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नॉलेज पैक:इजराइल-फिलीस्तीन नीति में बैलेंस बनाकर रखता है भारत; डिफेंस-एग्रीकल्चर में इजराइल की सख्त जरूरत, फिलीस्तीन से भावनात्मक लगाव

19 दिन पहलेलेखक: त्रिदेव शर्मा

There is no Free Luch in Diplomacy... या विदेश नीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। फॉरेन पॉलिसी के बहस मुबाहिसों में अकसर ये बातें सुनने मिल जाती हैं। बहुत आसान शब्दों में इन बातों को समझने के लिए अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर का एक बयान काफी है। उन्होंने कहा था- कामयाब फॉरेन पॉलिसी वही है, जिसमें आप अपने देश का हित देखते हैं। कई बार दोस्त भी बदलने पड़ते हैं और नीतियां भी।

हाल ही में इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष 11 दिन चला। फिर सीजफायर हो गया। बाद में मामला UN ह्यूमन राइट्स काउंसिल पहुंचा। यहां ये तय हुआ कि मामले की जांच ‘वॉर क्राइम’ यानी युद्ध अपराध के तौर पर होगी। फैसले के पहले वोटिंग हुई। प्रस्ताव के पक्ष में 24 और विरोध में 9 वोट पड़े। भारत समेत 14 देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। सवाल यहीं से उठना शुरू हुए। भारत वोटिंग से दूर क्यों रहा? क्या वह इजराइल और उसके दोस्त अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता? या फिर भारत ने फिलीस्तीन का साथ छोड़ दिया है? अब आप ऊपर की लाइनों में दिए हेनरी किसिंजर के बयान को फिर पढ़ सकते हैं, तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाएगी। यहां हम भारत की दुविधा या रणनीति को समझने की कोशिश करते हैं। आखिर क्यों हम इजराइल या फिलीस्तीन में से किसी एक के साथ खड़े नहीं हो पाते। तो चलिए जानते हैं.....

सबसे पहले ये समझिए
1948 में फिलीस्तीन को तोड़कर ही इजराइल बना। कुल जमीन का 44% हिस्सा इजराइल और 48% फिलीस्तीन के हिस्से आया। 8% जमीन का टुकड़ा हासिल करके यरूशलम UN की निगेहबानी में आ गया। इजराइल ने ताकत के दम पर फिलीस्तीन की 36% जमीन हथिया ली। आज फिलीस्तीन के पास महज 12% जमीन है और उसमें भी दो टुकड़े हैं- वेस्ट बैंक और गाजा पट्टी। वेस्ट बैंक शांत है और यहां फिलीस्तीनी सरकार का शासन है। गाजा पट्टी पिछले दिनों की तरह अकसर इजराइल के खिलाफ गुस्से से धधक उठती है, यहां हमास का कब्जा है। इसे इजराइल और पश्चिमी देश आतंकी संगठन बताते हैं। भारत ने कभी हमास की हरकतों का समर्थन नहीं किया, लेकिन वो फिलीस्तीनी सरकार के साथ है।

फिलीस्तीन से शुरू करते हैं...
1974 में भारत ने फिलीस्तीन लिबरेशन आर्मी (PLO) को फिलीस्तीनों लोगों का ऑफिशियल ऑर्गनाइजेशन माना और इसे मान्यता दी। यहां ये भी जान लीजिए कि PLO को मान्यता देने वाला भारत पहला गैर अरब देश था। 1969 से 2004 तक यासिर अराफात इसके चेयरमैन रहे। भारत से उनके बहुत दोस्ताना रिश्ते थे और इंदिरा गांधी उन्हें अपना भाई मानती थीं। बाद में यह संगठन यानी PLO बिखरता चला गया। इसकी ताकत कम होती चली गई। यहीं से हमास की नींव पड़ी और 1987 से यह ऑफिशियली खुद को फिलीस्तीनियों की आवाज बताने लगा।

भारत का असमंजस
सही मायनों में भारत का असमंजस यहीं से शुरू हुआ। PLO होते हुए भी रहा नहीं और फिलीस्तीन सरकार हमास के सामने कमजोर थी। फिलीस्तीन सरकार बातचीत से मसला सुलझाना चाहती थी, और हमास खून का बदला खून से लेना चाहता था। हमास के सामने तो आज भी फिलीस्तीनी सरकार घुटने टेके बैठी है। लेकिन, है तो वो भी फिलीस्तीन का हिस्सा। लिहाजा, भारत को ऐसा रास्ता खोजना था, जिससे फिलीस्तीनियों को उनका हक भी मिल जाए और हमास का समर्थन भी न करना पड़े। आज भारत की फिलीस्तीन को लेकर जो नीति है, उसका सार भी यही है। कहते हैं- डिप्लोमैसी में जितना कहा नहीं जाता, उससे ज्यादा समझा जाता है।

