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  • Spelling Bee Competition Has Been Dominated By Indians For 20 Years, Experts Said Better Memory, Coaching And Sportsmanship Will Always Keep Them Ahead

द न्यूयॉर्क टाइम्स से विशेष अनुबंध के तहत:स्पेलिंग बी स्पर्धा में 20 साल से भारतवंशियों का दबदबा, विशेषज्ञ बोले- बेहतर याददाश्त, कोचिंग और खेल भावना इन्हें हमेशा आगे रखेगी

एक वर्ष पहलेलेखक: एना पी कंभम्पति  
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अमेरिका में स्कूल जाने वाले बच्चों में भारतीय मूल वालों की संख्या एक फीसदी से भी कम है, फिर भी इस साल 8 जुलाई काे हाेने वाले फाइनल में 11 में से 9 बच्चे भारतीय मूल के हैं।  - Dainik Bhaskar
अमेरिका में स्कूल जाने वाले बच्चों में भारतीय मूल वालों की संख्या एक फीसदी से भी कम है, फिर भी इस साल 8 जुलाई काे हाेने वाले फाइनल में 11 में से 9 बच्चे भारतीय मूल के हैं। 
  • अमेरिकी स्क्रिप्स स्पेलिंग बी स्पर्धा में इस साल भी 11 फाइनलिस्ट में 9 भारतीय मूल के बच्चे

अमेरिका में 1925 से आयोजित हो रही ‘स्क्रिप्स नेशनल स्पेलिंग बी’ स्पर्धा काेराेना महामारी के चलते पिछले साल नहीं हाे सकी थी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहला माैका था, जब स्पर्धा नहीं हुई, लेकिन पिछले 20 साल से स्पर्धा में भारतीय मूल के बच्चाें का वर्चस्व बना हुआ है। हर साल सवा कराेड़ बच्चे इस स्पर्धा में भाग लेते हैं। अमेरिका में स्कूल जाने वाले बच्चों में भारतीय मूल वालों की संख्या एक फीसदी से भी कम है, फिर भी इस साल 8 जुलाई काे हाेने वाले फाइनल में 11 में से 9 बच्चे भारतीय मूल के हैं।

विशेषज्ञाें का मानना है कि भारतीय मूल के दबदबे के पीछे अंग्रेजी के 500,000 शब्दाें काे रट लेना ही काफी नहीं है बल्कि इसके पीछे उनकी बेहतर याद्दाश्त, काेचिंग, खेल भावना, स्पर्धा के प्रति गर्व का भाव भी उतना ही मायने रखता है। विशेषज्ञाें का कहना है कि स्पेलिंग बी, गणित और विज्ञान की स्पर्धाओं में भी भारतीय मूल के बच्चे शानदार प्रदर्शन करते रहे हैं।

नेशनल स्पेलिंग बी में भारतवंशी बच्चों की जीत से इस स्पर्धा के प्रति एक क्रेज भी बन गया है। भारतीय समाज में अकादमिक उपलब्धियों को बेहद सम्मान दिया जाता है। साथ ही उम्दा याद्दाश्त और ऊंचे स्तर की जानकारी रखना एक प्रतिष्ठा की बात होती है। ड्रियू यूनिवर्सिटी के एसाेसिएट प्राेफेसर संजय मिश्रा का कहना है कि अमेरिका में 60 फीसदी भारतीय प्रवासी साल 2000 के बाद आए हैं।

2016-17 में एच1 बी वीजा धारकाें की संख्या करीब 75 फीसदी थी। इन प्रवासियों ने बच्चों के पेशेवर और अधिक शिक्षित होने के मामले में समुदाय के चरित्र को ही बदल दिया है। 1985 में बालू नटराजन ने यह स्पर्धा जीतकर पहले भारतवंशी होने का गौरव हासिल किया था।

अब वे कहते हैं- ‘जब मैं विजेता बना, तब इस स्पर्धा काे लेकर इतना कुछ नहीं साेचा था। आज की पीढ़ी एक कदम आगे आकर मेहनत कर रही है। इस साल की सबसे छाेटी उम्र की सेमी फाइनलिस्ट 10 साल की तारिणी नंदकुमार काे ही लें। उसने हिम्मत नहीं हारी। कहा- ‘अगली बार मैं और मेहनत कर विजेता बनूंगी ताकि मेरा भाई जाे कुछ साल पहले इस स्पर्धा में 19वीं रैंक पर था, उसका सपना पूरा कर सकूं।’

फाइनलिस्ट आश्रिता बोलीं- 3 कोच के साथ रोज 10 घंटे प्रैक्टिस करती हूं

27 जून को 11 फाइनलिस्ट में अपनी जगह बनाने वाली भारतीय मूल की 14 साल की आश्रिता गांधारी कहती हैं कि ‘यह स्पेलर्स और स्पेलर्स का मुकाबला नहीं, बल्कि स्पेलर्स और डिक्शनरी का मुकाबला है। मैं इस मुकाबले के लिए तीन कोच के साथ रोज 10 घंटे की प्रैक्टिस कर रही हूं।’ नेशनल स्पेलिंग बी स्पर्धा के आयोजक और कार्यकारी निदेशक जे माइकल डर्निल का कहना है कि प्रतिभागियों का स्तर पहले के मुकाबले काफी बढ़ा है।

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