ईरान में मॉरैलिटी पुलिसिंग खत्म:2 महीने से चल रहे हिजाब विरोधी प्रदर्शनों के बाद फैसला; अब तक करीब 300 की मौत

तेहरान2 महीने पहले

ईरान में सरकार ने मॉरैलिटी पुलिसिंग खत्म करने का फैसला किया है। देश में 16 सितंबर को 22 साल की स्टूडेंट महसा अमिनी की पुलिस कस्टडी में मौत के बाद हिजाब विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार विरोधी प्रदर्शनों में अब तक 300 लोग मारे जा चुके हैं और हजारों को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया है।

मॉरल पुलिस उन लोगों और खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती है जो देश के इस्लामी कानून के हिसाब से कपड़े नहीं पहनते या किसी भी तौर पर शरिया कानून को तोड़ते हैं।

सरकार ने क्या कहा?

  • अटॉर्नी जनरल मोहम्मद जफर मोंताजेरी ने ईरानी न्यूज एजेंसी से कहा- मॉरैलिटी पुलिसिंग का ज्यूडिशियरी से कोई ताल्लुक नहीं है। इसलिए हम इसे खत्म कर रहे हैं। जफर राजधानी तेहरान की एक रिलीजियस कॉन्फ्रेंस में बोल रहे थे। यहां उनसे पूछा गया- इस पुलिसिंग पर कोई एक्शन क्यों नहीं लिया जाता।
  • स्थानीय भाषा में इस मॉरैलिटी पुलिस को ‘गश्त-ए-एरशाद’ कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे गाइडेंस पेट्रोलिंग कहा जाता है। 2006 में तब के राष्ट्रपति मोहम्मद अहमदीनेजाद ने इसकी शुरुआत की थी।
  • प्रेसिडेंट हसन रूहानी के दौर में लिबास को लेकर कुछ राहत दी गई थी। तब महिलाओं को ढीली जींस और कलरफुल हिजाब पहनने की मंजूरी दी गई थी। जुलाई में जब इब्राहिम रईसी राष्ट्रपति बने तो उन्होंने बहुत सख्ती से पुराना ही कानून लागू कर दिया।

कैसे शुरू हुआ आंदोलन?

  • 13 सितंबर को 22 साल की महसा अमिनी अपने परिवार से मिलने तेहरान आई थी। उसने हिजाब नहीं पहना था। पुलिस ने तुरंत महसा को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के 3 दिन बाद, यानी 16 सितंबर को उसकी मौत हो गई। इसके बाद मामला सुर्खियों में आया।
  • सरकार की मॉरल पुलिसिंग के खिलाफ युवाओं ने गरशाद नाम का मोबाइल ऐप बना लिया है। इस ऐप को अब तक करीब 20 लाख लोग डाउनलोड कर चुके हैं। युवा इसके जरिए सीक्रेट मैसेज चला रहे हैं। इसे देखते हुए तेहरान में मोबाइल इंटरनेट बंद है। हालांकि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार विरोधी प्रदर्शन कम नहीं हो रहे हैं।
  • ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमिनी गिरफ्तारी के कुछ घंटे बाद ही कोमा में चली गई थी। उसे अस्पताल ले जाया गया। परिवार का कहना है कि महसा को कोई बीमारी नहीं थी। उसकी हेल्थ बिल्कुल ठीक थी। हालांकि उसकी मौत सस्पीशियस (संदिग्ध) बताई जा रही है। रिपोर्ट्स में कहा गया- महसा के पुलिस स्टेशन पहुंचने और अस्पताल जाने के बीच क्या हुआ यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। ईरान में हो रहे ह्यूमन राइट्स वॉयलेशन पर नजर रखने वाले चैनल ने कहा कि अमिनी की मौत सिर पर चोट लगने से हुई।

हिजाब पहनने की अनिवार्यता 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद लागू हुई
ईरान में वैसे तो हिजाब को 1979 में मेंडेटरी किया गया था, लेकिन 15 अगस्त को प्रेसिडेंट इब्राहिम रईसी ने एक ऑर्डर पर साइन किए और इसे ड्रेस कोड के तौर पर सख्ती से लागू करने को कहा गया। 1979 से पहले शाह पहलवी के शासन में महिलाओं के कपड़ों के मामले में ईरान काफी आजाद ख्याल था।

  • 8 जनवरी 1936 को रजा शाह ने कश्फ-ए-हिजाब लागू किया। यानी अगर कोई महिला हिजाब पहनेगी तो पुलिस उसे उतार देगी।
  • 1941 में शाह रजा के बेटे मोहम्मद रजा ने शासन संभाला और कश्फ-ए-हिजाब पर रोक लगा दी। उन्होंने महिलाओं को अपनी पसंद की ड्रेस पहनने की अनुमति दी।
  • 1963 में मोहम्मद रजा शाह ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया और संसद के लिए महिलाएं भी चुनी जानें लगीं।
  • 1967 में ईरान के पर्सनल लॉ में भी सुधार किया गया जिसमें महिलाओं को बराबरी के हक मिले।
  • लड़कियों की शादी की उम्र 13 से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई। साथ ही अबॉर्शन को कानूनी अधिकार बनाया गया।
  • पढ़ाई में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया। 1970 के दशक तक ईरान की यूनिवर्सिटी में लड़कियों की हिस्सेदारी 30% थी।
  • 1979 में शाह रजा पहलवी को देश छोड़कर जाना पड़ा और ईरान इस्लामिक रिपब्लिक हो गया। शियाओं के धार्मिक नेता आयोतोल्लाह रुहोल्लाह खोमेनी को ईरान का सुप्रीम लीडर बना दिया गया। यहीं से ईरान दुनिया में शिया इस्लाम का गढ़ बन गया। खोमेनी ने महिलाओं के अधिकार काफी कम कर दिए।