भारत की इजराइल-फिलीस्तीन पॉलिसी सही है या नहीं?
फॉरेन और डिफेंस पॉलिसी एक्सपर्ट, हर्ष पंत कहते हैं- वक्त और हालात के हिसाब से फॉरेन पॉलिसी में चेंज जरूरी हो जाते हैं। पहले हम फिलीस्तीन को लेकर ज्यादा वोकल रहते थे और इजराइल को नजरअंदाज कर देते थे। हालांकि, तब भी बैकचैनल एंगेजमेंट रहता था। नरसिम्हा राव सरकार के दौर से भारत की इजराइल नीति में बदलाव देखने मिला। हमें हर दौर में इजराइल से डिफेंस और इंटेलिजेंस मामलों में सपोर्ट मिला है।

फिलीस्तीन : बैलेंसिंग एक्ट ऑफ इंडियन डिप्लोमैसी
1988 में भारत ने फिलीस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी। 1996 में गाजा में अपना ऑफिस भी खोला, लेकिन हमास की हरकतें देखकर 2003 में इसे फिलीस्तीन सरकार के एडमिनिस्ट्रेटिव सर्कल में आने वाले रामल्ला में शिफ्ट कर दिया। आज भी ये वहीं है। 2011 में जब फिलीस्तीन को यूनेस्को का मेंबर बनाने की मांग उठी तो भारत ने इसका समर्थन किया। 2015 में फिलीस्तीन का नेशनल फ्लैग UN में लगा, तब भी भारत मजबूती से उसके साथ खड़ा था। 2018 में नरेंद्र मोदी फिलीस्तीन की ऑफिशियल विजिट करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।

इस मुद्दे पर भारत सरकार कितना अलर्ट रहती है, इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि 2017 में जब मोदी इजराइल की यात्रा करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने तो वे चंद किलोमीटर दूर फिलीस्तीन नहीं गए थे। इसके अगले साल उन्होंने अलग से फिलीस्तीन का दौरा किया। इसे ‘बैलेंसिंग एक्ट ऑफ इंडियन डिप्लोमैसी’कहा गया।

2018 में जब इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत आए तो वे यहूदी बालक मोशे से भी मिले। 26/11 के मुंबई हमलों में मोशे के माता-पिता आतंकवादियों के हाथों मारे गए थे।
2018 में जब इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत आए तो वे यहूदी बालक मोशे से भी मिले। 26/11 के मुंबई हमलों में मोशे के माता-पिता आतंकवादियों के हाथों मारे गए थे।

अब इजराइल पर आ जाइए...
1948 में इजराइल अलग देश बना। तकरीबन ढाई साल भारत ने इसे अलग देश के तौर पर मान्यता दे दी। आगे की कहानी को आप कूटनीतिक मजबूरी, संभलकर चलने की रणनीति या डिप्लोमैसी....कोई भी नाम दे सकते हैं। दरअसल, हुआ ये कि इजराइल ने 1951 में ही मुंबई में अपनी एम्बेसी शुरू कर दी। कहा जाता है कि भारत भी एक साल बाद यानी 1952 में अपनी एम्बेसी इजराइल में खोलना चाहता था, लेकिन ये मुमकिन नहीं हो सका। जरा सोचिए कि ये काम भारत की तब की सरकारों को कितना मुश्किल लगा होगा, क्योंकि भारत ने इजराइल में अपनी एम्बेसी 40 साल बाद यानी 1992 में शुरू की।

क्या 1965 और 1971 की जंग में इजराइल ने भारत का साथ दिया था?
पंत कहते हैं- हां बिल्कुल। दरअसल, लंबे वक्त तक भारत इजराइल को लेकर इसलिए पशोपेश में रहा, क्योंकि उसे लगता था कि इजराइल से नजदीकियों की वजह से देश के मुसलमान और अरब देश नाराज हो सकते हैं। हालांकि, तब भी हमारे और अरब देशों के बीच रिश्ते थे, लेकिन एक दीवार भी थी। कोल्ड वॉर के बाद नरसिम्हा राव इजराइल पर आगे बढ़े। एक सोच बनी कि अगर अरब देश इजराइल से डिप्लोमैटिक रिलेशन रख सकते हैं तो भारत पीछे क्यों रहे? हालांकि, हमारे लिए फिलीस्तीन और इजराइल दोनों महत्वपूर्ण हैं।

