैं, ‘भक्त मानते हैं कि मंदिर में विशेष शक्तियां हैं। देवी सती महा अष्टमी और नवमी पर पूजा करने वालों की कामना पूरी करती है। नवरात्र पर यहां पांच पशुओं की बली के साथ विशेष काल रात्रि पूजा होती है।’

खड़की बताते हैं कि बीते साल कोरोना के चलते सीमित श्रद्धालु ही दर्शन के लिए पहुंचे थे, लेकिन इस बार बड़ी संख्या में भक्त आ रहे हैं। मंदिर के पास के होटलों में भी भारतीय पर्यटकों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। बिहार के सीतामढ़ी के रहने वाले राम कुमार यादव यहां दर्शन के लिए हैं। वे कहते हैं कि हम यहां देवी को अपने बच्चों की कामना बताने आए हैं।

हम लंबे समय से यहां आना चाह रहे थे, लेकिन महामारी की वजह से सीमाएं बंद होने की वजह से दिक्कत आ रही थी। अब जब सीमा खुल गई है तो हमने यहां आने का फैसला किया। लिच्छवी काल के दौरान समृद्ध शिवालय शैली में यह मंदिर निर्मित है। मंदिर की वास्तुकला पैगोडा शैली में है। राजा प्रपात मल्ल द्वारा 1654 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया था।