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अमेरिका-चीन में टकराव की आशंका:ताइवान के मामले में अमेरिका-चीन के बीच युद्ध की आशंका , यह दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगा

5 दिन पहले
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चीन की बढ़ती फौजी ताकत के कारण ‘यथास्थिति’ के खत्म होने का खतरा बढ़ते ही जा रहा। - Dainik Bhaskar
चीन की बढ़ती फौजी ताकत के कारण ‘यथास्थिति’ के खत्म होने का खतरा बढ़ते ही जा रहा।
  • युद्ध होने पर इलेक्ट्रॉनिक्स व दुनियाभर की अन्य कई इंडस्ट्री बहुत अधिक प्रभावित होंगी

कई दशकों से ताइवान के मामले में अमेरिका और चीन के बीच तमाम विरोधाभासों के बावजूद शांत बनी हुई है। चीनी नेताओं का कहना है कि केवल एक ही चीन है जिस पर उनका शासन है। ताइवान तो उसका विद्रोही हिस्सा है। अमेरिका केवल एक चीन के विचार से सहमत तो है पर उसने बीते 70 साल यह सुनिश्चित करने में गुजार दिए कि दो चीन हैं।

अब इस सामरिक विरोधाभास के टूटने की आशंका है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है, चीन अपनी फौजी ताकत के बूते ताइवान पर कब्जा कर सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिका युद्ध में कूद सकता है। परमाणु हथियारों से लैस दो महाशक्तियों के बीच युद्ध से दुनिया की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा।

अमेरिका को भय है कि वह लंबे समय तक चीन को ताइवान पर कब्जे से नहीं रोक सकेगा। इंडो-पेसिफिक कमांड के प्रमुख एडमिरल फिल डेविडसन ने मार्च में अमेरिकी कांग्रेस को बताया कि चीन 2027 तक ताइवान पर हमला कर सकता है। युद्ध के विनाशकारी नतीजे होंगे। चीन से 160 किलोमीटर दूर स्थित ताइवान सेमीकंडक्टर का प्रमुख उत्पादक है।

ताइवानी कंपनी टीएसएमसी विश्व के 84% आधुनिक इलेक्ट्राॅनिक चिप्स बनाती है। टीएसएमसी में उत्पादन रूकने से ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री ठप हो जाएगी। आधुनिक चिप कारों से लेकर कई तरह के उद्योगों में काम आती है। कंपनी टेक्नोलॉजी के मामले में अपने प्रतिद्वंद्वियों से 10 साल आगे है। अमेरिका और चीन को उसकी बराबरी करने में कई वर्ष लगेंगे।

चीन और अमेरिका के बीच ताइवान पर लंबे समय से तनातनी चल रही है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार मानती है कि एकीकरण उसका कर्तव्य है, भले ही इसके लिए हमले का सहारा क्यों ना लेना पड़े। हालांकि, अमेरिका पर ताइवान की रक्षा के लिए किसी संधि की बाध्यता नहीं है पर चीन का हमला अमेरिका की सैनिक शक्ति और उसके कूटनीतिक, राजनीतिक संकल्प की परीक्षा होगी। अगर अमेरिका के सातवें बेड़े ने हस्तक्षेप नहीं किया तो चीन रातों-रात एशिया में प्रमुख ताकत बन जाएगा। दुनियाभर में अमेरिका के सहयोगी जान जाएंगे कि वे उस पर निर्भर नहीं रह सकते हैं।

परीक्षण मॉडल में अमेरिका हार जाता है
पिछले कुछ सालों में स्थिति में बदलाव हुआ है। चीन ने बीते पांच वर्षों में 90 बड़े लड़ाकू जहाज और पनडुब्बियां अपनी नौसेना में शामिल की हैं। यह पश्चिम पेसिफिक में अमेरिका से चार-पांच गुना अधिक है। चीन हर साल 100 अाधुनिक फाइटर प्लेन बनाता है। उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात किए हैं।

उसके पास ताइवान, अमेरिकी नौसेना के जहाजों और जापान, दक्षिण कोरिया, गुआम में अमेरिकी अड्डों पर सटीक प्रहार करने वाली मिसाइल हैं। ताइवान पर चीनी हमले के परीक्षण मॉडल में अमेरिका को हारते दिखाया गया है। कुछ अमेरिकी विश्लेषकों का निष्कर्ष है कि सैनिक श्रेष्ठता के कारण चीन देर-सवेर ताइवान के खिलाफ ताकत का इस्तेमाल करेगा। चीन हमेशा कहता रहा है कि अमेरिका ताइवान संकट को बने रहने देना चाहता है।

वह चीन का उदय रोकने के लिए युद्ध भी छेड़ सकता है। दूसरी ओर कई विशेषज्ञ मानते हैं, अमेरिका में चीन के प्रति आक्रामक रुख तो एकदम स्वाभाविक है। हालांकि, चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग ने देश की जनता को युद्ध जैसी स्थिति के लिए तैयार करना शुरू कर दिया है। फिर भी विशेषज्ञों का अनुमान है शी जिन पिंग इस समय जोखिम नहीं उठाएंगे। वे स्थिति और अधिक अनुकूल होने तक प्रतीक्षा करेंगे।

अमेरिका के प्रभुत्व को बड़ा आघात लग सकता है...
फौजी दबाव बढ़ाया

12 अप्रैल को 25 चीनी विमानों ने ताइवान की हवाई सीमा का अतिक्रमण किया। एक वरिष्ठ ताइवानी कूटनीतिज्ञ का कहना है, चीन सैनिक दबाव बढ़ाने और समाज को विभाजित करने की नीति पर चल रहा है।

  • हाल में अलास्का में चीनी विदेश मंत्रालय के उच्च अधिकारियों और अमेरिकी विदेश सचिव एंटोनी ब्लिंकेन की बातचीत में चीन के पुराने रुख में महत्वपूर्ण परिवर्तन सामने नहीं आया है।
  • चीन के हाथों ताइवान के पतन से एशिया और अन्य स्थानों में अमेरिका का प्रभुत्व खत्म हो जाएगा। - नील फर्ग्युसन,इतिहासकार
  • चीन को हमले और समझौते की बजाय अपनी सैनिक क्षमता के प्रदर्शन से ताइवान को हथियार डालने के लिए मजबूर कर देना चाहिए। - वांग जाईशी, चीनी कूटनीतिज्ञ
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