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तालिबान का सामना कर चुकीं महिलाओं की कहानी:केरल की धान्या 5 साल हिंदू पहचान छुपाकर बुर्के में पति के साथ काबुल में रहीं, अब लौटने की उम्मीदें खत्म

वायनाड2 महीने पहलेलेखक: केए शाजी
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धान्या रवींद्रन - Dainik Bhaskar
धान्या रवींद्रन

कोलकाता निवासी सुष्मिता बंदोपाध्याय और केरल की धान्या रवींद्रन कभी न मिलीं, पर दोनों में कई चीजें समान थीं। दोनों ने अफगान नागरिकों से शादी की। ये ऐसी भारतीय थीं, जिन्होंने 1996 में बरहानुदीन रब्बानी की सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद अफगानिस्तान में तालिबान के दौर में भी रहने की हिम्मत की। सुष्मिता ने इस्लाम अपना लिया। फिर महिलाओं की स्थिति पर मुखर होने से वैश्विक हस्ती बन गईं।

बाद में कोलकाता भाग आईं, जहां उनकी आत्मकथा काबुलीवालार बंगाली बौ (एक काबुलीवाला की बंगाली पत्नी) प्रकाशित हुई। इस पर हिंदी फिल्म एस्केप फ्रॉम तालिबान भी बनी। बाद में सुष्मिता अफगानिस्तान लौट गई। 2013 में तालिबानी आतंकी उनके घर पहुंच गए। उन्होंने सुष्मिता, उनके पति और परिवार के अन्य सदस्यों की हत्या कर दी।

दूसरी ओर, केरल के वायनाड की रहने वाली धान्या ने रोम से फोन पर बताया, ‘मेरे पिता वाम विचारधारा से प्रेरित थे। वे चाहते थे कि मैं सोवियत संघ में इंजीनियरिंग पढ़ूं। इसलिए मुझे लेनिनग्रेड के सिविल एंड आर्किटेक्चरल इंस्टीट्यूट में दाखिला दिला दिया। मैं वहां गई। वहीं अफगानिस्तान के सिविल-आर्किटेक्ट इंजीनियर हुमायूं खोरम से मेरी मुलाकात हुई। पढ़ाई से पहले ही सोवियत संघ टूट गया। तब रूस बना और लेनिनग्रेड सैंट पीटर्सबर्ग बन गया। खोरम से मुझे प्रेम था। इसलिए हम भारत आ गए। उनसे मेरी शादी वायनाड में हिंदू परंपराओं के साथ हुई थी। एक साल बाद दिसंबर 1996 में काबुल पर तालिबान का कब्जा हो गया। तब मैं पोझुथाना में रह रही थी।

परिजन ने मुझे वहां जाने से रोका , पर खोरम नहीं माने। वह रूस से होते हुए काबुल पहुंच गए। जनवरी में मैं भी खोरम के साथ रहने के लिए अमृतसर से होते हुए काबुल पहुंच गई। काबुल पहुंचकर फ्लाइट क्रू ने कहा कि विमान से उतरने से पहले अपना चेहरा बड़े शॉल से ढंक लो।

जब मैंने काबुल में कदम रखा तो बड़ी दाढ़ी वाले लोग गन लेकर खड़े थे। मैं भाग्यशाली थी कि उन्होंने मेरी पासपोर्ट समेत कोई जांच नहीं की। खोरम से मिलने के बाद मैंने समझदारी से काम लिया और अपनी हिंदू पहचान गुप्त रखी। बुर्का पहनकर नकली मरियम नाम से दो बच्चों की अंग्रेजी और गणित की पढ़ाई जारी रखी। 2002 में हमने काबुल छोड़ा।’

49 साल की धान्या आज यूएन के खाघ कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिकारी के रूप में रोम में काम कर रही हैं। उन्हें उम्मीद थी कि वह रिटायर होने के बाद अफगानिस्तान लौटेंगी, लेकिन सब धूमिल हो गया। पति खोरम, विदेशी नागरिकता कार्ड धारक होने से वायनाड स्थित ससुराल पहुंच गए। वहां वह टूरिज्म से जुड़े कारोबार में हैं।

खोरम ने कहा, ‘मुझे यकीन था कि तालिबान लौटेगा, इसलिए मैंने वहां से निकलने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि मां दो साल पहले गुजर चुकी हैं। पिता व 5 भाई काबुल में जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उम्मीद है कि वे सब जिंदा होंगे।

यूएन सहायता समूहों को सुरक्षा देने के लिए तैयार तालिबान
संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता समूहों को तालिबान सुरक्षा देने को तैयार हो गया है। अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ने के बाद ये वादा यूएन के प्रतिनिधि से तालिबान ने किया है। इस आश्वासन पर संयुक्त राष्ट्र ने भी अफगानिस्तान में मदद करने को लेकर प्रतिबद्धता दोहराई है। अफगानिस्तान के मानवीय मुद्दों पर यूएन में 13 सितंबर कोउच्चस्तरीय बैठक का भी होगी।

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