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लादेन के करीबी का इस्तकबाल:ओसामा का आर्म्स सप्लायर और राजदार अमीन उल हक अफगानिस्तान लौटा, 20 साल पाकिस्तान में गुजारे

काबुल/पेशावर9 महीने पहले

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद खूंखार आतंकियों की भी घर वापसी शुरू हो गई है। अल-कायदा के पूर्व सरगना ओसामा बिन लादेन का बेहद करीबी सहयोगी और आर्म्स सप्लायर अमीन उल हक 20 साल बाद अफगानिस्तान के नांगरहार प्रांत स्थित अपने घर लौट आया है। 9/11 हमले के फौरन बाद लादेन तोराबोरा की गुफाओं में छिप गया था। उस वक्त अमीन भी उसके साथ था। बाद में वो पाकिस्तान चला गया। हक एक लग्जरी कार में जब नांगरहार लौटा तो उसके समर्थकों ने उसका स्वागत किया और वो कार के अंदर से उनका अभिवादन स्वीकार करता रहा। अमीन के काफिले में कुछ तालिबानी आतंकी भी शामिल थे।

टाइमिंग अहम
अमीन अमेरिकी फौज के अफगानिस्तान छोड़ने के महज एक दिन पहले अफगानिस्तान लौटा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसके लौटने के बाद अल कायदा एक बार फिर ताकतवर बन सकता है। ब्रिटिश अखबार ‘द डेली मेल’ ने जब अमीन के अफगानिस्तान लौटने पर पेंटागन से सवाल किया तो उसके प्रवक्ता ने कहा- ये इंटेलिजेंस का मामला है। हम इस पर अभी कमेंट नहीं करेंगे।

वीडियो भी सामने आया
अमीन की घर वापसी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें वो एक व्हाइट लग्जरी कार में नजर आता है। समर्थकों की भीड़ के बीच कार का शीशा थोड़ा उतारता है और फिर हाथ हिलाता है। बाद में एक जुलूस की शक्ल में उसे घर पहुंचाया जाता है।

अमीन को लादेन और अल कायदा का सबसे बड़ा आर्म्स सप्लायर माना जाता था। 2008 में उसे पाकिस्तान में गिरफ्तार भी किया गया था। लादेन को मार गिराए जाने के करीब 6 महीने बाद उसे रिहा कर दिया गया। पाकिस्तानी जांच एजेंसियां अमीन के खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं कर पाईं। हक कई साल तक लादेन के साथ ही रहा था और उसकी सुरक्षा का जिम्मा संभालता था। माना जा रहा है कि 20 साल उसने पाकिस्तान में ही गुजारे। तोराबोरा की गुफाओं से वो लादेन के साथ ही भागा था।

सोवियत सेनाओं के खिलाफ भी जंग लड़ी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमीन ने अल कायदा में शामिल होने से पहले 1980 के दशक में सोवियत सेनाओं के खिलाफ भी जंग लड़ी। अमेरिका ने 2001 में जो ग्लोबल टेरेरिस्ट्स की लिस्ट जारी की थी, उसमें भी अमीन का नाम शामिल था। इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अल कायदा अगले 18 से 24 महीने में फिर मजबूत हो सकता है और यह दुनिया के लिए एक नया खतरा होगा। अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत आने के बाद आतंकी संगठन फिर एकजुट हो सकते हैं। वैसे भी एक तरफ जहां आईएसआईएस और तालिबान के बीच दुश्मनी है, वहीं अल कायदा और तालिबान के बीच अच्छे ताल्लुकात बताए जाते हैं।

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