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इकोनॉमिस्ट मॉडल का दावा:भारत में इस साल महामारी से दस लाख मौतों की आशंका; दुनिया में अब तक 1 करोड़ से ज्यादा मरे

7 महीने पहले
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इकोनॉमिस्ट ने 200 देशों से मिले डेटा से कोरोना से जनहानि का मॉडल तैयार किया। इसके मुताबिक भारत में प्रतिदिन चार हजार मौतों की सरकारी संख्या के उलट बीस हजार मौतों का अनुमान लगाया गया है। - Dainik Bhaskar
इकोनॉमिस्ट ने 200 देशों से मिले डेटा से कोरोना से जनहानि का मॉडल तैयार किया। इसके मुताबिक भारत में प्रतिदिन चार हजार मौतों की सरकारी संख्या के उलट बीस हजार मौतों का अनुमान लगाया गया है।

कोरोना वायरस से दुनियाभर में भयानक नुकसान हो रहा है। अगर गरीब देशों में वैक्सीन की पर्याप्त सप्लाई नहीं की गई तो भारत जैसे त्रासद दृश्य अन्य देशों में दोहराए जाने का खतरा है। इकोनॉमिस्ट के मॉडल का दावा है कि कोविड-19 से विश्व में अब तक 71 लाख से एक करोड़ 27 लाख के बीच मौतें हो चुकी हैं। इसके बीच की संख्या एक करोड़ है। मॉडल के अनुसार भारत में इस वर्ष दस लाख मौतें हो चुकी हैं।

इकोनॉमिस्ट ने 200 देशों से 121 संकेतकों पर मिले डेटा से मौतों का अनुमान लगाया है। ये संकेतक दर्ज हुई मौतें, आबादी की आयु, टेस्टिंग, पॉजिटिविटी दर, मृत्यु दर जैसे बिंदुओं से संबंधित हैं। उदाहरण के लिए रूस में सरकारी कोविड मृतक संख्या के मुकाबले अधिक मौतों का अनुपात 5.1 गुना है। कोविड-19 का सबसे खराब असर गरीबों पर पड़ा है। वैसे, कुछ अमीर देशों में मृृत्यु दर बहुत ऊंची है। लेकिन, 67 लाख मौतें जिनकी गिनती नहीं हुई है, वे अधिकतर गरीब और मध्यम आय के देशों में हैं। मॉडल बताता है, आबादी के अनुपात में मौतों की संख्या के मामले में पेरू में भारत से ढाई गुना ज्यादा मौतें हो रही हैं।

भारत में रोजाना छह से 31 हजार मौतों का दावा
2020 के दौरान 52 में से 33 सप्ताहों में रोज मौतें बढ़ती रहीं। मॉडल बताता है, भारत में सरकारी आंकड़े चार हजार के आसपास के मुकाबले प्रतिदिन छह हजार से 31 हजार के बीच अधिक मौतें हो रही हैं। बीच का आंकड़ा लगभग बीस हजार है। स्वतंत्र अनुमानों में यह संख्या आठ हजार से 32 हजार के बीच प्रतिदिन है। मॉडल के आधार पर लगता है कि भारत में इस साल अब तक कोविड-19 से लगभग दस लाख लोगों की मौत हो चुकी हैं।

दक्षिण अफ्रीका में भी मौतें ज्यादा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार दक्षिण अफ्रीका में पिछले साल 27 मार्च के बाद कोरोना वायरस से 55 हजार मौतें हुई है। हालांकि, यह संख्या वास्तविक मौतों से बहुत कम है। 8 मई तक देश में एक लाख 58 हजार 499 अतिरिक्त मौतें हो चुकी थीं। स्वास्थ्य अधिकारी कहते हैं, इनमें से 85-95% मौतें कोविड-19 वायरस से हुई हैं। इस विसंगति का कारण है कि मृतक की मृत्यु उस स्थिति में कोविड-19 से मानी जाती है जब उसका कोविड टेस्ट हो गया है। केवल दक्षिण अफ्रीका में ऐसा नहींं हो रहा है।

महामारी के बीच कई देशों में अधिक मौतों को कोविड-19 से मौत दर्ज नहीं किया गया है। अमेरिका में मार्च 2020 से अप्रैल 2021 के मध्य तक कोविड-19 से दर्ज सरकारी मौतों के मुकाबले अतिरिक्त मौतों की संख्या 7.1% अधिक है। मौतों के वैश्विक अनुमान सरकारी संख्या पर आधारित हैं। लोग जानते हैं कि निश्चित रूप से यह संख्या वास्तविक मौतों से बहुत कम है। इस समय विश्व में कोरोना से मौतों का अधिकृत आंकड़ा 33 लाख है।

मॉडल के दो अहम दावे

  • इकोनॉमिस्ट ने महामारी के दौरान अधिक मौतों के आंकड़े उन देशों से भी हासिल किए हैं जो अक्सर जानकारी नहीं देते हैं। अनुमान है कि दुनियाभर में अब तक 71 लाख से एक करोड़ 27 लाख मौतें वायरस से हो चुकी हैं। अगर दोनों संख्या के बीच का अनुमान देखें तो यह एक करोड़ दो लाख के आसपास है। इसके 95% सही होने का अंदाज है।
  • सरकारी आंकड़े तो वास्तविक संख्या के आधे से भी कम हैं बल्कि करीब 25% ही हैं। कोविड-19 से अधिकतर मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हुई हैं। वैसे, उनका कारण कोरोना नहीं बताया गया है। इकोनॉमिस्ट मॉडल के अनुसार अधिकतर अमीर देशों (ओईसीडी) में मृत्यु दर सरकारी संख्या से 1.17 गुना अधिक है। अफ्रीकी देशों में मृत्यु दर सरकारी संख्या से 14 गुना अधिक है।

सबसे अधिक मौतें एशिया में, युवाओं के बीच आसानी से फैला
मॉडल के अनुसार 10 मई तक इस बात की 95% संभावना थी कि एशिया में 24 लाख से 71 लाख के बीच अधिक मौतें हो चुकी हैं (कोविड-19 से अधिकृत मौतों की संख्या 6 लाख है।), लेटिन अमेरिका और कैरीबियाई देशों में 15 लाख से 18 लाख मौतें (अधिकृत 6 लाख), अफ्रीका में 21 लाख मौतें (अधिकृत 1 लाख), यूरोप में 15 लाख से 16 लाख (अधिकृत दस लाख) और अमेरिका, कनाडा में 6 लाख से 7 लाख (अधिकृत 6 लाख)। ओसेनिया (आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड) में मौतों की सरकारी संख्या केवल 1218 है।

एक अन्य तथ्य गौर करने लायक है। एशिया और अफ्रीका में प्रति दस लाख लोगों पर औसत अनुमानित मौतें यूरोप की तुलना में आधी हैं। ब्रिटेन के मुकाबले भारत की ऐसी ही स्थिति है। इसका कारण आबादी की आयु से जुड़ा है। सेरो सर्वे से पुष्टि हुई है कि भारत, अफगानिस्तान और कुछ अन्य देशों में यूरोप या अमेरिका की तुलना में युवाओं के बीच वायरस आसानी से फैल गया। इसका मतलब है कि वायरस को स्वरूप बदलने के ज्यादा अवसर मिल रहे हैं।