SCO समिट के लिए आज उज्बेकिस्तान पहुंचेंगे मोदी:LAC पर तनाव घटा, फिर भी जिनपिंग से मुलाकात की उम्मीद कम- आखिर वजह क्या है

नई दिल्ली/ताशकंद3 महीने पहले

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन यानी SCO की मीटिंग के लिए आज उज्बेकिस्तान पहुंचेंगे। भारत, रूस, चीन और पाकिस्तान समेत 8 देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस मीटिंग में शिरकत करेंगे। भारत और चीन के बीच लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी LAC पर तनाव कम होने के बावजूद मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर सस्पेंस है।

इस मामले में गौर करने वाली बात यह है कि करीब एक हफ्ते में दो बार दोनों देशों की फॉरेन मिनिस्ट्रीज के स्पोक्सपर्सन्स से मुलाकात को लेकर सवाल पूछा गया, लेकिन दोनों ही बार कोई साफ जवाब नहीं मिला।

आखिर इस मुलाकात पर सस्पेंस क्यों

  • LAC के पाइंट 15 पर भारत और चीन के सैनिक दो साल से आमने सामने थे। अब ये पुरानी पोजिशन्स पर लौट चुके हैं। दूसरे शब्दों में दो साल बाद ही सही, टकराव की आशंका वाली इस जगह पर तनाव कम हुआ है। दोनों देशों के लिए इसे अमन की दिशा में एक कदम माना जा सकता है।
  • हैरानी की बात यह है कि चीन का सरकारी मीडिया इस अहम डेवलपमेंट पर चुप है। ग्लोबल टाइम्स और पीपुल्स डेली जैसे चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के माउथपीस कुछ भी बोलने और लिखने से बच रहे हैं।
  • मोदी और जिनपिंग की SCO समिट से इतर मुलाकात पर चीन की फॉरेन मिनिस्ट्री के साथ वहां का मीडिया भी चुप्पी साधे है। ग्लोबल टाइम्स के एडिटोरियल में झांग होन्ग लिखते हैं- समरकंद में होने वाली SCO समिट 8 देशों के नेताओं के लिए एक मौका है। वो आपसी भरोसा कायम कर सकते हैं। उम्मीद है कि प्रेसिडेंट जिनपिंग यहां प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात करेंगे।
  • पीपुल्स डेली के एक कॉलम में भारत और चीन के टकराव का तो जिक्र है, लेकिन समरकंद में मोदी-जिनपिंग मुलाकात पर वो चुप है। हां, जिनपिंग और पुतिन की मुलाकात को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है।

जिनपिंग की सिर्फ अक्टूबर पर नजर

  • अक्टूबर में चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) की मीटिंग है। माना जा रहा है कि इसमें जिनपिंग के बतौर राष्ट्रपति तीसरे कार्यकाल पर मुहर लग जाएगी। इसके पहले लद्दाख में चीनी सेना का पीछे हटना जिनपिंग के लिए शुभ संकेत नहीं है।
  • कुछ वक्त पहले ‘CNN’ ने एक डॉक्यूमेंट्री में कहा था कि जिनपिंग की मुश्किल यह है कि वो ताइवान के मुद्दे पर अमेरिका से और लद्दाख में भारत से टकरा रहे हैं। यहां भी भारत और अमेरिका के सैनिक कम्बाइंड मिलिट्री ड्रिल कर रहे हैं। ऐसे में जिनपिंग दो मोर्चों पर फंसने से बचना चाहते हैं।
  • पिछले दिनों जर्मनी की सरकार ने साफ कहा था कि भारत के अरुणाचल राज्य में चीन उकसावे ‌वाली हरकतें कर रहा है। भारत ने पुख्ता जवाबी तैयारी कर ली है, इसलिए बीजिंग को चाहिए कि वो हालात खराब करने से बचे।
  • मार्च में चीनी विदेश मंत्री वांग यी अचानक भारत आए थे। अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ के मुताबिक, वांग यी से मुलाकात में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया था कि चीन को सीमा पर हालात नॉर्मल करने होंगे। इसके बाद से ही जिनपिंग को लगने लगा था भारत पीछे हटने वाला नहीं है। अब चूंकि उनको तीसरा टर्म मिलने वाला है, लिहाजा इसके पहले वो कोई नया बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहते।
  • चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माओ निंग से अक्टूबर में जिनपिंग के तीसरे कार्यकाल और मोदी-जिनपिंग की मुलाकात पर दो बार सवाल पूछा गया। उनका जवाब था- इस बारे में फिलहाल मैं कुछ नहीं कह सकता। हम पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते चाहते हैं।
चीन को भारत से एक बड़ी नाराजगी यह है कि SCO में भारत अकेला ऐसा देश है जो चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का विरोध करता है। भारत के मुताबिक, इसके जरिए चीन विस्तारवादी एजेंडा चला रहा है। (फाइल)
चीन को भारत से एक बड़ी नाराजगी यह है कि SCO में भारत अकेला ऐसा देश है जो चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का विरोध करता है। भारत के मुताबिक, इसके जरिए चीन विस्तारवादी एजेंडा चला रहा है। (फाइल)

अचानक प्लान बदला
‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने 19 अगस्त को लिखा था- जिनपिंग ने अपने स्टाफ को SCO समिट में मोदी से मुलाकात का प्लान तैयार करने को कहा है। सवाल यह है कि अगर पहले इसकी तैयारी थी तो अब अचानक मुलाकात पर सस्पेंस क्यों है? भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने भी मोदी-जिनपिंग मुलाकात के बारे में कुछ साफ नहीं किया।

हाल ही में ‘स्काय न्यूज’ की एक रिपोर्ट में कहा गया- बहुत मुमकिन है कि समरकंद में पुतिन, मोदी और जिनपिंग तीनों एक साथ बैठकर बातचीत करें। पिछले महीने भारत के NSA अजीत डोभाल अचानक मॉस्को गए थे। इसे जनरल विजिट नहीं माना जा सकता, कुछ तो बैकडोर डिप्लोमैसी के तहत हो रहा है।

भारत की तरक्की से चीन परेशान तो है
8 सितंबर को ग्लोबल टाइम्स में एक आर्टिकल पब्लिश हुआ। यह वो वक्त था जब भारत ब्रिटेन को पछाड़कर दुनिया की पांचवीं बड़ी इकोनॉमी बना था। चीन के दो टॉप इकोनॉमिस्ट मा जिंगजियांग और हु युवेई ने इस आर्टिकल में लिखा- भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी इकोनॉमी बन गया है। उसकी तरक्की की रफ्तार चौंकाने वाली है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वो चीन की बराबरी कर पाएगा?

इस लेख में आगे कहा गया- अमेरिका और तमाम पश्चिमी देश चीन को रोकने के लिए भारत के साथ खड़े हैं। वेस्टर्न मीडिया भारत को इकोनामी के लिहाज से अगला चीन बताने लगा है। पश्चिमी देशों को यह नहीं भूलना चाहिए कि 1990 के दौरान भारत और चीन की इकोनाॅमीज का साइज एक जैसा था। आज चीन 17.7 ट्रिलियन डॉलर पर खड़ा है और भारत सिर्फ 3.1 ट्रिलियन डॉलर पर। हमारी बराबरी की बात करना मजाक लगता है। हां, ये बात मानी जा सकती है कि भारत दो साल में जापान और पांच साल में जर्मनी की इकोनॉमी को पीछे छोड़ देगा।