सरकार बचाने के लिए ओली का आखिरी पैंतरा:सिटीजनशिप अध्यादेश से पर्दा हटाया; मां नेपाली और पिता का पता नहीं, नेपाल में रहने वाले ऐसे बच्चों को मिलेगी नागरिकता

एक वर्ष पहलेलेखक: काठमांडू से भास्कर के लिए अभय राज शर्मा
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नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी ओली - Dainik Bhaskar
नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी ओली

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी के संसद भंग करने के फैसले के विरोध में विपक्षी पार्टियां सोमवार को सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। इन्होंने शेर बहादुर देउबा को नया प्रधानमंत्री बनाने की मांग की है। उनके समर्थन में 146 सांसदों का दस्तखत किया पत्र भी सौंपा। खास बात यह है कि इसमें ओली की पार्टी के 23 सांसदों ने भी दस्तखत किए हैं।

इसके अलावा नेपाली कांग्रेस के 61, प्रचंड की माओवादी पार्टी के 49, जनता समाजवादी पार्टी के 12 और एक निर्दलीय सदस्य हैं। 271 सीट वाली संसद में सरकार बनाने के लिए 136 सदस्यों का समर्थन चाहिए। इस बीच, प्रधानमंत्री बने रहने के लिए ओली ने अपनी तरकश से आखिरी तीर भी चला दिया है। उन्होंने संसद भंग करने से पहले लाए गए सिटीजनशिप अध्यादेश से पर्दा हटा दिया है।

यह अध्यादेश नेपाल में जन्मसिद्ध नागरिकता लेने वाले लोगों के बच्चों को भी नागरिकता देता है। इसका सीधा फायदा दक्षिणी हिस्से में रहने वाले मधेसी और नागरिकता से वंचित अन्य समुदायों को मिलेगा। दरअसल, ये समुदाय लंबे वक्त तक नागरिकता से वंचित रहे हैं। 2008 से दो साल तक नागरिकता देने का अभियान चलाया था।

इस दौरान नेपाल में अपनी पैदाइश साबित करने वाले लोगों को नागरिकता दी गई थी, लेकिन ऐसे लोगों को 16 साल से कम उम्र के बच्चों को नागरिकता से वंचित रखा गया था। 2015 में बने संविधान में कहा गया था कि जन्मसिद्ध नागरिकता हासिल करने वाले लोगों के बच्चों को भी नागरिकता मिलेगी, लेकिन इसको लेकर कोई संघीय कानून नहीं होने की वजह से अड़चन आ रही थी। साथ ही, उन विदेशियों से शादी करने वाली नेपाली महिलाओं के बच्चों को भी नागरिकता देगा, जिनके पिता का अता-पता नहीं है और वे नेपाल में रह रहे हैं।

दो साल से अटका था अध्यादेश

यह अध्यादेश पार्टियों में मतभेदों के चलते दो साल से अटका था। प्रदेश-2 के सरकारी अटॉर्नी दीपेंद्र झा ने टि्वटर पर लिखा कि अब तक 1,26,790 लोगों ने जन्मसिद्ध नागरिकता हासिल की है। वहीं, जनता समाजवादी पार्टी के नेता लक्ष्मण लाल कर्ण कहते हैं कि मधेश में 5 लाख लोग हैं, जिन्हें अब तक नागरिकता नहीं मिली है। यह अध्यादेश नागरिकता की समस्या का पूरी तरह से निराकरण नहीं करता है। नेपाल की 2.86 करोड़ आबादी में 19% अबादी मधेशी हैं। इनमें से 2.5% लोगों के पास नागरिकता नहीं है।

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