स्पेस / नासा ने कहा- आईएसएस के सभी टॉयलेट खराब, अंतरिक्ष यात्री डायपर का इस्तेमाल करने को मजबूर

अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के अंदर मौजूद अंतरिक्ष यात्री। (फाइल फोटो) अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के अंदर मौजूद अंतरिक्ष यात्री। (फाइल फोटो)
पृथ्वी की आंतरिक कक्षा में स्थापित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन। (फाइल फोटो) पृथ्वी की आंतरिक कक्षा में स्थापित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन। (फाइल फोटो)
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अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के अंदर मौजूद अंतरिक्ष यात्री। (फाइल फोटो)अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के अंदर मौजूद अंतरिक्ष यात्री। (फाइल फोटो)
पृथ्वी की आंतरिक कक्षा में स्थापित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन। (फाइल फोटो)पृथ्वी की आंतरिक कक्षा में स्थापित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन। (फाइल फोटो)

  • आईएसएस में दो टॉयलेट मौजूद, अमेरिकी और रूसी हिस्से में एक-एक टॉयलेट
  • अमेरिकी टॉयलेट में खराबी का सिग्नल और रूसी टॉयलेट पूरी क्षमता तक भर चुका

Dainik Bhaskar

Nov 27, 2019, 09:00 PM IST

मॉस्को. नासा ने बुधवार को कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (आईएसएस) का कोई शौचालय काम नहीं कर रहा है। इसके चलते अंतरिक्ष यात्रियों को डायपर का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। आईएसएस के कमांडर लूसा परमिटानो के मुताबिक, अमेरिकी हिस्से में लगा टॉयलेट लगातार खराबी का सिग्नल दे रहा है। रूसी हिस्से में लगा हुआ टॉयलेट पूरी क्षमता तक भर चुका है।

आईएसएस में रूस में बने हुए दो शौचालय फिट किए गए हैं। एक टॉयलेट अमेरिकी हिस्से में है, तो दूसरा रूसी हिस्से में लगाया गया है। इनके अलावा, अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़े सोयूज अंतरिक्ष यान में भी शौचालय हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल अंतरिक्ष यान की उड़ान के दौरान किया जाता है। स्थिर रहने की स्थिति में इनका इस्तेमाल कभी-कभार ही होता है।

इस समय अंतरिक्ष में 2 स्पेस स्टेशन सक्रिय
इस समय अंतरिक्ष में 2 स्‍पेस स्‍टेशन काम कर रहे हैं। इनमें से एक अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ, कनाडा और जापान के सहयोग से संचालित किया जाता है। इसे ही 'अंतरराष्‍ट्रीय स्‍पेस स्‍टेशन' (आईएसएस) कहा जाता है। दूसरा स्पेस स्टेशन चीन का है और इसका नाम 'तिआनगोंग-2' है। आईएसएस को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया गया है। यह स्टेशन लगातार पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है। इससे पहले रूस का अंतरिक्ष स्टेशन 'मीर' पृथ्वी की परिक्रमा करता था, लेकिन बढ़ते खर्च और सुरक्षा कारणों से इसे 2001 में दक्षिण प्रशान्त महासागर में गिरा दिया गया था।
 

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