इंटरनेशनल कोर्ट का म्यांमार को आदेश- रोहिंग्या के नरसंहार और अत्याचार रोकने के लिए तुरंत कदम उठाएं

3 वर्ष पहले
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3 साल पहले म्यांमार सेना के अत्याचार के चलते लाखों रोहिंग्या देश छोड़कर बांग्लादेश सीमा पर आ गए। -फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
3 साल पहले म्यांमार सेना के अत्याचार के चलते लाखों रोहिंग्या देश छोड़कर बांग्लादेश सीमा पर आ गए। -फाइल फोटो
  • इंटरनेशनल कोर्ट के 17 जजों की पैनल ने म्यांमार सरकार को फैसला सुनाया, गांबिया के मुस्लिमों ने याचिका दायर की थी
  • कोर्ट में अगले 4 महीने में रोहिंग्या को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है
  • 2017 में मिलिट्री के अत्याचारों के चलते 7 लाख से ज्यादा रोहिंग्या देश छोड़कर बांग्लादेश सीमा के पास चले गए थे

एम्सटर्डम. इंटरनेशनल कोर्ट ने गुरुवार को म्यांमार को आदेश दिया कि रोहिंग्या मुसलमानों को नरसंहार और अत्याचार रोकने के लिए तुरंत कदम उठाएं। कोर्ट ने यह भी कहा कि रोहिंग्या पर किए अत्याचारों के सबूतों को सहेजा जाए। गांबिया के मुस्लिमों ने पिछले साल नवंबर में इंटरनेशनल कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें म्यांमार पर रोहिंग्या के नरसंहार का आरोप लगाया गया था। 


हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि आदेश गांबिया की याचिका पर दिया गया है। 17 जजों ने अपने फैसले में कहा कि म्यांमार सरकार को अपनी क्षमता के हिसाब से रोहिंग्या को अत्याचारों से बचाना चाहिए। इसकी रिपोर्ट 4 महीने में कोर्ट के समक्ष रखने के भी आदेश दिए हैं।

तीन साल पहले सेना ने जुल्म ढाए थे
2017 में म्यांमार सेना ने रोहिंग्या पर अत्याचार किए थे, जिसके चलते 7 लाख 30 हजार रोहिंग्या देश छोड़कर बांग्लादेश सीमा पर आ गए थे। ये लोग यहां कैंपों में रह रहे थे। जांचकर्ताओं ने कहा था कि सेना ने रोहिंग्याओं के नरसंहार के लिए अभियान चलाया था।


कोर्ट के रोहिंग्या मामले पर फैसला सुनाने से पहले फाइनेंशियल टाइम्स ने म्यांमार की सर्वोच्च नेता आंग सान सू की का आर्टिकल छापा। इसमें उन्होंने कहा कि रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ युद्ध अपराध हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने (रोहिंग्या) इसे बढ़ा-चढ़ाकर बताया। पिछले महीने इंटरनेशनल कोर्ट में सुनवाई के दौरान सू की ने जजों से केस को खारिच करने की भी मांग की थी।

सिविल ग्रुपों ने फैसले की तारीफ की
म्यांमार के 100 से ज्यादा सिविल सोसाइटी ग्रुपों ने कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर की है। अपने बयान में उन्होंने कहा कि म्यांमार के लोगों की धार्मिक और जातीय पहचान के आधार पर  राजनीतिक और सैन्य नीतियां हिंसक बल के साथ आरोपित की जाती हैं। ऐसा लगातार हो रहा है। साफ है कि म्यांमार के खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट का फैसला राजनीतिक और सैन्य ताकत का दुरुपयोग करने वाले लोगों के लिए है, न कि म्यांमार की जनता के लिए।