FATF की ग्रे लिस्ट में ही रहेगा PAK:फाइनेंशियल टास्क फोर्स ने कहा- टेरर फाइनेंस पर सख्त कदम जरूरी, ऑन साइट वेरिफिकेशन करेंगे

बर्लिन7 महीने पहले

चार साल बाद भी पाकिस्तान फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स, यानी FATF की ग्रे लिस्ट से बाहर नहीं निकल सका। शुक्रवार देर रात FATF ने एक बयान में साफ कर दिया कि पाकिस्तान को टेरर फाइनेंस रोकने के लिए अब भी सख्त कदम उठाने की जरूरत है। संगठन के मुताबिक- हम ऑन साइट वेरिफिकेशन करेंगे ताकि टेरेरिज्म पर लगाम जमीनी स्तर पर भी नजर आए। पाकिस्तान ने 34 शर्तें पूरी की हैं, लेकिन हम इनको वेरिफाइ करेंगे।

इस फैसले के मायने क्या हैं
इस पाकिस्तान के लिए उम्मीद के तौर पर देखा जा सकता है। दरअसल, FATF ने कहा है कि वो ऑन साइट वेरिफिकेशन करेगा। इसके मायने ये हुए कि FATF टीम पाकिस्तान के बैंकिंग सेक्टर और टेरर फाइनेंसिंग के तमाम लूप होल्स की जांच करेगी। अगर जमीन पर सुधार नजर आया तो अगली मीटिंग में शायद पाकिस्तान को इस लिस्ट से निकाल दिया जाए। तब तक दिवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान को इंतजार करना होगा। ऑन साइट वेरिफिकेशन की कोई तारीख फिलहाल तय नहीं की गई है।

ग्रे लिस्ट वाले देशों को किसी भी इंटरनेशनल मॉनेटरी बॉडीज जैसे IMF, ADB और वर्ल्ड बैंक से कर्ज लेने के पहले बेहद सख्त शर्तों को पूरा करना पड़ता है। ज्यादातर संस्थाएं कर्ज देने में आनाकानी करती हैं। ट्रेड में भी दिक्कत होती है। एक्सपोर्ट में तमाम सख्त शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं।

उम्मीदें टूटीं
पाकिस्तान के तमाम एक्सपर्ट्स मानकर चल रहे थे कि इस बार उनके देश को ग्रे लिस्ट से बाहर कर दिया जाएगा। इसकी वजह यह थी कि पिछली बार पाकिस्तान सिर्फ एक शर्त पूरी करने से पीछे रह गया था। शहबाज शरीफ सरकार और इसके पहले इमरान खान ने ग्रे लिस्ट से बाहर आने के लिए तमाम कवायदें की थीं, लेकिन नतीजा उल्टा निकला।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि FATF की मीटिंग में बहुत सख्ती से इस बात पर गौर किया गया कि पाकिस्तान ने टेरर फाइनेंसिंग और बड़े आतंकियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की और इसके सबूत कहां हैं? अगर वो सबूत मुहैया नहीं कराता तो चार साल बाद भी उसका ग्रे लिस्ट में रहना तय है। मीटिंग 21 से 25 फरवरी तक चलेगी।

FATF की ग्रे और ब्लैक लिस्ट

ग्रे लिस्ट : इस लिस्ट में उन देशों को रखा जाता है, जिन पर टेरर फाइनेंसिंग और मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने या इनकी अनदेखी का शक होता है। इन देशों को कार्रवाई करने की सशर्त मोहलत दी जाती है। इसकी मॉनिटरिंग की जाती है। कुल मिलाकर आप इसे ‘वॉर्निंग विद मॉनिटरिंग’ कह सकते हैं।

नुकसान : ग्रे लिस्ट वाले देशों को किसी भी इंटरनेशनल मॉनेटरी बॉडी या देश से कर्ज लेने के पहले बेहद सख्त शर्तों को पूरा करना पड़ता है। ज्यादातर संस्थाएं कर्ज देने में आनाकानी करती हैं। ट्रेड में भी दिक्कत होती है।

ब्लैक लिस्ट : जब सबूतों से ये साबित हो जाता है कि किसी देश से टेरर फाइनेंसिंग और मनी लॉन्ड्रिंग हो रही है, और वो इन पर लगाम नहीं कस रहा तो उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाता है।

नुकसान : IMF, वर्ल्ड बैंक या कोई भी फाइनेंशियल बॉडी आर्थिक मदद नहीं देती। मल्टी नेशनल कंपनियां कारोबार समेट लेती हैं। रेटिंग एजेंसीज निगेटिव लिस्ट में डाल देती हैं। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था तबाही के कगार पर पहुंच जाती है।