रिपोर्ट / 2040 तक 60% मीट जानवरों से नहीं बल्कि पौधों से तैयार उत्पादों से मिलेगा, स्वाद नॉन-वेज जैसा ही होगा



प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  • परंपरागत मांस उद्योग से पर्यावरण पर बुरा प्रभाव, कार्बन उत्सर्जन में भी बढ़ोतरी
  • 2040 तक 35% मीट कल्चर्ड (कृत्रिम) जबकि 25% पेड़-पौधों से तैयार मीट होगा

Dainik Bhaskar

Jun 15, 2019, 10:20 AM IST

वॉशिंगटन. 2040 तक मीट जानवरों से नहीं मिलेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार, 60% मीट पेड़-पौधे से तैयार उत्पादों से मिलेगा। इसका स्वाद भी बिल्कुल मीट की तरह ही होगा। ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म एटी केर्नी की यह रिपोर्ट विशेषज्ञों की बातचीत पर आधारित है।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, 2040 तक 35% मीट कल्चर्ड (कृत्रिम) जबकि 25% पेड़-पौधों से तैयार मीट होगा। हालांकि, मांस की तुलना में यह ज्यादा पौष्टिक होगा। कल्चर्ड और पेड़-पौधों से तैयार मीट में परंपरागत मांस की तुलना में ज्यादा कैलोरी होती है।

 

परंपरागत मीट की तरह ही सारी खूबियां मिलेंगी

रिपोर्ट में कहा गया है कि पेड़-पौधों से तैयार मीट और कल्चर्ड मीट में भी वे सारी खूबियां होंगी जो परंपरागत मीट में होती है। कल्चर्ड मीट जानवरों को बिना नुकसान पहुंचाए उनकी कोशिकाओं से तैयार किया जाता है।परंपरागत मांस उद्योग के लिए लाखों जानवरों को पाला जाता है। इस उद्योग का टर्नओवर अरबों रुपए है।  वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि मांस उद्योग से पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसकी वजह से कार्बन उत्सर्जन में भी बढ़ोतरी होती है।

 

परंपरागत मांस उद्योग से जलवायु संकट बढ़ रहा

पशु आहार की खेती के लिए जंगलों को भी काटा जा रहा है। इससे जलवायु संकट बढ़ रहा है। नदियां और महासागर प्रदूषित हो रहे हैं। इसकी वजह से भी कंपनियां अब पेड़-पौधों पर आधारित मीट उत्पाद तैयार करने पर ध्यान देने लगी हैं। एटी केर्नी का अनुमान है कि इस तरह के शाकाहारी उत्पादों में एक बिलियन डॉलर का निवेश किया गया है। इसमें पारंपरिक मीट मार्केट पर हावी कंपनियां भी शामिल हैं। कई कंपनियां जानवरों को बिना मारे या नुकसान पहुंचाए उनके कोशिकाओं से मांस तैयार करने में जुटी हैं।

 

काफी लोग अब शाकाहारी जीवनशैली अपना रहे

एटी केर्नी के एक सहयोगी केरन गेरहार्ट ने कहा कि बहुत सारे लोग अब शाकाहारी जीवनशैली अपना रहे हैं। लोग पर्यावरण और पशु कल्याण के प्रति अधिक सचेत हो रहे हैं। ज्यादा मांस खाने वाले लोगों को भी कल्चर्ड मीट में उसी प्रकार की डाइट मिलेगी, जैसे परंपरागत मीट में मिलती है। इसमें न पर्यावरण को कोई नुकसान होगा, न ही जानवर मारे जाएंगे।

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