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तालिबान-अमेरिका में डील हुई थी:अफगानिस्तान में फंसे अमेरिकियों को एयरपोर्ट लाने के लिए सीक्रेट गेट था, मदद के लिए कॉल सेंटर्स भी बनाए गए

5 महीने पहले

अमेरिकी फौजों ने अफगानिस्तान में फंसे लोगों की सुरक्षित वापसी के लिए तालिबान से एक खुफिया डील की थी। इसी के चलते कट्‌टरपंथी संगठन ने काबुल एयरपोर्ट पर एक सीक्रेट गेट बनाया ताकि हजारों की भीड़ में भी अमेरिकी नागरिक सहूलियत से एयरपोर्ट में दाखिल हो सकें। कॉल सेंटर्स भी बनाए गए, जिनकी मदद से अमेरिकियों की वतन वापसी की प्रक्रिया को आसान किया जा सके और उन्हें गाइड किया जा सके।

अमेरिकी मीडिया हाउस CNN ने रक्षा विभाग के दो अधिकारियों के हवाले से एक रिपोर्ट पब्लिश की है। अधिकारियों ने बताया कि अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षित एयरपोर्ट के भीतर लाने के लिए तालिबानी लड़ाकों का ग्रुप खुफिया तरीके से काम कर रहा था। पढ़िए इस सीक्रेट डील की खास बातें...

इकट्‌ठा होने की जगह पहले से तय थी
अधिकारियों ने कहा कि अमेरिकियों के इकट्‌ठा होने की जगह पहले से तय थी। यह जगह एयरपोर्ट के करीब थी। यहां तालिबानी अमेरिकियों के दस्तावेज चेक करते थे और उन्हें थोड़ी दूर उस गेट तक ले जाते थे, जहां अमेरिकी सैनिकों का पहरा था। हजारों अफगानियों के बीच से इन अमेरिकियों को भीतर पहुंचाया जाता था। तालिबानी लड़ाकों के साथ आ रहे अमेरिकियों को US ट्रूप्स पहले से ही देख लेते थे और अगर हालात बिगड़ें तो दखल के लिए भी तैयार रहते थे।

अमेरिकियों को निकाले जाने का ये मिशन दिन में कई बार होता था। अमेरिकियों के इकट्‌ठा होने का मेन पॉइंट गृह मंत्रालय की इमारत थी, जो कि एयरपोर्ट के बाहर ही है। यहां से अमेरिकी सैनिक अपने नागरिकों पर आसानी से और लगातार नजर भी रख सकते थे। अमेरिकियों को कॉल सेंटर्स के जरिए लगातार मैसेज भी दिए जाते थे कि उन्हें कहां इकट्‌ठा होना है।

अफसरों ने बताया कि ये प्रक्रिया बहुत अच्छी तरह चली, लेकिन शुरुआत में कुछ दिक्कतें आईं। तालिबानियों ने कुछ अमेरिकी नागरिकों और ग्रीन कार्ड होल्डर्स को एयरपोर्ट से वापस लौटा दिया था। कई अमेरिकियों और अमेरिकी पासपोर्ट वालों को ये यकीन ही नहीं था कि तालिबानी उन्हें अफगानिस्तान से सुरक्षित निकालने में मदद करेंगे। कई ने तो ये भी सोचा कि तालिबानी उनकी बात समझ ही नहीं पा रहे हैं।

डील सीक्रेट, क्योंकि ISIS-K से खतरा था
तालिबानियों और अमेरिकियों का ये प्लान अभी तक सामने नहीं आया था। अधिकारियों ने भी मीडिया हाउस को अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर ही ये जानकारी दी है। वजहें दो हैं कि इस डील की पब्लिसिटी होने पर तालिबानियों की प्रतिक्रिया का अंदाजा नहीं था और ISIS खुरासान से अमेरिकियों को खतरा था। ISIS-K को अगर ये पता लगता कि अमेरिकियों को ग्रुपों में बाहर निकाला जा रहा है तो वो उन पर हमला कर सकते थे। पिछले हफ्ते काबुल एयरपोर्ट पर ISIS-K ने एक फिदायीन हमला भी किया था, जिसमें 13 अमेरिकी अफसर और करीब 170 अफगानी मारे गए थे।

CIA चीफ अचानक गए थे काबुल
अमेरिका लंबे समय से मिलिट्री और डिप्लोमैटिक चैनल से तालिबान से बातचीत कर रहा है, लेकिन अमेरिकियों की वापसी के लिए सीक्रेट व्यवस्था किया जाना इस कोऑर्डिनेशन का ऐतिहासिक पल था। पिछले हफ्ते CIA के डायरेक्टर विलियम बर्न्स भी अचानक काबुल गए थे, हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि उनका ये दौरा इस सीक्रेट डील से जुड़ा था या नहीं। बर्न्स ने तालिबान लीडर अब्दुल गनी बरादर से बात की थी। अमेरिकियों की वापसी के पूरे अभियान के दौरान अधिकारी इस बात पर जोर देते रहे कि तालिबान अमेरिका के साथ सहयोग कर रहा है और अमेरिकियों के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार कर रहा है।

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