पंत के मुताबिक- भारत और इजराइल इसलिए भी करीब आए, क्योंकि दोनों ही आतंकवाद का सामना कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी इसमें बदलाव आए। इजराइल की यात्रा करने वाले वो भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। वो फिलीस्तीन भी गए। इसके पहले हमारे पॉलिसी-मेकर इजराइल के मुद्दे पर झिझकते थे। अब भारत और अरब देशों के रिश्तों में भी बड़ा बदलाव आया है। पाकिस्तान की उनसे सांठगांठ टूट चुकी है। भारत ने जब आर्टिकल 370 हटाया तो कोई अरब देश पाकिस्तान के साथ खड़ा नहीं हुआ।

2017 में प्रधानमंत्री मोदी जब इजराइल यात्रा पर गए तो उन्हें रिसीव करने खुद नेतन्याहू एयरपोर्ट पहुंचे थे। इस दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए।
2017 में प्रधानमंत्री मोदी जब इजराइल यात्रा पर गए तो उन्हें रिसीव करने खुद नेतन्याहू एयरपोर्ट पहुंचे थे। इस दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत हुए।

हमें इजराइल की कितनी जरूरत
इजराइल टेक्नोलॉजी के मामले में दुनिया की टॉप 5 लिस्ट में शामिल है। अमेरिका और रूस जैसे देश उसके मुरीद हैं। डिफेंस और एग्रीकल्चर सेक्टर में तो इजराइल के दुश्मन भी उसका लोहा मानते हैं। इजराइली ड्रोन और तोपें दुनिया में सबसे खतरनाक माने जाते हैं। अब ये भारत को मिल रहे हैं। एग्रीकल्चर रिसर्च और प्रोडक्शन में इजराइल भारत की काफी सहायता कर रहा है। उसके इरीगेशन सिस्टम को तो बेजोड़ कहा जाता है, 90% वॉटर री-साइकिलिंग होती है।

इस समस्या का हल क्या है
हर्ष पंत कहते हैं- फिलहाल तो, इजराइल-फिलीस्तीन विवाद का फिलहाल कोई हल दिखाई नहीं देता। इजराइल में भी हार्डलाइन सेंटीमेंट्स बढ़ रहे हैं। फिलीस्तीन भी नाराज है। वहां PLO कमजोर और हमास ताकतवर हो रहा है, यानी वो भी डिवाइडेड हैं। हालिया जंग भी इजराइल और हमास के बीच हुई। हमास कुछ करेगा तो इजराइल इससे भी ज्यादा ताकतवर जवाब देगा। अमेरिका और दूसरे बड़े देशों के सामने पहले ही कोविड-19 और चीन जैसे चैलेंज हैं। लिहाजा, वो इस मामले में ज्यादा नहीं पड़ने वाले। अरब को भी इजराइल की जरूरत है।

तो क्या कहानी यही रहेगी
जाहिर सी बात है, भारत अपने हित देख रहा है और इजराइल अपने। दोनों में से कोई देश इन रिश्तों को लेकर नुकसान भी नहीं उठाता। रही बात इजराइल-फिलीस्तीन रिश्तों की। बहुत साफ है कि इजराइल और भारत दोनों लोकतांत्रिक देश हैं, और वे एक-दूसरे की कूटनीतिक लक्ष्मण रेखा समझते हैं। और भारत ही क्यों? अरब देशों ने भी रस्मअदायगी के बयानों के अलावा और कुछ नहीं किया। पाकिस्तान और तुर्की जरूर उछलते रहे। यही वजह है कि हालिया इजराइल-फिलीस्तीन तनाव में भारत ने भी शुरूआती 9 दिन तक तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। 12वें दिन UN में कहा- विवाद का हल बातचीत और आम सहमति से निकाला जाना चाहिए। हम दो राष्ट्र सिद्धांत (इजराइल और फिलीस्तीन) का समर्थन करते हैं। यानी राष्ट्रहित सर्वोपरि। देश का हित सबसे पहले है।