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रूस-यूक्रेन तनाव में आगे क्या:प्रतिबंधों का असर क्या, हमला होने पर क्या होगा यूक्रेन का हाल और भारत-चीन क्या स्टैंड लेंगे?

मॉस्को/कीवएक वर्ष पहले

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने जैसे ही यूक्रेन में दो प्रांतों को आजाद घोषित कर अपनी सेनाएं भेजीं, पूरी दुनिया उनके खिलाफ खड़ी हो गई। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंधों की बारिश कर दी। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और ब्रिटेन ने पुतिन को करारा जवाब देने की बात कही है। केवल भारत और चीन का रुख अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है।

उधर, पुतिन अब जंग पर आमादा नजर आ रहे हैं। रूसी संसद ने यूक्रेन पर हमले की इजाजत दे दी है। सबके मन में यही सवाल है कि यूक्रेन-रूस तनाव में अब अगला चैप्टर क्या होगा? इसे समझने से पहले देखिए हमारे कार्टूनिस्ट की नजर से यूक्रेन-रूस का तनाव...

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ आक्रामक रणनीति को जारी रखते हुए संयुक्त राष्ट्र को नजरअंदाज कर दिया है।
रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ आक्रामक रणनीति को जारी रखते हुए संयुक्त राष्ट्र को नजरअंदाज कर दिया है।

अब सवाल-जवाब में जानिए रूस-यूक्रेन का अगला चैप्टर क्या होगा...

सबसे पहले हमले का यूक्रेन पर क्या असर, रूस की राह कितनी मुश्किल?
जल-थल और नभ, यानी तीनों ही इलाकों से रूस यूक्रेन पर हमला करने में ज्यादा सक्षम है। लंबी दूरी वाली मिसाइलों से यूक्रेन की रक्षा पंक्ति को भेद सकता है। इन्फर्मेशन और साइबर युद्ध में भी वह भारी है। ऐसे में यूक्रेन को झटका दे ही देगा। लोकल यूक्रेनी सेना को समर्पण या भागने पर मजबूर कर देगा, लेकिन इसका एक और पहलू है। यूक्रेन के पूर्व रक्षा मंत्री एंड्री जागोरोड्न्युक कहते हैं कि यूक्रेन पूर्व सैनिकों, लोकल यूनिट्स और लोगों के समर्थन से हजारों ऐसे ग्रुप्स बन सकता है, जो तेजी से मूव कर सकते हैं और रूसी सेनाओं पर हमला करने में सक्षम होंगे।

लुहांस्क-डोनेट्स्क को आजाद घोषित करने के पुतिन के फैसले की दुनिया में निंदा की जा रही है। NATO चीफ ने इसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन बताया है।
लुहांस्क-डोनेट्स्क को आजाद घोषित करने के पुतिन के फैसले की दुनिया में निंदा की जा रही है। NATO चीफ ने इसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन बताया है।

अमेरिका पहले ही कह चुका है कि वह यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई करता रहेगा तो इनकी कमी का सवाल ही नहीं उठता है। ऐसे में स्वतंत्र घोषित देशों की रक्षा और वहां पर प्रशासन की स्थापना करना रूस के लिए बड़ी चुनौती होगी। यह करीब-करीब असंभव है। रूस ने ही एक पोल किया था, जिसमें सामने आया था कि हर 3 में से 1 यूक्रेनी लड़ाई में शामिल होना चाहता है। साफ है कि यू्क्रेन में रूस के लिए हालात अफगानिस्तान जैसे होंगे और उसकी राह आसान नहीं होगी।

रूस पर प्रतिबंधों का असर क्या होगा?
रूस अपनी आक्रामकता का खामियाजा पहले से ही भुगत रहा है। मंगलवार को रूस का MOEX स्टॉक इंडेक्स 1.5% गिरा। सोमवार को इसमें 10% गिरावट हुई थी। इस साल इसने 20% का घाटा उठाया है। सबसे ज्यादा असर रूस की तेल कंपनी रोजनेफ्ट पर पड़ा है। मंगलवार को इसके शेयरों में 7.5% की गिरावट हुई। इसकी वैल्यू एक हफ्ते में 30 बिलियन डॉलर कम हो गई। अब रूस पर लगे प्रतिबंधों के चलते उसके स्टॉक मार्केट में गिरावट की आशंका और ज्यादा है। कैपिटल इकोनॉमिस्ट के मुताबिक रूस की GDP में 1% की कमी आ सकती है।

दुनिया भर के शेयर मार्केट में यूक्रेन तनाव की वजह से लगातार घबराहट बनी हुई है। पिछले कुछ दिनों से मार्केट को लगातार गिरावट का सामना करना पड़ रहा है।
दुनिया भर के शेयर मार्केट में यूक्रेन तनाव की वजह से लगातार घबराहट बनी हुई है। पिछले कुछ दिनों से मार्केट को लगातार गिरावट का सामना करना पड़ रहा है।

प्रतिबंधों का असर ये भी रहेगा कि पैसों के लेनदेन के सबसे तेज जरिए SWIFT, यानी सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन पर रोक लगेगी और इससे रूस का इकोनॉमिक आउटपुट 5% घट जाएगा। हालांकि, 2014 यानी जब रूस ने क्रीमिया को यूक्रेन से अलग किया था, तब रूस की GDP 2.5% घट गई थी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब यह भी रूस पर ही निर्भर है कि वह यूक्रेन में कितना भीतर दाखिल होना चाहता है। नुकसान भी इन्हीं इरादों पर निर्भर है।

रूसी हमले का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

यूरोप की 33% नेचुरल गैस रूस से आती है। अगर यह सप्लाई रुक जाती तो यूरोप बड़े संकट में पड़ जाएगा।
यूरोप की 33% नेचुरल गैस रूस से आती है। अगर यह सप्लाई रुक जाती तो यूरोप बड़े संकट में पड़ जाएगा।

रूस हर दिन 10 मिलियन, यानी एक करोड़ बैरल ऑयल प्रोड्यूस करता है। यह ग्लोबल डिमांड का 10% है। यह यूरोप का सबसे बड़ा नेचुरल गैस सप्लायर भी है। 33% गैस रूस से वहां जाती है। अमेरिका ज्यादा तेल रूस से नहीं लेता है। अमेरिका अपनी डिमांड का 3% यानी 7 लाख बैरल रूस से आयात करता है। जंग की स्थिति में वह भी प्रभावित होगा, क्योंकि तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। दो राज्यों को स्वतंत्र देश घोषित करने के साथ ही 2% की तेजी ऑयल मार्केट में आई।

पुतिन हमला करते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर से 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, लेकिन अगर बाइडेन ईरान पर से प्रतिबंध हटाते हैं, तो इनमें 10 डॉलर की गिरावट होगी। इसके अलावा रूस गेहूं का भी बड़ा निर्यातक है और अगर जंग होती है तो दुनिया में खाद्य संकट भी खड़ा हो सकता है।

रूस-यूक्रेन पर भारत का स्टैंड क्या है?

भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। UN में भारतीय प्रतिनिधि साफ कर चुके हैं कि भारतीयों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है।
भारत ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। UN में भारतीय प्रतिनिधि साफ कर चुके हैं कि भारतीयों की सुरक्षा उनकी प्राथमिकता है।

भारत का स्टैंड अभी तटस्थ और फोकस यूक्रेन में फंसे भारतीयों को वापस लाने पर है। यूएन में भारत के रिप्रेजेंटेटिव टीएस तिरुमूर्ति के बयान से जाहिर होता है कि अभी वह किसी स्पष्ट बयान यानी कोई एक पक्ष चुनने की चाह नहीं रखता है। तिरुमूर्ति ने यह तो कहा कि रूस का कदम शांति और सुरक्षा को कमजोर करेगा। साथ ही यह भी कहा कि यह मुद्दा केवल और केवल डिप्लोमैटिक डायलॉग्स के जरिए सुलझ सकता है। सभी पक्षों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और शांति को बनाए रखना चाहिए। डिप्लोमैटिक कोशिशों के जरिए रास्ता ढूंढना चाहिए।

रूस के साथ खड़ा नजर आ रहा चीन क्या कदम उठा सकता है
इस सारे मसले पर चीन भी संभल संभल कर बयान दे रहा है। उसने अभी तक किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन नहीं किया। UNSC में चीनी प्रतिनिधि ने यूक्रेन विवाद के राजनयिक समाधान खोजने का अनुरोध किया। चीन का कहना है कि सभी पक्षों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक इस संकट को हल करना चाहिए। हालांकि, 4 फरवरी को विंटर ओलिंपिंक की ओपनिंग सेरेमनी के दौरान पुतिन और शी जिनपिंग में अच्छी केमिस्ट्री दिखाई दी थी, जिसके बाद से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर युद्ध शुरू होता हो चीन रूस का साथ देगा।

रूस ने 13 साल पहले जो जॉर्जिया के साथ किया, वही यूक्रेन के साथ कर रहा है

रूस ने 2008 में जॉर्जिया के अबकाजिया और दक्षिण ओसेशिया को भी ऐसे स्वतंत्र देश की मान्यता दे दी थी। तब भी रूस का मकसद जॉर्जिया को NATO में जाने से रोकना था।
रूस ने 2008 में जॉर्जिया के अबकाजिया और दक्षिण ओसेशिया को भी ऐसे स्वतंत्र देश की मान्यता दे दी थी। तब भी रूस का मकसद जॉर्जिया को NATO में जाने से रोकना था।
  • रूस ने जैसे यूक्रेन के डोनेट्स्क और लुहान्स्क क्षेत्रों को स्वतंत्र देश की मान्यता दी, 2008 में जॉर्जिया के अबकाजिया और दक्षिण ओसेशिया को भी ऐसे स्वतंत्र देश की मान्यता दे दी थी।
  • 2008 में रूस का मकसद था कि जॉर्जिया NATO में शामिल न हो। रूस इसमें सफल भी रहा।
  • अब वही फॉर्मूला यूक्रेन पर भी आजमा रहा है। ऐसा होने पर NATO सेनाएं रूस की सीमा तक पहुंच जाएंगी। रूस ऐसा कतई नहीं चाहता।
  • डोनेट्स्क और लुहान्स्क, ये दोनों क्षेत्र कभी यूक्रेन के औद्योगिक शहर थे। यहां रूसी भाषा बोलने वाले ज्यादा हैं, इसलिए यूक्रेन के खिलाफ पनपता अलगाववाद भी ज्यादा है। ऐसे में रूस के लिए इसी रास्ते से यूक्रेन में सेनाएं भेजना आसान था।

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